भूमिकामैं ये सवाल क्यों पूछता हूँ
मैं चाहता हूँ कि किसी विश्वास को मानने की ठोस वजह हो। कोई दावा पुराना, प्रिय या बार-बार दोहराया गया हो, इससे वह सच नहीं हो जाता। सवालों से बचाने पर भी नहीं। जब कोई दावा बताता है कि दुनिया किसने बनाई, मुझे कैसे जीना चाहिए और मरने के बाद क्या होगा, तो मैं ऐसी वजह माँगता हूँ जिसे जाँच सकूँ।
यह पुस्तक इस्लाम के लिए किए जाने वाले अधिकार के दावे के खिलाफ मेरा नास्तिक तर्क है। मैं पूछता हूँ कि उसके ईश्वर की धारणा कितनी संगत है, उसके दावे प्रमाणों से कितने मेल खाते हैं और उसके नियम कितने न्यायपूर्ण हैं। मेरी बात सीधी है: किसी आदेश को ईश्वरीय कह देने से उसका सही होना तय नहीं हो जाता।
भगत सिंह ने पूछा था कि सर्वशक्तिमान रचयिता दुख से भरी दुनिया क्यों बनाएगा। उनका लेख मैं नास्तिक क्यों हूँ विरासत में मिले विश्वास को सोच रोकने की वजह नहीं मानता। उसी माँग से यहाँ के सवालों को दिशा मिलती है। इस पुस्तक के तर्क और शब्द मेरे मौजूदा तर्क हैं। मैं उन्हें भगत सिंह के नए शब्द बताकर पेश नहीं करता।[1]
मैं कुरआन और नाम सहित हदीस के विवरण इस्तेमाल करूँगा, ताकि पाठक दावा खुद देख सके। हदीस मुहम्मद के कथन या आचरण का विवरण है। अलग मुस्लिम परंपराएँ एक जैसी हदीस-पुस्तकें या व्याख्याएँ स्वीकार नहीं करतीं। जब मैं किसी सुन्नी विवरण की चर्चा करूँ, तो यह पहचान जरूरी है। किसी किताब का एक वाक्य हर मुसलमान का विश्वास या व्यवहार नहीं बताता।
सवाल तीखे हो सकते हैं। पीड़ा में पड़ा बच्चा कोई शिष्ट पहेली नहीं है। विश्वास बदलने पर धमकी सहने वाले व्यक्ति के पास धार्मिक सत्ता से सवाल करने की गंभीर वजह है। किसी मत को बचाने के लिए मैं इन सवालों की धार नहीं घटाऊँगा। अपना पक्ष आसान बनाने के लिए तथ्य भी नहीं गढ़ूँगा।
हमें किस तरह का जवाब चाहिए?
कुछ सवाल भौतिक दुनिया के हैं। क्या मनुष्यों और दूसरे कपियों के साझा पूर्वज थे? गर्भ में भ्रूण कैसे बढ़ता है? हम दावों को जीवाश्म, डीएनए, अवलोकन और प्रयोग से मिला सकते हैं। विज्ञान ऐसे दावों को जाँच सकता है।
कुछ सवाल तर्क के हैं। क्या दी गई वजहों से वह निष्कर्ष निकलता भी है? कोई कारण हो, तो क्या वह अल्लाह ही होना चाहिए? तर्क बीच की छूटी कड़ी पकड़ सकता है। वह अकेले उस कड़ी के लिए प्रमाण पैदा नहीं करता।
कुछ सवाल मूल्यों के हैं। क्या अनंत सजा उचित है? क्या एक इंसान दूसरे का मालिक हो सकता है? न्याय को कोई मशीन वैसे नहीं माप सकती जैसे थर्मामीटर तापमान मापता है। मैं अपनी नैतिक वजहें साफ रखूँगा: दुख मायने रखता है, लोगों का दर्जा बराबर होना चाहिए और सहमति आजाद होनी चाहिए। पाठक इन वजहों को भी चुनौती दे सकता है।
मैं हर आपत्ति को वैज्ञानिक प्रमाण नहीं कहूँगा। हर संभव ईश्वर को गलत साबित करने का दावा भी नहीं करूँगा। जाँचने योग्य निशान न छोड़ने वाला ईश्वर और मानव शरीर की उत्पत्ति की कहानी अलग दावे हैं। पहले पर सीधा प्रयोग कठिन हो सकता है। दूसरा भौतिक प्रमाण से टकरा सकता है।
कठिन सवाल को जवाब भी सहना चाहिए
क्रम सीधा है। पहले समझें कि सामने वाला कह क्या रहा है। फिर पूछें कि क्यों मानता है। वजह जाँचें। उसका सबसे मजबूत जवाब सुनें। उसके बाद देखें कि उस जवाब से क्या निकलता है और क्या अब भी साबित नहीं हुआ।
किसी का रुक जाना उसकी हार नहीं है। बहुत भरोसे से बोलना जीत नहीं है। हम वजहें जाँच रहे हैं, चेहरों के भाव नहीं गिन रहे। जिस सवाल का जवाब मौजूद हो, वह अपने आप अच्छी आपत्ति नहीं बनता। जो जवाब दिलासा दे, वह अपने आप अच्छी व्याख्या भी नहीं बनता।
कोई मुसलमान यहाँ दिए जवाब से बेहतर जवाब दे, तो उसे जाँचें। कोई स्रोत गलत समझा गया हो, तो पढ़ना सुधारें। मैं चाहता हूँ कि मेरी आलोचना सुधार सह सके। सुधार से इनकार करूँगा, तो उसी आदत को दोहराऊँगा जिसे चुनौती दे रहा हूँ।
सवाल कैसे पढ़ें
अध्याय ईश्वर की प्रकृति से शुरू होकर प्रमाण और फिर नैतिक अधिकार तक जाते हैं। हर अध्याय अलग भी पढ़ सकते हैं। चौकोर कोष्ठक में दिया अंक स्रोत-सूची तक ले जाता है। सूची में धार्मिक ग्रंथ, आस्तिक पक्ष की अपनी सफाई, वैज्ञानिक शोध और संस्थाओं की व्याख्याएँ हैं। संदर्भ बताता है कि दावा कहाँ जाँचा जा सकता है। उसका मतलब यह नहीं कि स्रोत मेरे निष्कर्ष से सहमत है।
धार्मिक अंश अधिकतर अपने शब्दों में समझाए गए हैं। हिंदी शब्द अरबी पाठ की हर बारीकी नहीं पकड़ सकते। जहाँ विवादित शब्द से तर्क बदलता है, वहाँ यह बताया गया है। दी गई आयत के आगे और पीछे की आयतें भी पढ़ें। गंभीर टिप्पणी देखें और पूछें कि प्रस्तावित अर्थ क्या साबित कर सकता है।
आसान हिंदी जानबूझकर रखी गई है। यह पूछने के लिए किसी डिग्री की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि खतरनाक परीक्षा बनाने वाले पर उसकी बनावट की जिम्मेदारी क्यों नहीं आती। कठिन शब्द आते ही समझाए गए हैं। पीछे एक छोटा शब्दकोश भी है।
पहले पन्ने से आखिरी पन्ने तक मेरी माँग यही है: वजह दीजिए, उसका आधार दिखाइए और अगला सवाल स्वीकार कीजिए।
अध्याय 1असली जवाब किसे कहेंगे?
कोई मुझसे कहता है, "अल्लाह है, क्योंकि कुरआन ऐसा कहता है।" मैं पूछता हूँ, "कुरआन पर भरोसा क्यों करूँ?" जवाब मिलता है, "क्योंकि वह अल्लाह का शब्द है।" हम गोल घूमकर वहीं आ गए। दूसरा दावा पहले पर टिका है और पहला दूसरे पर। बाहर से किसी को सहारा नहीं मिला।
मानिए कोई अजनबी चिट्ठी देकर कहता है कि आपका घर उसका है। आप प्रमाण माँगते हैं। वह उसी चिट्ठी की एक पंक्ति दिखाता है: इसमें लिखी हर बात सच है। क्या आप घर की चाबी सौंप देंगे? धार्मिक दावे को भी इससे बेहतर वजह चाहिए।
क्या स्रोत खुद को ही साबित कर रहा है?
क्या किताब को ईश्वरीय माने बिना उसका अधिकार दिखाया जा सकता है? गवाह अपनी देखी बात बता रहा है या सिखाई गई कहानी दोहरा रहा है? दस वीडियो एक ही कहानी सुनाएँ, तो दस गवाह हुए या एक कहानी दस बार सुनाई गई?
इन सवालों से कहानी झूठी साबित नहीं होती। इनसे पता चलता है कि पेश किए प्रमाण पर कितना वजन रखा जा सकता है। स्वतंत्र समर्थन का मतलब है ऐसा समर्थन जो अपना उत्तर उसी दावे से न ले जिसे हम जाँच रहे हैं।
कुरआन संदेह करने वालों को वैसी सूरह, यानी अध्याय, पेश करने की चुनौती देता है। इस दावे पर चर्चा हो सकती है। पर इसे प्रमाण मानने से पहले मैं जानना चाहूँगा कि तुलना का फैसला कौन करेगा और किस कसौटी पर। निर्णायक को पहले से मानना जरूरी हो कि कोई इंसान कुरआन की बराबरी नहीं कर सकता, तो मुकाबला उस विश्वास की निष्पक्ष जाँच कैसे करेगा?[2]
किस नतीजे से आप विचार बदलेंगे?
मानिए हर संभव नतीजा प्रमाण कहलाता है। बीमार ठीक हुआ: अल्लाह ने सुना। मर गया: अल्लाह की बेहतर योजना थी। बीमार ही रहा: अल्लाह परीक्षा ले रहा है। ये बातें किसी को दुख सहने में मदद कर सकती हैं। वे यह नहीं बतातीं कि कौन-सा नतीजा दावे के खिलाफ गिना जाएगा।
क्या घटना से पहले कोई नतीजा तय कर सकते हैं? क्या संदेह करने वाला भी उसे जाँच सकता है? वही नतीजा किसी दूसरे धर्म का अनुयायी दिखाए, तो क्या उसे भी समर्थन मानेंगे?
हर नतीजे में ढल जाने वाली व्याख्या की जाँच शायद संभव ही न हो। इससे वह अपने आप झूठी नहीं होती। पर फिर सफल नतीजे को साफ जीत बताकर हर असफलता को जाँच से बाहर नहीं रखा जा सकता।
हमारा न जानना अल्लाह का प्रमाण कैसे हुआ?
कोई पूछता है, "ठीक-ठीक बता सकते हो कि जीवन कैसे शुरू हुआ?" मेरे पास पूरी तरह तय जवाब नहीं है। वह कहता है, "तो अल्लाह ने बनाया।" लेकिन खाली जगह में उसका चुना जवाब आया कहाँ से? यही कमी किसी दूसरे रचयिता या अभी अनजानी प्राकृतिक प्रक्रिया का प्रमाण क्यों नहीं होगी?
अमेरिका की नेशनल अकैडमीज़ विज्ञान को जाँचने योग्य प्रमाणों से व्याख्या बनाने का तरीका बताती हैं। वैज्ञानिक सिद्धांत प्रमाणों पर टिकी व्यापक व्याख्या होता है। वह महज अंदाजा नहीं है। विज्ञान में खुले सवाल हैं। वे आगे खोज की वजह हैं, किसी खास ईश्वर की रसीद नहीं।[3]
आस्तिक का गंभीर जवाब
"हम तर्क, इतिहास, निजी अनुभव और कुरआन को साथ रखते हैं। हमारा पक्ष सिर्फ किताब से किताब को साबित करना नहीं है।"
यह ज्यादा मजबूत दावा है। मुझे इन वजहों को साथ भी और अलग-अलग भी जाँचना चाहिए। पर कई कमजोर वजहें जोड़ने से हमेशा मजबूत पक्ष नहीं बनता। सब एक ही बिना जाँची कहानी पर टिकी हों, तो उनकी गिनती भ्रम दे सकती है। स्वतंत्र समर्थन हो, तो उसे अधिक वजन मिलना चाहिए।
पूछिए कि कुरआन का ईश्वरीय होना अभी खुला सवाल रहे, तब तर्क का कौन-सा हिस्सा खड़ा रहेगा। वह हिस्सा इस्लाम को दूसरी संभव व्याख्याओं से कैसे अलग करता है? फिर उसे जाँचिए।
एक छोटी, काम की बातचीत
"आपका ठीक-ठीक दावा क्या है?" जवाब में दावा आना चाहिए, केवल इस्लाम की तारीफ नहीं।
"उसका आधार क्या है?" जवाब में प्रमाण या तर्क आना चाहिए।
"उस आधार से यही निष्कर्ष क्यों निकलता है?" यह वजह और दावे के बीच की कड़ी जाँचता है।
"किस बात से पता चल सकता है कि दावा गलत है?" इससे दिखता है कि विश्वास निष्पक्ष जाँच का सामना कर सकता है या नहीं।
मुझे अपने दावों पर भी यही सवालों के जवाब देने होंगे। संदेह खराब तर्क की छूट नहीं देता। वह उसे ढूँढ़ने की वजह देता है।
अध्याय 2ब्रह्मांड का कारण हो, तो वह अल्लाह ही क्यों होगा?
"हर चीज का रचयिता होता है। ब्रह्मांड है। इसलिए उसे अल्लाह ने बनाया।"
पहला सवाल साफ है: हर चीज को रचयिता चाहिए, तो अल्लाह को किसने बनाया? जवाब हो कि अल्लाह को किसी की जरूरत नहीं, तो शुरुआत का नियम बदल गया। अब वजह चाहिए कि एक चीज बिना रचयिता रह सकती है, पर ब्रह्मांड या उसका सबसे बुनियादी आधार क्यों नहीं।
यह आपत्ति आसान नारे को काटती है। इससे ईश्वर के पक्ष का हर गंभीर तर्क गलत नहीं हो जाता। मजबूत जवाब कहता है कि जो चीज अस्तित्व में आना शुरू करती है, उसे कारण चाहिए। दूसरा जवाब कहता है कि निर्भर चीजों का ऐसा आधार चाहिए जो किसी पर निर्भर न हो। निर्भर यानी अस्तित्व के लिए किसी और की जरूरत होना।
आप किस तर्क का बचाव कर रहे हैं?
क्या हर चीज को कारण चाहिए, केवल शुरू होने वाली चीजों को, या केवल निर्भर चीजों को व्याख्या चाहिए? ये अलग दावे हैं। कठिन सवाल आते ही एक से दूसरे पर नहीं जाना चाहिए।
अल्लाह कभी शुरू ही नहीं हुआ, तो "उसे किसने बनाया?" अकेले दूसरे तर्क को नहीं काटता। फिर विवाद इस बात पर आता है कि बिना बनाए किसी सत्ता को मानने की वजह क्या है और प्रस्तावित कारण में बताए गए गुण हैं भी या नहीं।
बिग बैंग असल में क्या दिखाता है?
नासा ऐसी सृष्टि का वर्णन करता है जो आरंभिक गर्म और घनी अवस्था से फैली। यह मॉडल ब्रह्मांड के इतिहास की बहुत-सी बातें समझाता है। अपने आप यह नहीं दिखाता कि उससे पहले बिल्कुल कुछ नहीं था या किसी व्यक्ति ने बनाने का फैसला किया। सबसे पहली ज्ञात अवस्था और उसकी परिस्थितियाँ कहाँ से आईं, ये सवाल बाकी हैं।[4]
समय का ही आरंभ हुआ हो, तो "समय से पहले" का क्या अर्थ है? समय के बाहर का कारण सचमुच पहले हुई घटना होगा या किसी और तरह की व्याख्या? मकान बनाने जैसे आम उदाहरण समय के भीतर होते हैं और पहले से मौजूद सामग्री लेते हैं। यह मिसाल हमें कितनी दूर ले जा सकती है?
मैं यह घोषणा नहीं कर रहा कि ब्रह्मांड ने खुद को पैदा किया। मैं उन कदमों का आधार माँग रहा हूँ जिन्हें जानने का दावा किया जा रहा है।
पहला कारण मान भी लें, तो क्या साबित हुआ?
चर्चा के लिए मान लूँ कि कोई अंतिम कारण है। उसे भविष्य की हर घटना क्यों पता होगी? वह नैतिक रूप से पूर्ण क्यों होगा? वह प्रार्थना क्यों सुनेगा? वह एक ही क्यों होगा? इस तर्क से मुहम्मद उसके संदेशवाहक कैसे साबित हुए?
ब्रह्मांड का कोई कारण होना और अल्लाह का पूरा इस्लामी विवरण एक निष्कर्ष नहीं हैं। दूसरे में बहुत-से अतिरिक्त दावे हैं। हर दावे को आधार चाहिए।
कुरआन अद्वितीय एक ईश्वर बताता है, जो न किसी को जन्म देता है, न जन्मा है। इससे पता चलता है कि ग्रंथ क्या सिखाता है। ब्रह्मांड के कारण से उस ग्रंथ की सच्चाई तक पहुँचने के बीच की छूटी कड़ियाँ इससे नहीं भरतीं।[5]
सबसे मजबूत जवाब
"अंतिम व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जिसका न होना संभव न हो। ब्रह्मांड बदलता है और परिस्थितियों पर निर्भर है। इसलिए वह अंतिम आधार नहीं हो सकता। चेतन मन समझा सकता है कि कई संभव दुनियाओं में यही दुनिया क्यों बनी।"
यह गंभीर दार्शनिक प्रस्ताव है। मेरा सवाल है कि जरूरी अस्तित्व किसी मन का ही क्यों होगा। वास्तविकता का पूरा भौतिक आधार अपने भीतर की आम वस्तु की तरह निर्भर है, इसका प्रमाण क्या है? मन चुनाव करता है, तो उस चुनाव की वजह क्या है? उसकी प्रकृति ही चुनाव तय करती है, तो वह अलग चुनाव किस अर्थ में कर सकता था?
ये तर्क और व्याख्या के सवाल हैं। प्रयोगशाला ने इस दलील का हर रूप सुलझा नहीं दिया। मुझे ऐसा दावा नहीं करना चाहिए।
ईश्वर के अस्तित्व की अपनी व्याख्या कहाँ है?
आस्तिक कह सकता है कि ईश्वर का अस्तित्व समझाया गया है: उसकी आवश्यक प्रकृति उसका आधार है। तब पूछिए कि यह आवश्यक प्रकृति दिखाई कैसे गई। उसे नाम दे देना पर्याप्त नहीं है।
नास्तिक भी किसी मूल तथ्य को बिना अंतिम व्याख्या के स्वीकार कर सकता है। दोनों प्रस्तावों की ईमानदार तुलना होनी चाहिए। कौन ज्यादा समझाता है? कौन कम बिना आधार के दावे जोड़ता है? कौन देखी जा सकने वाली बातों से मेल खाता है?
किसी रहस्य के पीछे चेतन शासक रख देने को मैं उसका हल नहीं मानता। तर्क केवल अनजान आधार तक पहुँचा है, तो अगली कड़ी का आधार मिलने तक उसे वहीं रुकना होगा।
अध्याय 3पूर्ण ईश्वर दुख सह सकने वाले प्राणी क्यों बनाएगा?
हमें बनाया ही क्यों? अल्लाह को क्या मिला? कौन-सी जरूरत पूरी हुई? किसी चीज की कमी नहीं थी, तो ऐसी दुनिया क्यों चुनी जिसमें भय, पीड़ा और असफलता संभव हों?
कुरआन 35:15 कहता है कि अल्लाह को किसी की जरूरत नहीं। कुरआन 51:56 इंसान और जिन्न की रचना का उद्देश्य इबादत बताता है। आगे की आयतें कहती हैं कि उनसे रोजी या भोजन नहीं चाहिए। निष्पक्ष आलोचना में दोनों बातें साथ रखनी होंगी।[6][7]
इबादत ईश्वर के लिए है या हमारे लिए?
आम जवाब है कि इबादत से इंसान को लाभ है। ईश्वर को किसी चीज की जरूरत नहीं। इबादत कृतज्ञता, संयम और रचयिता से सही संबंध सिखाती है।
फिर ऐसे प्राणी बनाए ही क्यों जिन्हें इस व्यवस्था की जरूरत पड़े? दुख देने वाली जरूरत देकर आज्ञा मानने को उसका इलाज क्यों कहा जाए? सर्वशक्तिमान रचयिता ये लाभ किसी कम खतरनाक बनावट से नहीं दे सकता था?
माता-पिता अभ्यास से बच्चे को दयालु बनने में मदद कर सकते हैं। उन्होंने पूरा संसार या मन विकसित होने का हर संभव तरीका नहीं बनाया। यह तुलना रचयिता की बताई शक्ति को छोड़ देती है। अल्लाह बनावट ही चुन सकता है, तो उस बनावट पर सवाल होगा।
कुछ चाहना ही कमी का प्रमाण है?
सीधे यह कहना जल्दबाजी होगी कि अल्लाह ने बनाने का चुनाव किया, इसलिए वह जरूरतमंद या असुरक्षित है। इच्छा कमी की जगह उदारता से भी आ सकती है। कोई अच्छा अनुभव बाँट सकता है और फिर भी खुद को अधूरा न समझे। आस्तिक सृष्टि को स्वतंत्र उपहार कह सकता है।
कठिन सवाल उस उपहार की शर्तों का है। उसमें सजा का जोखिम क्यों है? नुकसान जरूरी कैसे हुए? बनाए जाने से पहले किसने उन्हें सहने की हामी भरी?
रचना को उपहार कहने से उसकी सारी शर्तें न्यायपूर्ण नहीं हो जातीं। मैं ऐसा मकान दूँ जिसमें जानलेवा जाल होने का मुझे पता है, तो "उपहार" शब्द आपकी शिकायत का जवाब नहीं होगा।
क्या हम जान सकते हैं कि अल्लाह अहंकारी है?
मैं किसी अनदेखी सत्ता के मन में झाँककर उसके अहंकार का निदान नहीं कर सकता। "अहंकारी" शब्द तर्क की जगह लगने वाला ठप्पा बन सकता है। मैं ज्यादा साफ सवाल चाहता हूँ: उचित कृतज्ञता की माँग और धमकी के सहारे समर्पण की माँग में फर्क कैसे करेंगे?
इबादत हमारे लाभ के लिए है, तो ईमानदार संदेह सजा के योग्य क्यों होगा? ईश्वर को चोट नहीं पहुँच सकती, तो संदेह करने वाले को दंड देकर किसके नुकसान की भरपाई होती है? जवाब हो कि इनकार से आत्मा बिगड़ती है, तो ऐसी कमजोरी वाली आत्मा बनाई ही क्यों?
ये सवाल अधिकार के विवरण को चुनौती देते हैं। इनके लिए मुझे ईश्वरीय भावनाएँ माप लेने का नाटक नहीं करना पड़ता।
रचना अच्छाई की अभिव्यक्ति हो, तो?
यह गंभीर आस्तिक जवाब है। अस्तित्व से प्रेम, मित्रता, सीखना और खुशी संभव होते हैं। चेतन प्राणियों के बिना दुनिया में ये अनुभव नहीं होंगे। आस्तिक कह सकता है कि कठिनाइयों के बावजूद रचना कुल मिलाकर अच्छी है।
मैं हर उस व्यक्ति के बारे में पूछूँगा जो उसकी कीमत चुकाता है। क्या अच्छा कुल नतीजा भीतर के हर नुकसान को उचित बनाता है? क्या बहुत लोगों की खुशी एक व्यक्ति पर थोपे गए भयानक जीवन को उचित बना सकती है? कोई इंसानी शासक यही नियम दे, तो क्या आप स्वीकार करेंगे?
जवाब में परलोक दिया जा सकता है। तब पूछना होगा कि उसका प्रमाण क्या है और बाद में भरपाई पहले की पीड़ा को जरूरी कैसे बनाती है। सुधार और पहले अनुमति होने के सवाल अलग हैं। नुकसान भरने का वादा अपने आप नुकसान करने या होने देने को सही नहीं बनाता।
क्या ईश्वर कम खतरनाक दुनिया बना सकता था?
हाँ, तो यही क्यों चुनी? नहीं, तो शक्ति के दावे की सीमा क्या है? आस्तिक कह सकता है कि कुछ कीमती स्वतंत्रताओं के लिए असली जोखिम चाहिए। फिर सवाल है कि कौन-से जोखिम जरूरी हैं और वे कितनी हानि को उचित बनाते हैं।
मैं हर चुनौती, निराशा या मेहनत मिटाने को नहीं कह रहा। मैं पूछ रहा हूँ कि पूर्ण रचनाकार को इतनी चरम और इतनी असमान पीड़ाएँ क्यों चाहिए। "ईश्वर का उद्देश्य है" एक संभावना बताता है। उससे उद्देश्य का अच्छा होना या इतनी कीमत का जरूरी होना नहीं दिखता।
अध्याय 4इब्लीस को बनाकर लोगों को भटकाने क्यों दिया?
पहले कहानी ठीक समझें। कुरआन 18:50 इब्लीस को जिन्नों में से बताता है। उसे बस गिरा हुआ फरिश्ता कहने से दूसरे धर्म की तस्वीर तर्क में घुस सकती है। कुरआन के विवरण में वह आदम से जुड़े आदेश को नहीं मानता। 7:12 में वह खुद को आग और आदम को मिट्टी से बनाया गया बताकर सफाई देता है।[8][9]
अगली बातचीत में असली सवाल है। इब्लीस मोहलत माँगता है। उसे मोहलत मिलती है। फिर वह इंसानों को भटकाने की योजना बताता है। कुरआन 7:14-18 को अलग पंक्ति की जगह पूरे क्रम में पढ़िए।[10]
क्या अल्लाह को पता था कि इब्लीस क्या करेगा?
पता था, तो उसे इन परिस्थितियों में बनाया क्यों? खतरा घोषित होने के बाद योजना चलने क्यों दी? आगे आने वाले लोगों को ऐसे बहकाने वाले के सामने क्यों रखा जिसे उन्होंने चुना ही नहीं?
पता नहीं था, तो ईश्वर के पूर्ण ज्ञान का आम दावा बदलना पड़ेगा। उस ज्ञान को मानने वाला आस्तिक प्रायः पहला उत्तर चुनेगा और खतरा रहने देने की वजह बताएगा।
जानना क्या गलत काम करवाना है?
सबसे मजबूत जवाब है: नहीं। किसी चुनाव को जानना उसे जबरन करवाने जैसा नहीं है। मुझे पता हो कि दोस्त खाना मना करेगा, तो मेरे जानने से उसका इनकार पैदा नहीं होता। इब्लीस अपने काम का जिम्मेदार फिर भी हो सकता है।
यह एक आपत्ति का जवाब देता है: पहले से जानना साफ तौर पर चुनने वाले के मन के भीतर धक्का नहीं है। दूसरी आपत्ति बाकी है। अल्लाह रचयिता और शासक बताया जाता है, जो पहले से दिखती हानि रोक सकता है। मैं विद्रोही के चुनाव के साथ बनाने और अनुमति देने के चुनाव पर भी सवाल कर रहा हूँ।
मानिए पुल बनाने वाले को पता है कि उसकी बनावट गिरेगी। रोक तोड़कर जाने वाला चालक गलत हो सकता है। फिर भी बनाने वाले के ज्ञान और नियंत्रण की जाँच होगी। यह जिम्मेदारी समझाने की मिसाल है, ईश्वर को हूबहू इंसानी निर्माणकर्ता मानने का दावा नहीं।
मोहलत क्यों दी गई?
इब्लीस की अपनी स्वतंत्रता बचाकर उसे दूसरों को नुकसान पहुँचाने से क्यों नहीं रोका जा सकता था? क्या स्वतंत्रता में अजनबियों को बहकाने का अधिकार चाहिए? हस्तक्षेप रोकने से स्वतंत्रता खत्म होती है, तो हम धोखा, जबरदस्ती या उत्पीड़न क्यों रोकते हैं?
आस्तिक कह सकता है कि प्रलोभन परीक्षा को सार्थक बनाता है। फिर पूछें कि परीक्षा हासिल क्या करना चाहती है। अच्छा बनने के लिए किसी अलौकिक बहकाने वाले का सामना जरूरी है? ईमानदारी, देखभाल और संयम साधारण चुनावों से नहीं बढ़ सकते? अतिरिक्त खतरा क्यों?
क्या हर बुराई का कारण इब्लीस है?
यहाँ का तर्क उस दावे पर निर्भर नहीं है। इंसानी क्रूरता में चुनाव, संस्थाएँ और आदतें शामिल हो सकती हैं। भूकंप का कारण किसी के झूठ बोलने जैसा नहीं होता। हर नुकसान एक विद्रोही पर डालने से वे अलग कारण छिप सकते हैं जिन्हें समझना जरूरी है।
आस्तिक यह भी कह सकता है कि इब्लीस किसी से पाप जबरन नहीं करा सकता। उसकी ताकत सुझाव तक है, तो पूछें कि यह सुझाव आने क्यों दिया गया और उससे व्याख्या में क्या जुड़ा। लोग जिम्मेदार रहते हों, तब भी उसे दी गई अनुमति का सवाल खत्म नहीं होता।
किस जवाब से सवाल हल होगा?
"अल्लाह की ऐसी बुद्धि है जिसे हम देख नहीं सकते" इस विश्वास के भीतर संभव है। पर क्या उससे वजह मिलती है? या कहा जा रहा है कि वजह जरूर होगी, क्योंकि अल्लाह अच्छा जरूर है? जिस अच्छाई की जाँच हो रही हो, उसे पहले से मान लेने से जाँच पूरी नहीं होती।
मुस्लिम पक्ष स्वतंत्रता, संघर्ष और न्याय लौटाने वाले अंतिम फैसले की बात कर सकता है। बुराई पर मुस्लिम जवाबों में ये गंभीर विषय हैं।[11] हर विषय अगला सवाल जोड़ता है: कौन-सी भलाई के लिए कौन-सी हानि जरूरी थी और हम यह कैसे जानते हैं?
मैं कहानी के भीतर इब्लीस की जिम्मेदारी स्वीकार करके भी पूछ सकता हूँ कि पूर्ण रचयिता ने कहानी शुरू ही क्यों की। किसी पात्र को दोष देने से पूरी व्यवस्था के रचयिता का सवाल खत्म नहीं होता।
अध्याय 5सब कुछ जानने वाला ईश्वर किस बात की परीक्षा लेता है?
आम परीक्षा ऐसी बात पता करती है जो परीक्षक अभी नहीं जानता। शिक्षक देखता है कि विद्यार्थी ने क्या सीखा। वाहन की परीक्षा देखती है कि सीखने वाला सुरक्षित चला सकता है या नहीं। कुरआन 67:2 जीवन और मृत्यु को कर्मों की परीक्षा बताता है।[12]
अल्लाह को हर चुनाव और नतीजा पहले से पता है, तो परीक्षा से कौन-सी नई जानकारी मिलती है? जवाब "कोई नहीं" है, तो उसे करवाने की जरूरत क्यों है?
सबसे मजबूत जवाब क्या है?
आस्तिक कह सकता है कि परीक्षा हमारे चुनावों को सचमुच घटित करती है और ऐसा रिकॉर्ड देती है जिसे हम देख सकें। ईश्वर को सीखना नहीं है। हमें जीना, काम करना और वह व्यक्ति बनना है जिसका फैसला होगा। अनुमानित गलत काम और वास्तव में किया गया गलत काम एक नहीं हैं।
यह कहना कि अल्लाह को नतीजे की जिज्ञासा है, उससे यह ज्यादा सावधान जवाब है। इसका मतलब मेरा पहला सवाल जवाब पा गया। अगले सवाल प्रक्रिया की कीमत और निष्पक्षता के हैं।
रिकॉर्ड इतनी पीड़ा से ही क्यों बने? क्या ईश्वर दूसरों को नुकसान सहवाए बिना हमारे चुनावों का सच दिखा सकता था? जिन लोगों की अंतिम असफलता उसे पहले से पता है, उन्हें बनाना क्यों?
क्या सभी एक जैसी परीक्षा दे रहे हैं?
एक व्यक्ति सुरक्षा और धैर्य से सिखाने वालों के बीच बढ़ता है। दूसरा भूख या हिंसा में। एक को विचारपूर्ण इस्लाम सुनने को मिलता है। दूसरे को इस्लाम के नाम पर क्रूरता मिलती है। क्या दावे को परखने का उनका मौका बराबर है?
आस्तिक कह सकता है कि अल्लाह हर परिस्थिति का न्याय करेगा। दावा सही तरह काम करे, तो यह असमान शुरुआत का उत्तर होगा। मेरा अगला सवाल है: हम जानते कैसे हैं कि वैसा होगा? न्यायपूर्ण अंतिम फैसले का वादा उसी मत का हिस्सा है जिसे जाँचा जा रहा है। उसे स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य नहीं मान सकते।
कुरआन 17:15 दंड को संदेशवाहक भेजने से जोड़ता है और कहता है कि एक व्यक्ति दूसरे का बोझ नहीं उठाता। इससे वह साधारण दावा कमजोर पड़ता है कि मुस्लिम पहचान न रखने वाले सभी लोग बिल्कुल एक तरह से आँके जाते हैं।[13] फिर भी सवाल है कि विरोधी धार्मिक दावों के बीच भरोसेमंद संदेश कैसे पहचानें।
क्या आप कुछ और चुन सकते थे?
दो अलग सवाल हैं। क्या किसी ने आपका चुनाव शारीरिक बल से करवाया? और ठीक वही अतीत तथा ईश्वर का तय ज्ञान रहे, तो क्या चुनाव अलग हो सकता था? "मुझे आजाद महसूस हुआ" कहने से दोनों का पूरा जवाब नहीं मिलता।
कुरआन 76:29-30 इंसानी इच्छा के साथ अल्लाह की इच्छा पर निर्भरता रखता है। कुरआन 57:22 आपदाओं को उनके होने से पहले लिखा बताता है।[14][15] मुस्लिम विचारधाराओं ने इंसानी चुनाव और ईश्वरीय तकदीर के अलग विवरण बनाए हैं। एक नारा उनका विवाद नहीं सुलझाता।
आप अलग चुन सकते थे, तो क्या अल्लाह का ज्ञान गलत हो सकता था? आम जवाब है कि आपने अलग चुना होता, तो ईश्वर हमेशा से उसी अलग चुनाव को जानता। इससे उसे देर से नई बात सीखते हुए नहीं मानना पड़ता। फिर भी सवाल बचता है कि आपका असली भविष्य खुला है या नहीं और नैतिक दोष के लिए किस तरह का नियंत्रण चाहिए।
खुला भविष्य न हो, तब जिम्मेदारी संभव है?
कुछ धार्मिक और नास्तिक विचारक कहते हैं कि चुनाव आपकी अपनी वजहों और इच्छाओं से आए, तो वह स्वतंत्र है, भले उनके पहले के कारण हों। दूसरों को सचमुच कुछ और कर सकने की क्षमता चाहिए। विरोधाभास घोषित करने से पहले बताना होगा कि किस विचार का बचाव हो रहा है।
पहला विचार मानें, तब भी रचयिता का सवाल लौटता है। उन वजहों और इच्छाओं को आकार देने वाली परिस्थितियाँ किसने चुनीं? ईश्वर दूसरी व्यवस्था बना सकता था, तो चुनी व्यवस्था की वजह क्या है? जिम्मेदारी एक से ज्यादा स्तर पर हो सकती है।
मेरी आपत्ति सटीक रहे, तभी मजबूत है। पहले से जानना अकेले जबरदस्ती साबित नहीं करता। पहले से ज्ञान, रचना, नियंत्रण और दंड साथ मिलें, तो बड़ा सवाल उठता है: पूरी परीक्षा बनाने वाला उसके पहले से दिखते नतीजों की नैतिक जिम्मेदारी से पूरी तरह बाहर क्यों है?
अध्याय 6किसी और की सीख के लिए बच्चा दुख क्यों सहे?
भारी दर्द में पड़े बच्चे की कल्पना कीजिए। यह सोचने की मिसाल है, किसी पहचाने परिवार की रिपोर्ट नहीं। हमसे कहा जाता है कि दर्द से धैर्य सीखा जा सकता है, रिश्तेदार साथ आ सकते हैं या दूसरों को करुणा दिखाने का मौका मिलता है।
सीख किसकी है? कीमत बच्चा क्यों चुकाए? क्या दूसरे तरीके से नहीं सिखाया जा सकता? किसी बड़े को उदार बनाने के लिए मैं बच्चे को दुख दूँ, तो अच्छा नतीजा मुझे निर्दोष बना देगा?
क्या हर दुख सहने वाले को वही दुख चाहिए?
आस्तिक कह सकता है कि कठिनाई चरित्र बनाती है। कभी-कभी बनाती है। इससे यह नहीं दिखता कि हर कठिनाई चरित्र बनाती है, हर व्यक्ति को लाभ होता है या कम कठोर रास्ता असंभव था।
फर्क सीधा है। "कुछ लोग कठिनाई से सीखते हैं" कुछ अनुभवों का दावा है। "यह भयानक हानि अच्छे उद्देश्य के लिए जरूरी थी" इसी हानि का दावा है। दूसरे को कहीं ज्यादा आधार चाहिए।
मुस्लिम सफाइयाँ परीक्षा, आध्यात्मिक विकास, क्षमा या परलोक में समझ आने वाली भलाई जैसे कई संभव उद्देश्य दे सकती हैं।[11] कई संभव व्याख्याएँ होने से नहीं पता चलता कि किसी खास मामले में कौन-सी सच है।
क्या स्वतंत्र इच्छा प्राकृतिक हानि समझाती है?
किसी की हिंसा को इंसानी चुनाव समझा सकता है। इससे अपने आप नहीं समझ आता कि शरीर तरह-तरह की बीमारियों से कमजोर क्यों हैं या भौतिक संसार में विनाशकारी घटनाएँ क्यों हैं। व्यक्ति ने अपने पास आने वाला हर खतरा स्वतंत्र रूप से नहीं चुना।
स्थिर प्राकृतिक नियम गंभीर जवाब हैं। भरोसेमंद कारणों वाली दुनिया हमें सीखने, काम करने और मदद करने देती है। पर नियमों में ठीक इतना खतरा ही क्यों चाहिए? वही रचयिता ज्यादा मजबूत शरीर या चरम दर्द की सीमा नहीं बना सकता था?
कम खतरनाक दुनिया असंभव कही जाए, तो मैं वजह माँगूँगा। संभव है पर चुनी नहीं गई, तो उस चुनाव की नैतिक वजह माँगूँगा।
मूसा की कहानी के लड़के का क्या?
कुरआन 18 में मूसा एक ईश्वर के बंदे के साथ यात्रा करते हैं। मुस्लिम परंपरा में उसे आम तौर पर खिज्र कहा जाता है। लड़के की हत्या पर मूसा आपत्ति करते हैं। बाद में कहानी उस हानि की बात करती है जो लड़का अपने आस्तिक माता-पिता को पहुँचाता, और बेहतर संतान मिलने की आशा बताती है। घटना के साथ यह सफाई भी पढ़नी होगी।[16][17]
संभव भविष्य के गलत काम पर, काम होने से पहले बच्चे को मारना उचित हो सकता है? दूसरा बच्चा मिलने से मारे गए बच्चे के साथ न्याय हो जाएगा? सर्वशक्तिमान ईश्वर उस मौत के बिना माता-पिता को क्यों नहीं बचा सकता था?
आस्तिक कह सकता है कि यह खास ज्ञान पर टिका असाधारण काम था। साधारण इंसानों के पास वह ज्ञान नहीं है। यह पाठकों को बच्चों को नुकसान पहुँचाने की छूट नहीं है। यह फर्क जरूरी है। मेरी आपत्ति बताए गए ईश्वरीय काम के न्याय पर है, यह दावा नहीं कि मुसलमानों को उसकी नकल का आदेश है।
आगे मिलने वाला इनाम पहले की हानि जरूरी बना देगा?
जिस परलोक में बच्चा सुरक्षित हो, उससे उसके कुल सुख-दुख का हिसाब बदल सकता है। अपने आप इससे नहीं दिखता कि पहले नुकसान होना जरूरी क्यों था। पीड़ित की भरपाई एक बात है। उसे नुकसान के सामने रखने की उचित वजह होना दूसरी।
जवाब हो कि ईश्वर का ज्ञान हमसे बड़ा है, तो मैं अपनी सीमाएँ मान सकता हूँ। लेकिन वे सीमाएँ हमारे इस दावे को भी कमजोर करती हैं कि यह काम पूर्ण न्याय है? दिखाई देती भलाई की तारीफ में इंसानी समझ लें और क्रूरता दिखते ही उसे खारिज करें, तो फर्क की वजह चाहिए।
जवाब विवादित रहे, तब क्या करें?
बच्चे की मदद करें। दर्द घटाएँ। रोकी जा सकने वाली हानि से लोगों को बचाएँ। आस्तिक यह चुनाव कर सकते हैं और करते हैं। ईश्वरीय योजना में विश्वास निष्क्रिय रहना जरूरी नहीं बनाता। कुरआन 13:11 लोगों में बदलाव को उनके अपने भीतर बदलाव से भी जोड़ता है।[18]
मेरी चुनौती बाकी है: सर्वशक्तिमान और पूर्ण अच्छा रचयिता जिन हानियों को रोक सकता है, इंसान उनकी मरम्मत क्यों करें? "कोई वजह हो सकती है" संभावना खुली रखता है। उससे वजह का होना साबित नहीं होता।
अध्याय 7कभी खत्म न होने वाली सजा रहम कैसे है?
सीमित जीवन में कोई गलत निष्कर्ष पर पहुँचा, तो अनंत दंड का औचित्य क्या होगा? कितना संदेह उस योग्य होगा? सजा और गलती में उचित अनुपात कैसे होगा?
अनुपात यानी दोनों में मुनासिब संतुलन। हम चोरी की निंदा करके भी नहीं मानते कि चोर हमेशा दुख सहे। गलती की गंभीरता के साथ व्यक्ति का ज्ञान, इरादा और अलग तरह से कर सकने की क्षमता भी मायने रखते हैं।
कुरआन 4:56 उसकी निशानियाँ न मानने पर लगातार कठोर सजा बताता है। 98:6 उस अंश में बताए लोगों को आग में टिके रहने वाला कहता है। 39:53 ईश्वरीय रहम और क्षमा की बड़ी पुकार देता है।[19][20][21] सवाल है कि ये शिक्षाएँ साथ कैसे बैठती हैं।
क्या हर गैर-मुसलमान का फैसला एक जैसा है?
यह कहना लापरवाही होगी कि हर मुसलमान इस्लाम से बाहर हर व्यक्ति का बिल्कुल एक अंजाम मानता है। अज्ञान, मिले हुए संदेश, ईमानदार गलती और दंड की अवधि पर अलग जवाब मिलते हैं।
कुरआन 17:15 भी जरूरी है। वह दंड को संदेशवाहक और व्यक्तिगत जिम्मेदारी से जोड़ता है।[13] निष्पक्ष आपत्ति पहले पूछती है कि आस्तिक किस विवरण का बचाव कर रहा है।
साफ सच जानकर ठुकराने वाले के लिए अनंत सजा मानते हैं, तो जानबूझकर इनकार और ईमानदार अविश्वास में फर्क कैसे करेंगे? क्या दूसरा इंसान उसका मन पढ़ सकता है? तीखा आलोचक जरूरी तौर पर इस्लाम को सच जानकर भी मना कर रहा है?
क्या आदेश से विश्वास चुना जा सकता है?
हाथ के सिक्के को जीवित पक्षी मानने की कोशिश कीजिए। अभिनय कर सकते हैं। शब्द बोल सकते हैं। खुद को आदेश देकर बात भरोसेमंद नहीं बना सकते।
पढ़ना, सुनना या स्रोत जाँचना हम चुन सकते हैं। उससे विश्वास बदल सकता है। पर ईमानदार पढ़ाई के बाद यकीन इस पर टिकता है कि आधार किस बात का दिखता है। कोई सच में मान ही नहीं पाता, तो धमकी का उद्देश्य क्या है? भय सच पैदा करेगा या बाहर से हामी भरवाएगा?
असीम अपराध वाला जवाब
आस्तिक कह सकता है कि अनंत ईश्वर को ठुकराना असीम गंभीर अपराध है। लेकिन जिसकी अवज्ञा हुई, उसके दर्जे से सजा की लंबाई क्यों तय हो? ईश्वर को चोट या कमी नहीं हो सकती, तो सजा किस नुकसान को सुधार रही है?
दूसरा जवाब है कि व्यक्ति हमेशा ईश्वर को ठुकराता रहेगा। यह भविष्य की परिस्थितियों में उसके व्यवहार का नया दावा है। आधार क्या है? मौत के बाद समझ बदल सकती है? नहीं, तो बदलना असंभव करने वाली परिस्थितियाँ किसने तय कीं?
तीसरा जवाब नरक को अच्छाई के स्वतंत्र इनकार का नतीजा मानता है। फिर पूछें कि जिसे जानकारी या भरोसा ही नहीं, उसने पूरी जानकारी वाला चुनाव किया कैसे। दरवाजा सचमुच खुला है, तो क्या व्यक्ति उसे समझकर निकल सकता है?
सजा का ऐसा उद्देश्य जो कभी पूरा न हो?
दंड दूसरों को बचा सकता है, हानि सुधार सकता है या दोषी को बदलने में मदद कर सकता है। वह कभी खत्म न हो, तो लक्ष्य क्या पूरा होता है? कोई बदल या छूट नहीं सकता, तो उसे जारी क्यों रखें? केवल न्याय ही यह माँगता है, तो न्याय की कौन-सी समझ यह जरूरत बताती है?
ये नैतिक सवाल हैं। कोई जीवाश्म सजा की उचित अवधि नहीं निकाल सकता। मेरा फैसला है कि अनंत पीड़ा की व्यवस्था को "शासक को अधिकार है" से बहुत मजबूत बचाव चाहिए। ताकत बताती है कि सजा कौन दे सकता है। यह नहीं बताती कि सजा उचित है।
नरक का डर इस्लाम के सच होने की संभावना बढ़ाता है?
डराने वाला दावा गलत हो सकता है। दिलासा देने वाला भी। धमकी की सजा जितनी बड़ी हो, प्रमाण उतना नहीं बढ़ जाता।
पूछिए कि पहले से डरे न होते, तो धमकी का प्रमाण क्या होता। दूसरे धर्म की विरोधी चेतावनी के लिए भी वही तर्क मानते? फिर पूछिए कि प्रस्तावित न्यायाधीश ईमानदार जाँच को अपराध तो नहीं मानता।
रहम का कोई समझने योग्य अर्थ है, तो सीमित और गलती कर सकने वाले इंसानों के फैसले पर असर होना चाहिए। वरना शब्द ने वही अर्थ खो दिया जिससे ईश्वर की तारीफ की गई थी।
अध्याय 8अल्लाह न पुरुष है न स्त्री: क्या यह विरोधाभास है?
"अल्लाह न पुरुष है, न स्त्री।"
नास्तिक का मन कह सकता है, "फिर वह होगा या कुछ बनाएगा कैसे?" यह कमजोर आपत्ति है। कोई रचयिता हो, तो जरूरी नहीं कि वह पशुओं की तरह प्रजनन करे। जैविक लिंग शरीर और प्रजनन से जुड़ा है। बिना शरीर की प्रस्तावित सत्ता को उन्हीं खानों में रखना जरूरी नहीं।
कुरआन 112 अल्लाह के जन्म देने या जन्मने से इनकार करता है। 42:11 कहता है कि उसके जैसा कुछ नहीं।[5][22] मत ईश्वर को आम जीवों से अलग बता रहा है। हर चीज स्त्री या पुरुष होनी चाहिए, ऐसा नियम गढ़ने की जगह उसी दावे को जाँचें।
क्या पुल्लिंग शब्द पुरुष शरीर साबित करता है?
व्याकरण की पहचान से शरीर की बनावट पता नहीं चलती। भाषाएँ शब्दों को अलग तरह बाँटती हैं। अनुवाद का सर्वनाम ईश्वर के शरीर की तस्वीर नहीं है।
बेहतर सवाल है कि भाषा सच में क्या जानकारी देती है। आस्तिक कहता है कि अल्लाह जानता, चाहता, प्रेम करता या नाराज होता है। इन शब्दों का आम अर्थ कितना बचता है? कौन-सा वर्णन शाब्दिक है और कौन तुलना, यह कैसे तय होगा?
हमसे इतना अलग कि दावा ही अस्पष्ट हो जाए?
ईश्वरीय ज्ञान सारे इंसानी ज्ञान से अलग है, तो "अल्लाह हमारा भविष्य जानता है" का अर्थ क्या है? ईश्वरीय अच्छाई हमारी हर अच्छी कही चीज से अलग है, तो उस शब्द से भरोसा क्यों मिले? क्रोध में बदलाव, खीझ या प्रतिक्रिया कुछ भी नहीं, तो वर्णन किसका हो रहा है?
आस्तिक गंभीर जवाब दे सकता है: हम गुण को कुछ समझते हैं, बिना जाने कि ईश्वर में वह ठीक कैसे है। विशेषज्ञ का पूरा मन समझे बिना भी हम जान सकते हैं कि वह विषय समझता है।
इससे अधूरा ज्ञान संभव दिखता है। हर वर्णन अर्थपूर्ण नहीं हो जाता। पूछें कि दावा किस चीज को असंभव बताता है। ईश्वरीय अच्छाई से असंगत क्या होगा? बताए गुण के विरुद्ध किसे प्रमाण गिनेंगे?
क्या क्रोध असुरक्षा साबित करता है?
अकेले नहीं। इंसान अन्याय पर इसलिए नाराज हो सकता है कि उसे पीड़ित की परवाह है। हर क्रोध आहत अहंकार से नहीं आता। इसी तरह काम चुनना अकेले जरूरत या कमजोरी साबित नहीं करता।
तीखा सवाल बताई वजह और प्रतिक्रिया का है। ईमानदार संदेह पर नाराजगी क्यों? असीम सत्ता सीमित व्यक्ति के अविश्वास को भारी सजा की वजह क्यों बनाए? क्रोध न्यायपूर्ण फैसले की उपमा है, तो फैसला न्यायपूर्ण कैसे है?
इन कड़ियों को जाँचे बिना अल्लाह को अहंकारी कहना आसान उत्तर देता है: आपने इंसानी मन उस पर थोप दिया। मैं असली तर्क को चुनौती देना चाहता हूँ, उसे वह रास्ता देना नहीं।
क्या "समझ से परे" हर आपत्ति का जवाब है?
कोई अल्लाह के रहम की तारीफ इसलिए करता है कि रहम समझने योग्य अर्थ में अच्छा है। दंड पर सवाल आए, तो कहता है कि ईश्वरीय अच्छाई समझ नहीं सकते। तारीफ में इंसानी समझ भरोसेमंद और आलोचना में बेकार क्यों हुई?
कोई सिद्धांतपूर्ण फर्क हो सकता है। उसे समझाना होगा। वरना नियम ऐसा लगता है: परिचित शब्द विश्वास के काम आए तो अर्थ मानो, मुश्किल करे तो अर्थ बदल दो।
कमजोर लिंग वाली आपत्ति की जगह क्या पूछें?
पूछें, "अल्लाह के कौन-से गुण मानते हैं, उनका अर्थ क्या है और आधार क्या है?"
अल्लाह जैविक लिंग से परे है, तो मानें कि इस पहलू में विवरण संगत है। उससे वैसी सत्ता का अस्तित्व नहीं दिखता। अल्लाह न्यायपूर्ण कहा जाए, तो न्याय बताकर पेश किए कामों का बचाव माँगें। सर्वज्ञ कहा जाए, तो ज्ञान और जिम्मेदारी जाँचें।
आपत्ति की जगह तभी है जब वह असली कमजोरी तक पहुँचे। बेकार आपत्ति छोड़कर मेरा कुछ नहीं जाता। शरीर के सवाल को प्रमाण के सवाल से अलग रखने पर मेरा पक्ष मजबूत होता है।
अध्याय 9आसान भाषा में विकासक्रम क्या समझाता है?
विकासक्रम में माता-पिता से संतान को मिलने वाले गुण कई पीढ़ियों में किसी आबादी में बदलते हैं। गुण यानी विशेषता, जैसे रंग या शरीर की बनावट। पीढ़ी माता-पिता से उनकी संतान तक एक कदम है।
एक जीव अपने जीवन में बढ़ता है। विकासक्रम पूरी आबादी में आगे दिए जाने वाले गुणों के बदलाव की बात है। व्यापक विवरण कहता है कि जीवों के साझा पूर्वज हैं। परिवार का पेड़ शाखाओं में बँट सकता है। एक शाखा को बाकी हर शाखा में बदलना जरूरी नहीं।
क्या यह सिर्फ संयोग है?
छोटे भृंगों की आबादी सोचिए। कुछ में कोई गुण खतरे से बचने में मदद करता है। गुण आगे मिलता है और ऐसे भृंग अधिक संतान छोड़ते हैं, तो अगली पीढ़ी में वह गुण ज्यादा हो सकता है। किसी भृंग को बेहतर बनने का फैसला नहीं लेना पड़ता।
डीएनए में नए बदलाव जीव की जरूरत के कारण नहीं उठते। लेकिन बदलाव का आगे क्या होगा, यह कुछ हद तक उसके जीने और संतान होने पर असर से जुड़ा है। यही प्राकृतिक चयन है। यह एक संयोगभरे दाँव से पूरा तैयार जीव बना देना नहीं है।
दूसरे कारण भी जरूरी हैं। संयोग से बदल सकता है कि कौन संतान छोड़ेगा। आबादियाँ बँटकर अलग रास्ते ले सकती हैं। प्रक्रिया सोचती नहीं और हर जीव को बेहतर बनाने का लक्ष्य नहीं रखती।[23]
क्या इसे होते देख सकते हैं?
हम पीढ़ियों में गुण बदलते देख सकते हैं। कुछ नए गुण कैसे आए, यह जाँच भी सकते हैं। लंबे प्रयोग में ई. कोलाई जीवाणुओं की अलग आबादियाँ रखी गईं। अध्ययन की परिस्थितियों में एक वंश ने ऑक्सीजन रहते साइट्रेट को भोजन की तरह इस्तेमाल करने की क्षमता पाई। साइट्रेट भोजन के मिश्रण का एक रसायन है।[24]
दल बाद के जीवाणुओं की तुलना पहले जमाकर रखे नमूनों से कर सकता था। जाँच सकता था कि पहले के बदलावों ने आगे के नतीजे पर क्या असर डाला। इससे तैयार नतीजे से अंदाजा लगाने के बजाय बीच के कदमों का अध्ययन संभव हुआ।
इससे क्या दिखता है? आगे पीढ़ियों में जाने वाले बदलावों से आबादी उपयोगी नई क्षमता पा सकती है।
इस अकेले से इंसानों के बारे में क्या दिखता है? बहुत कम। यह आरंभिक जीवन से हमारे बनने तक की फिल्म नहीं है। व्यापक तर्क को दूसरे प्रमाण भी चाहिए। हर टुकड़े को उतना ही काम देना चाहिए जितना वह कर सकता है।
लंबे इतिहास के प्रमाण कहाँ हैं?
कई तरह के आपस में मेल खाते आधार देखें। जीवाश्म पुराने जीव और उनके शारीरिक गुण दिखाते हैं। डीएनए रिश्तेदारी के ढाँचे जाँचने देता है। चट्टानों की उम्र और क्रम जीवों के समय को जाँचने में मदद करते हैं। इन प्रमाणों को एक-दूसरे से मिलाया जा सकता है।
व्हेल उपयोगी मिसाल है। पहले के रूपों में जमीन पर जीवन से जुड़े गुण थे। बाद के रूप पानी के ज्यादा अनुकूल थे। परिवार के पेड़ में उनकी जगह शरीर की कई बारीकियों से तय होती है। यह थोड़ी मिलती तस्वीरों की कतार भर नहीं है।[25]
फिर दूसरे कपि अभी क्यों हैं?
क्योंकि परिवार की शाखाएँ एक समय पर जीवित रह सकती हैं। आपके और आपके चचेरे भाई के दादा-दादी एक हो सकते हैं। आपके जन्मते ही चचेरे भाई को गायब नहीं होना पड़ता।
हमें आज के चिंपैंजियों से आना जरूरी नहीं। दोनों वंशों के साझा पूर्वज थे। मनुष्य भी बड़े कपियों में गिने जाते हैं। नए गुण किसी शाखा का अतीत नहीं मिटाते। अगले अध्याय में इस रिश्ते के प्रमाण देखेंगे।
क्या इससे पहला जीवन समझ आता है?
पहली जीवित व्यवस्थाएँ जुड़ा हुआ, पर अलग सवाल हैं। वैज्ञानिक देखते हैं कि रसायनों से जीवन कैसे उठ सकता था। पहली बार ठीक कैसे हुआ, इसका पूरा सहमत विवरण अभी नहीं है।[26]
क्या इस कमी से बाद के बदलाव का ज्ञान मिट जाता है? पहली किताब कैसे बनी, यह न पता हो, तब भी देख सकते हैं कि बाद की कौन-सी प्रतियाँ पहले की किन प्रतियों से निकलीं।
क्या अल्लाह प्रक्रिया का मार्गदर्शन कर सकता है?
मुसलमान विकासक्रम मानकर जोड़ सकता है कि अल्लाह उसे दिशा देता है। अकेला विकासक्रम यह अतिरिक्त दावा खारिज नहीं करता। अगला सवाल है कि मार्गदर्शन का प्रमाण क्या है।
यह उस दावे से अलग है कि मनुष्यों के दूसरे पशुओं से साझा पूर्वज ही नहीं हैं। दूसरे दावे को शरीर और अतीत के प्रमाणों का सामना करना होगा। पूछें कि व्यक्ति कौन-सा दावा कर रहा है। एक दावे को दूसरे के सवाल का जवाब न बनने दें।
अध्याय 10मानव को पशु-परिवार में रखने के प्रमाण क्या हैं?
मिलती शारीरिक बनावट साझा पूर्वज क्यों दिखाती है? अल्लाह एक बनावट दोबारा इस्तेमाल कर सकता था? धुँधली समानता अकेले फैसला नहीं करेगी। बारीकियों का ढाँचा और उसे बेहतर समझाने वाला विवरण देखना होगा।
स्मिथसोनियन का मानव उत्पत्ति कार्यक्रम जीवाश्म, औजार, पुराने जीवन के निशान और डीएनए साथ रखता है। तर्क एक हड्डी, बनाए चेहरे या डार्विन पर भरोसे की माँग पर नहीं टिका।[27]
डीएनए क्या दिखाता है?
डीएनए गुण एक पीढ़ी से दूसरी तक ले जाता है। साझा अतीत से अलग हुए समूह उस अतीत के निशान रखते हैं। उनके डीएनए के कई हिस्से मिलाकर देख सकते हैं कि वे एक ही परिवार के पेड़ की ओर जाते हैं या नहीं।
इन प्रमाणों में मनुष्य और दूसरे बड़े कपि करीबी रिश्ते दिखाते हैं। एक प्रतिशत पूरा तर्क नहीं है। गिने गए हिस्सों और अंतर के प्रकार से संख्या बदलती है। जरूरी बात है कि बहुत-सी बारीकियाँ एक ही अतीत से मेल खाती हैं या नहीं।[28]
रचनाकार कोई भी ढाँचा चुन सकता था, तो यही क्यों चुना? "अल्लाह ऐसा चाहता था" नतीजे में फिट हो सकता है। पर देखने से पहले यह उत्तर हमें किस नतीजे की उम्मीद कराता?
गुणसूत्र 2 उपयोगी प्रमाण क्यों है?
गुणसूत्र डीएनए का पैकेट है। मनुष्य में सामान्यतः 46 और चिंपैंजी में 48 होते हैं। वंशों के पूर्वज साझा हैं, तो फर्क क्यों? वैज्ञानिक पूछ सकते हैं कि किस बदलाव से यह समझ आएगा।
एक विचार है कि मानव वंश में दो पुराने गुणसूत्र जुड़े। मानव गुणसूत्र 2 के भीतर ऐसा ढाँचा मिला जो सिरों के पुराने जुड़ाव से मेल खाता है। आम तौर पर गुणसूत्र के सिरों पर मिलने वाले दोहराते डीएनए अंश भीतर आमने-सामने हैं। आईडो और सहयोगियों ने 1991 में यह प्रमाण बताया।[29]
दो पट्टियों को उनके पुराने सिरों पर जोड़ना सोचिए। जोड़ पर सिरों के निशान केवल मिलता रंग होने से ज्यादा बताएँगे। असली शोध चित्र से ज्यादा बारीक है। उसकी मुख्य बात समझना आसान है।
क्या एक खोज अतीत का हर कदम साबित करती है? नहीं। यह बड़े विवरण से मेल खाती खास खोज है। मनुष्य अलग बनाए गए, यह दावा करने वाले को यह ढाँचा फिर भी समझाना होगा।
जीवाश्म क्या जोड़ते हैं?
अतीत में मानव रिश्तेदार थे जिनमें आज से अलग गुणों के मिश्रण थे। शोधकर्ता गुणों और हड्डियाँ मिलने की जगहों को पढ़ते हैं। कुछ रिश्ते विवादित हैं। कुछ खाली जगहें हैं। लेकिन कमी होने से मौजूद हड्डियों का प्रमाण होना खत्म नहीं होता।
स्मिथसोनियन हमारी प्रजाति होमो सेपियन्स का उभरना अफ्रीका में लगभग तीन लाख साल पहले रखता है। प्रजाति जीवों की एक किस्म है। उसकी सीमा खींचने को सावधान नियम चाहिए। यह समय के साथ आबादियों का विवरण है। इससे एक ठीक-ठीक पहला मानव शिशु नहीं पहचाना जाता।[30]
ऐसा क्षण क्यों माँगें जिसमें पूरी तरह गैर-मानव माता-पिता से पूरी तरह आधुनिक व्यक्ति जन्मा? आबादियों के धीरे बदलाव को बाद में इंसानों के चुने कड़े नामों पर चलना जरूरी नहीं।
साझा रचनाकार वाला जवाब क्या है?
"अल्लाह ने अच्छी योजना दोबारा इस्तेमाल की। इसलिए डीएनए मिलता है।"
दोबारा इस्तेमाल एक संभव विवरण है। क्या वह मिले ढाँचे का अनुमान करता है? उलटा ढाँचा मिलता, तो "अल्लाह विविधता चाहता था" कहकर वह भी समझा देता? हर नतीजे में फिट विवरण को साफ प्रमाण संबंधी माँगें रखने वाले विवरण से बेहतर बनने के लिए अतिरिक्त कसौटी चाहिए।
साझा पूर्वज का विचार कहता है कि समूह पहले के साझा समूहों से निकले। वह ऐसी माँगें करता है और बारीकियों से जाँचा जा सकता है। बिना सीमा का रचनाकार लगभग हर बारीकी में फिट हो सकता है, जब तक अतिरिक्त सीमाएँ न बताई जाएँ।
अल्लाह ऐसा दिखावा बना सकता है कि पूर्वज साझा लगें?
असीम शक्ति के बारे में ऐसा कहा जा सकता है। पर सच अतीत और उसे हूबहू दिखाने के लिए बनाए आभास में फर्क कैसे करेंगे? दूसरी कहानी के खिलाफ प्रमाण क्या होगा?
मैं वह विवरण चुनता हूँ जो प्रमाणों को भ्रामक बनाने के लिए अपुष्ट काम जोड़े बिना मिली बातों से मेल खाता है। यह सबसे अच्छे आधार वाले विवरण का फैसला है। ईश्वर की हर संभव कहानी को प्रतिबंधित कर देने का दावा नहीं।
अध्याय 11क्या आदम और हव्वा ही हमारे सारे पूर्वज हो सकते थे?
पहले दावा समझिए। क्या दो लोग ही पूरे बाद के मानव परिवार के माता-पिता थे और किसी दूसरे समूह से डीएनए नहीं आया? क्या वे दूसरे लोगों के बीच रहते थे? या कहानी शरीर का इतिहास देने के बजाय कोई सीख देती है?
ये अलग दावे हैं। एक को चुनौती देने से सभी गलत नहीं हो जाते।
मैं इस्लामी नाम आदम और हव्वा इस्तेमाल करता हूँ। कुरआन आदम का नाम देता है, लेकिन स्त्री को उनकी पत्नी कहता है, उनका निजी नाम नहीं देता। हव्वा नाम इस्लामी परंपरा में है। सहीह अल-बुखारी 3330 के अरबी पाठ में यह नाम आता है। उसके अंग्रेज़ी अनुवाद में ईव है। कुरआन खुद उन्हें हव्वा नाम नहीं देता।[31][32]
कुरआन 4:1 एक जान और उसके जोड़े की बात करता है। 3:59 आदम को मिट्टी और ईश्वर के आदेश से जोड़ता है। 32:7-9 मिट्टी और फिर संतानों के बनने का वर्णन करता है।[33][34][35] पुराने रचना संबंधी अर्थ इन अंशों पर टिकते हैं। शरीर के अतीत से उनका रिश्ता अगला सवाल है।
केवल दो संस्थापक होने का अर्थ क्या होगा?
बाद का सारा डीएनए उसी जोड़े से गुजरता और उपलब्ध समय में बदलता। मानव परिवार बहुत संकरे रास्ते से निकला होता। पूछ सकते हैं कि मानव डीएनए के विविध ढाँचे उससे मेल खाते हैं या नहीं।
शोध लंबे इतिहास और आपसी आदान-प्रदान वाली आबादियों की ओर जाता है। ली और डर्बिन का अध्ययन पूरे जीनोम से पुरानी आबादियों के आकार का अनुमान लगाने का एक तरीका दिखाता है। जीनोम जीव का पूरा डीएनए-संग्रह है। अध्ययन हाल में अलग-थलग दो संस्थापकों से इंसानों के निकलने का विवरण नहीं देता।[36]
शोध की सीमाएँ भी रखें। उसका "आबादी का प्रभावी आकार" मॉडल में माप है, लोगों की सीधी गिनती नहीं। मॉडल किसी विचार को आँकड़ों से जाँचने की सरल बनाई रूपरेखा है। इस तरीके में बहुत हालिया या थोड़े समय के बदलाव पकड़ने की शक्ति कम है। एक ग्राफ हर समय के हर जीवित इंसान की गिनती नहीं।
क्या एक जोड़े की बहुत संतान हो सकती है?
हाँ। इससे संख्या बढ़ने का सवाल हल होता है। डीएनए वाला सवाल नहीं।
छोटी किताब की दस लाख प्रतियाँ बनाइए। अब दस लाख प्रतियाँ हैं। केवल इस बात से नहीं समझ आता कि उनमें कई तरह के पुराने अंश कैसे आए। प्रक्रिया, पर्याप्त समय और प्रक्रिया का नतीजे से मेल दिखाने वाला प्रमाण चाहिए।
सामान्य विरासत के तहत हाल का एक जोड़ा ही अकेले संस्थापक हो, तो वह व्यापक जीवाश्म और डीएनए विवरण से मेल नहीं खाता। यह दिखावा जरूरी नहीं कि एक अध्ययन ने हर तारीख और जोड़े जा सकने वाले हर चमत्कार को खारिज कर दिया।
क्या "माइटोकॉन्ड्रियल ईव" ही हव्वा हैं?
नहीं। वैज्ञानिक नाम माँ-से-माँ की एक न टूटी वंशरेखा की साझा पूर्वज के लिए है। इसका अर्थ उस समय की अकेली स्त्री नहीं। दूसरी स्त्रियों के वंशज रह सकते हैं, भले उनकी सीधी मातृरेखा बाद में समाप्त हो गई हो।
पिता की सीधी रेखा के साझा पूर्वज का मतलब भी अकेला जीवित पुरुष नहीं। दोनों पूर्वजों का एक समय पर जीना या जोड़ा होना जरूरी नहीं। नाम आदम और हव्वा की पहचान नहीं करते।
एक रेखा पूरा अतीत नहीं बताती। पूरे जीनोम में अलग इतिहास वाले कई हिस्से हैं। इसलिए भी उद्धृत शोध केवल एक रेखा के बजाय कई हिस्से लेता है।[36]
जोड़ा दूसरे लोगों के बीच रहता था, तो?
किसी परिवार के पेड़ में एक जोड़ा साझा पूर्वज बन सकता है, जबकि दूसरे लोग भी योगदान देते हों। किसी पुराने व्यक्ति का पहचाना जा सकने वाला डीएनए अंश बाद वाले में न बचे, तब भी वंशावली का रिश्ता रह सकता है।
यह दावा नहीं कि पूरा मानव डीएनए केवल दो संस्थापकों से गुजरा। इससे बड़ी पुरानी आबादियों वाला सीधा टकराव टलता है। पर नाम वाले जोड़े के जीने, ईश्वर का संदेश पाने या खास भूमिका का प्रमाण क्या है? उन दावों को आधार फिर भी चाहिए।
अल्लाह ने चमत्कार से डीएनए बना दिया हो, तो?
तब विवरण सामान्य विरासत के बाहर गया। उसे कैसे जाँचेंगे? वह कहीं लंबे इतिहास जैसे निशान क्यों छोड़ेगा? अतिरिक्त काम का अलग आधार क्या है?
उत्तर दावे से मेल खाना चाहिए। केवल हाल का जोड़ा ही सारे जैविक संस्थापक था, इस इतिहास को मिले-जुले प्रमाण समर्थन नहीं देते। प्रतीकात्मक कहानी दावा बदलती है। बड़ी आबादी में जोड़ा भी बदलता है। चमत्कार जोड़ने से जाँच सकने वाली बात बदलती है। इनमें से किसी बदलाव से मूल शाब्दिक कहानी वैज्ञानिक खोज नहीं बन जाती।
अध्याय 12क्या कुरआन ने आधुनिक भ्रूण-विज्ञान सिखाया?
भ्रूण जीव के विकास की शुरुआती अवस्था है। कुछ मुस्लिम तर्क कहते हैं कि कुरआन में मानव विकास का ऐसा ज्ञान है जो उस समय किसी इंसान के पास हो नहीं सकता था। सच हो, तो दावा सावधानी से जाँचने योग्य है।
कुरआन 23:12-14 चरणों का वर्णन करता है। शब्दों के अलग अनुवाद हैं। आगे हड्डी और मांस का उल्लेख है। अलका का अर्थ चिपकने वाला रूप या थक्का जैसी धारणाओं से किया जाता है।[37] बचाव करने वाला जोंक से तुलना करे, तो पूछें कि यह अर्थ पाठ में तय है या बाद की तस्वीर से मिलाने को चुना गया।
कौन-सा अनुवाद भविष्यवाणी कर रहा है?
आधुनिक भ्रूण-विज्ञान से पहले वैज्ञानिक बताया अर्थ स्पष्ट था? बाद का ज्ञान डाले बिना शब्दों से निकाला जा सकता है? मुश्किल से मिलने वाले हिस्सों में भी वही अनुवाद संगत रहता है?
शब्द के कई संभव अर्थ हों, तो आधुनिक तस्वीर से मिलता अर्थ चुनकर रोचक तुलना बन सकती है। इससे नहीं दिखता कि पाठ ने खास तौर पर वही तस्वीर पहले से बताई थी।
आसान शब्दों में ठीक वैज्ञानिक दावा माँगें। "भ्रूण का आकार बदलता है" व्यापक बात है। "यह ऊतक इस चरण में इस प्रक्रिया से बनता है" अधिक सटीक है। भविष्यवाणी की ताकत इस फर्क पर निर्भर है।
क्या सारी मांसपेशियों से पहले तैयार हड्डियाँ बनती हैं?
विकास ऐसी कतार नहीं जिसमें पहले नंगा कंकाल पूरा तैयार हो और फिर मांसपेशियाँ पहनाई जाएँ। मांसपेशियों का विकास, कंकाल का ढाँचा, उपास्थि और बाद में हड्डी बनने की प्रक्रियाएँ समय में एक-दूसरे के साथ चलती हैं। बहुत-सी हड्डियाँ उपास्थि के ढाँचे से बनती हैं। उपास्थि पहले से कठोर हड्डी नहीं है।[38]
"हड्डी, फिर मांस" का कड़ा अर्थ शरीर के बढ़ने को गलत बता सकता है। आस्तिक कह सकता है कि आयत मोटे दिखाई देने वाले चरण देती है या "हड्डी" में शुरुआती ढाँचा शामिल है। इससे कथित टकराव बदल सकता है। लेकिन यह दावा भी कमजोर होता है कि शब्द बिल्कुल सटीक, अचूक पाठ्यपुस्तक देते हैं।
लचीली व्याख्या सटीक विज्ञान कहलाएगी?
अंश के कई अर्थ लिए जा सकते हों, तो अल्लाह का इरादा कैसे तय होगा? वैज्ञानिक खोज के बाद अर्थ बदले, तो विज्ञान ग्रंथ से सीख रहे हैं या बाद का विज्ञान उसमें बैठा रहे हैं?
एक उपयोगी कसौटी है: आधुनिक नतीजा न जानने वाले पाठकों को अंश दीजिए। पूछिए कि वे उससे कौन-सी खास खोज निकालते हैं। फिर देखी गई बात से मिलाइए। यह दावे को जाँचने का प्रस्ताव है। मैंने प्रयोग कर लिया, ऐसी रिपोर्ट नहीं।
रीढ़ और पसलियों वाले अंश का क्या?
कुरआन 86:5-7 मानव रचना, उछलते द्रव और रीढ़ व पसलियों के संबंध में निकलने का उल्लेख करता है। क्या निकल रहा है और शारीरिक शब्दों का अर्थ क्या है, इस पर अनुवाद और व्याख्याएँ अलग हैं।[39]
आलोचक को सबसे कमजोर अनुवाद चुनकर मामला खत्म नहीं कहना चाहिए। बचाव करने वाला भी एक अर्थ पर सवाल आते ही दूसरे शारीरिक हिस्से पर नहीं जा सकता।
पूछें, "अरबी वाक्य ठीक किसका उल्लेख है? उस अर्थ का प्रमाण क्या है? वह कौन-सी भौतिक देखी जा सकने वाली बात बताता है?" शरीर का बारीक दावा शरीर के स्रोत माँगता है, बोलने वाले के आत्मविश्वास को नहीं।
क्या पुराना पाठ सही अवलोकन रख सकता है?
हाँ। पुराना होने से कथन गलत नहीं होता। उससे अलौकिक भी नहीं बनता। ईश्वरीय ज्ञान का दावा आज के तथ्य से संभव मेल से ज्यादा दिखाए। सटीकता, ज्ञान के सामान्य रास्ते, दूसरे अर्थ और संयोग से मेल की संभावना जाँचनी होगी।
उचित निष्कर्ष न हर पंक्ति को बेकार कहना है, न कुछ मिलते शब्दों से ईश्वरीय संदेश सिद्ध करना। वैज्ञानिक चमत्कार के तर्क को सबसे बड़े दावे का आधार देना होगा: शब्द खास ज्ञान देते हैं जिसे सामान्य भाषा, अवलोकन या बाद की व्याख्या के मुकाबले ईश्वरीय संदेश बेहतर समझाता है।
अध्याय 13क्या कुरआन ने फैलते ब्रह्मांड की भविष्यवाणी की?
कुरआन 51:47 को ब्रह्मांड के फैलाव की भविष्यवाणी का प्रमाण कहा जाता है। कुछ अनुवाद फैलाने की भाषा लेते हैं। दूसरे विशालता, शक्ति या व्यापक बनाने पर जोर देते हैं। अनुवादों की तुलना इस विविधता को दिखाती है।[40][41]
पहले कथित भविष्यवाणी बताइए। क्या दावा है कि अंतरिक्ष समय के साथ बढ़ता है? कि आकाश बहुत बड़ा है? कि ईश्वर की शक्ति बड़ी है? ये अलग कथन हैं।
क्या खोज पहले ही आयत से निकल सकती थी?
आधुनिक नतीजा मालूम न होता, तो क्या शब्द शोधकर्ता को उसी खास निष्कर्ष पर ले जाते? पाठक किस अवलोकन की उम्मीद करता? उसे कैसे मापता?
नासा का ब्रह्मांडीय इतिहास भौतिक प्रमाणों से फैलाव और आरंभिक गर्म ब्रह्मांड समझाता है। उम्र का अनुमान लगभग 13.8 अरब वर्ष, यानी 1,380 करोड़ वर्ष है। विवरण पहले कुरआन मानने पर निर्भर नहीं है।[4]
धार्मिक दावा आगे जाता है: अंश ने ठीक यही परिणाम पहले बताया, इसलिए वह ईश्वरीय है। शब्दों का संभव मेल बिना अतिरिक्त तर्क इतना भार नहीं उठा सकता।
व्यापक वाक्य वैज्ञानिक सिद्धांत बन जाता है?
मानिए पुरानी कविता कहती है कि आकाश फैल रहा है। वह बाद की खोज से संगत हो सकती है। अपने आप यह नहीं बताती कि क्या फैल रहा है, दर कैसे मापेंगे और कौन-से दूसरे अवलोकन मिलेंगे।
नियम जाँचने के लिए यह गढ़ी मिसाल है। ढीले मेल से मुसलमान उस कविता को ईश्वरीय नहीं मानेगा, तो यहाँ दूसरी कसौटी क्यों?
संगत होने से दिख सकता है कि अंश खोज से टकराना जरूरी नहीं। भविष्यवाणी ज्यादा मजबूत दावा है। ईश्वरीय संदेश का प्रमाण उससे भी मजबूत। हर कदम का बचाव चाहिए।
जुड़े और अलग किए जाने वाला अंश बिग बैंग बताता है?
कुरआन 21:30 आकाशों और धरती को जुड़ा और फिर अलग बताता है। जीवित चीजों को पानी से भी जोड़ता है।[42] सवाल है कि यह आरंभिक ब्रह्मांड का ठीक विवरण है या कई अर्थ लेने वाला व्यापक रचना-चित्र।
वैज्ञानिक विवरण में पृथ्वी आरंभिक गर्म ब्रह्मांड के बहुत बाद बनी। पहले से तैयार धरती को तैयार आकाश से खींचकर अलग करने की शाब्दिक तस्वीर दूसरा मॉडल होगी। बचाव करने वाला वह तस्वीर नकारकर व्यापक अर्थ ले सकता है। तब सटीक वैज्ञानिक भविष्यवाणी के दावे को भी व्यापक बनना पड़ेगा।
पहले श्रोताओं के लिए शब्दों का अर्थ पूछना उचित है। यह भी कि आधुनिक ज्ञान घटना के बाद अर्थ तो नहीं चुन रहा।
रचना के दिनों का क्या?
कुरआन 41:9-12 रचना का क्रम और दिन कहे गए काल देता है। लोकप्रिय आपत्ति दो, चार और दो जोड़कर साफ आठ दिनों का विरोधाभास घोषित करती है। लेकिन चार में पहले दो शामिल पढ़े जा सकते हैं। उद्धृत पृष्ठ का अनुवाद कुल समय इसी तरह पढ़ता है।[43]
यह आसान जोड़ वाली आपत्ति निर्णायक नहीं। बेहतर सवाल क्रम के अर्थ और उसके आधार के हैं। दिन आम दिन हैं या लंबे काल? आकाश भौतिक परतें हैं? अर्थ का ब्रह्मांडीय इतिहास से रिश्ता क्या है?
हर कठिनाई शब्द का अर्थ फैलाकर हल हो, तो किस चीज से रोका जाएगा कि कोई भी पुरानी रचना-कथा आधुनिक विज्ञान के अनुकूल बना दी जाए?
आस्तिक का मजबूत पक्ष
"कुरआन लोगों की समझ की भाषा में निशानियाँ देता है। उसका उद्देश्य भौतिकी की पाठ्यपुस्तक बनना कभी था ही नहीं।"
यह धार्मिक पाठ के उद्देश्य का उचित विवरण है। इससे तर्क बदलता है। पाठ व्यापक संकेत और विचार दे रहा है, तो कोई वाक्य खोज से मिलते ही उसे सटीक वैज्ञानिक शोध की तरह भी नहीं बेचना चाहिए।
लचीले अंश से सिद्ध ईश्वरीय लेखक तक की छलाँग मैं स्वीकार नहीं करता। उसके लिए ठीक भविष्यवाणी, उसका स्पष्ट पुराना अर्थ, प्रमाण और सामान्य इंसानी व्याख्या की अपर्याप्तता दिखाइए।
अध्याय 14विज्ञान की कमी अल्लाह को साबित क्यों करेगी?
"पहला जीवन कहाँ से आया?" अच्छा सवाल है। "इसलिए इस्लाम सच है" बहुत-सी छूटी कड़ियों वाला निष्कर्ष है।
वैज्ञानिक जाँचते हैं कि रसायनों से जीवित व्यवस्थाएँ कैसे उठ सकती हैं। नासा जीवन की उत्पत्ति को खगोलजीव-विज्ञान में रखता है। यह ब्रह्मांड में जीवन की जगह का अध्ययन है। पहले जीवन का पूरा, सहमत पुनर्निर्माण उपलब्ध नहीं है।[26] यह बात बिना झिझक कहनी चाहिए।
अनजान कारण आपका चुना कारण कैसे बन गया?
दीवार के पीछे की आवाज नहीं पहचान पाऊँ, तो केवल उससे नहीं जान जाता कि किसी खास अजनबी ने आवाज की। कारण न जानने से कई संभावनाएँ खुलती हैं। उनमें चुनने को प्रमाण चाहिए।
नास्तिक पहले जीवन का ठोस दावा करे, तो उससे प्रमाण माँगें। वह पूरा उत्तर न जानना बताए, तो उसने छिपकर अल्लाह की रचना स्वीकार नहीं कर ली। अनिश्चितता ज्ञान की अवस्था है, सबसे भरोसे से बोलने वाले को वोट नहीं।
सवाल की कठिनाई से आपका प्रमाण बढ़ता है?
प्राकृतिक व्याख्या में कोई कदम अनुत्तरित है। यह उसकी कमजोरी या बाकी काम है। अपने आप धार्मिक प्रतिद्वंद्वी के गायब प्रमाण नहीं देता।
अल्लाह ने क्या किया? किस प्रक्रिया से? कब? नतीजे का कौन-सा गुण उस काम को प्राकृतिक प्रक्रिया से अलग करता है? जवाब बस "अल्लाह कुछ भी कर सकता है" हो, तो प्रस्ताव ने क्षमता बताई है, घटना दिखाई नहीं।
चेतना पर भी यही नियम है। चेतना यानी जागरूक होने का अनुभव। अनुभव की अधूरी समझ अपने आप मौत के बाद बचने वाली आत्मा नहीं दिखाती। मन के कठिन सवाल को काम चाहिए, खाली जगह में छिपाकर डाला धार्मिक निष्कर्ष नहीं।
प्रमाण निजी अनुभव हो, तो?
प्रार्थना, शांति या ईश्वरीय मौजूदगी के शक्तिशाली अनुभव हो सकते हैं। अनुभव सच्चे मन से बताया गया और महत्वपूर्ण हो सकता है। उसका कारण अलग सवाल है।
व्यक्ति अल्लाह से मुलाकात और शक्तिशाली इंसानी मानसिक अवस्था का फर्क कैसे करेगा? दूसरे धर्म में उतना मजबूत अनुभव उस धर्म को साबित करेगा? अनुभव ऐसे दावों पर ले जाएँ जो दोनों सच नहीं हो सकते, तो भरोसेमंद अर्थ कैसे चुनें?
किसी को झूठा कहे बिना ये सवाल पूछ सकते हैं। व्यक्ति अनुभव ठीक बताए और उसके कारण को गलत समझे, यह संभव है। सामान्य जीवन में भी ऐसा होता है।
ईश्वर ईमानदार लोगों को बिना यकीन क्यों छोड़ेगा?
कुरआन 10:99 कहता है कि ईश्वर चाहता, तो धरती के सब लोग मानते। वह पूछता है कि क्या लोगों को मजबूर किया जाएगा।[44] आस्तिक कह सकता है कि संदेह की जगह वाली दुनिया स्वतंत्रता बचाती है।
क्या साफ प्रमाण स्वतंत्रता मिटा देता है? मैं जानता हूँ कि दूसरे लोग हैं। फिर भी उन्हें भरोसा, प्रेम या आज्ञापालन देना चुन सकता हूँ। शासक का अस्तित्व जानना उसके आदेश सही मानना नहीं है। अल्लाह नैतिक चुनाव खुले रखकर अपना अस्तित्व स्पष्ट क्यों नहीं कर सकता?
जवाब हो सकता है कि आध्यात्मिक विकास को कुछ दूरी चाहिए। पूछें कि कितनी दूरी जरूरी है, उसके असर असमान क्यों हैं और ईमानदार अनिश्चितता पर दंड का जोखिम क्यों हो। विश्वास की साफ वजह चाहना जरूरी तौर पर विद्रोह नहीं है।
नास्तिक को पहले सब कुछ समझाना होगा?
नहीं। कोई दवा काम करती है, यह दावा करे, तो आलोचक हर बीमारी का इलाज निकाले बिना प्रमाण माँग सकता है। दावेदार अपना दावा समर्थित करे। आलोचक दूसरा इलाज पेश करे, तो उस इलाज का आधार देने का दायित्व उस पर आएगा।
उसी तरह वास्तविकता का पूरा सिद्धांत दिए बिना इस्लाम का पेश प्रमाण ठुकरा सकता हूँ। मेरी अनिश्चितता हर संभव अर्थ में नास्तिकता साबित नहीं करती। उससे पेश किया प्रमाण काम भी नहीं करने लगता।
कमी के बाद सही कदम बेहतर सवाल है: पता लगाने में क्या मदद करेगा? वह प्रमाण तक ले जा सकता है। कमी की जगह नाम रख देना जाँच शुरू होने से पहले रोक सकता है।
अध्याय 15किताब सुरक्षित रही, तो क्या वह सच हो गई?
एक डायरी सोचिए जिसका एक शब्द नहीं बदला। मालिक ने लिखा था कि सपना भविष्य बताता है। डायरी सुरक्षित रखने से पता चलेगा कि मालिक ने क्या लिखा। क्या उससे सपना ईश्वर से आया साबित होगा? नहीं। वह अलग दावा है।
दो सवाल अलग रखने होंगे। पाठ अच्छी तरह आगे पहुँचा? और उसके दावे सच हैं? पहले का मजबूत प्रमाण इतिहास के अध्ययन में जरूरी हो सकता है, बिना दूसरे का फैसला किए।
कुरआन 15:9 पाठ की रक्षा का वादा करता है।[45] यह वादा भी जाँच का हिस्सा है। किताब केवल वादा करके वादा निभाना साबित नहीं कर सकती।
पुरानी पांडुलिपि क्या दिखाती है?
पांडुलिपि हाथ से लिखा पाठ है। बर्मिंघम विश्वविद्यालय में कुरआन के चर्मपत्र के दो पुराने पत्ते हैं। चर्मपत्र पशु की खाल से बनता है। रेडियोकार्बन जाँच ने सामग्री को 95.4 प्रतिशत संभावना के साथ 568 से 645 ईस्वी के बीच रखा।[46]
यह असली प्रमाण है। आस्तिक पक्ष को लाभ होने के कारण इसे अनदेखा नहीं करना चाहिए। पर जाँचा क्या गया? पशु की सामग्री। जाँच सीधे नहीं बताती कि स्याही कब लगी। दो पत्ते पूरे आधुनिक कुरआन की हर आयत की जाँच भी नहीं हैं।
हमारे पास पुराने पाठ का प्रमाण है। उसके शब्दों का स्रोत इंसानी था या ईश्वरीय, यह अभी सिद्ध नहीं हुआ।
उस्मान वाला विवरण क्या कहता है?
सहीह अल-बुखारी 4987 पाठ के उच्चारण, यानी पढ़कर सुनाने, पर विवाद बताता है। उसके अनुसार उस्मान ने मानक प्रतियाँ बनवाने और दूसरी लिखित कुरआनी सामग्री जलाने का आदेश दिया।[47]
क्या इससे किताब गढ़ी गई साबित होता है? नहीं। साझा मानक बनाने का लक्ष्य पाठ बचाना और विवाद रोकना हो सकता है। क्या इससे साबित होता है कि पाठ पर कभी इंसानी चुनाव करना नहीं पड़ा? नहीं। उस दावे में भी सावधानी चाहिए।
पूछें कि मानक क्या बनाया गया। अंतर किस तरह के थे? विवरण क्या दिखा सकता है? पुराने लिखित प्रमाण अपने आप क्या पुष्ट कर सकते हैं? लोगों से पहुँचा विवरण और भौतिक लिखित वस्तु अलग तरह के प्रमाण देते हैं।
"बिना बदला" का अर्थ क्या है?
वही व्यापक संदेश? वही व्यंजन? वही वर्तनी? हर स्वीकृत पाठ में ठीक वही ध्वनि? दावे अलग हैं। व्यंजन जैसे क या त, स्वर जैसे अ या इ से अलग होते हैं।
वर्तनी बदलने से शिक्षा बदलना जरूरी नहीं। अर्थ बदलने वाला पाठ केवल वर्तनी कहकर नहीं हटाया जा सकता। ठीक दावा बताइए, फिर उसे जाँचने के उदाहरण और स्रोत दीजिए।
यह अध्याय पाठ का पूरा इतिहास नहीं देता। मुख्य बात पूरी किताब बदलना साबित करने पर निर्भर नहीं है। इंसानी पाठ बहुत अच्छी तरह बचकर भी इंसानी दावे रख सकता है।
आस्तिक का मजबूत जवाब क्या है?
"यह हमारे पक्ष का एक हिस्सा है। भाषा, संदेश, भविष्यवाणियाँ और कुरआन का असर मिलकर अल्लाह की ओर जाते हैं।"
तब हर हिस्से को अपना काम करने दें। ठोस आधार है? क्या वह दूसरे हिस्सों की तरह उसी विवादित दावे पर निर्भर है? कई वजहें तब ज्यादा उपयोगी हैं जब अलग जाँच दें, एक धारणा न दोहराएँ।
पाठ सुरक्षित रखना चमत्कार है, तो सामान्य तरीकों से ऐसा होने की संभावना कैसे निकाली? किस तुलना का आधार है? लिखने, नकल करने, याद करने, संस्थाओं और मानक बनाने ने कितना काम किया?
सामान्य तरीके ईश्वर का काम खारिज नहीं करते। लेकिन वे इस दावे को चुनौती देते हैं कि इंसानी तरीकों से नतीजा समझाया ही नहीं जा सकता।
बिल्कुल सुरक्षित पाठ मानने पर भी क्या बचता है?
फिर भी पूछना होगा कि दुनिया का उसका विवरण प्रमाणों से मेल खाता है या नहीं। उसके नियम मानने और संदेशवाहक को हमारे जीवन पर अधिकार देने की वजह भी चाहिए।
पुरानी पांडुलिपि का महत्व मानने के लिए उसकी आज्ञा मानना जरूरी नहीं। संदेश हम तक पहुँचा, इसका प्रमाण अभी संदेश के सच होने का प्रमाण नहीं।
अध्याय 16पहुँची हुई बात पर भरोसा कैसे तय करें?
हदीस मुहम्मद या शुरुआती संबंधित घटनाओं के बारे में आगे पहुँचाया गया विवरण है। बहुत-से मुसलमान हदीस को मार्गदर्शन का बड़ा स्रोत मानते हैं। सुन्नी और शिया संग्रह अलग हैं। खास विवरण और उनसे निकाले नियमों पर मुसलमानों में भी मतभेद हैं।
सम्मानित संग्रह में विवरण होना उस परंपरा के भीतर मायने रखता है। इससे इतिहास के हर सवाल का जवाब नहीं मिलता। फिर भी पूछना होगा कि जानकारी संग्रहकर्ता तक कैसे आई और कौन-सी जाँच उसका आधार है।
नामों की कड़ी से घटना तय हो जाती है?
कड़ी उन लोगों की पहचान देती है जिनसे विवरण गुजरना बताया जाता है। यह बिना नाम के स्रोत वाली अफवाह से अधिक जानकारी है। पर क्या कड़ियाँ दिखाई गईं? कहने वाले स्वतंत्र थे? कई कड़ियाँ एक पहले स्रोत पर निर्भर हो सकती हैं? पहले गवाह से जोड़े शब्दों का आधार क्या है?
इन सवालों से हर विवरण गलत साबित नहीं होता। आगे पहुँचाए किसी भी विवरण से यही आम सवाल पूछते हैं। भरोसा उचित हो सकता है, लेकिन प्रमाण के अनुपात में होना चाहिए।
यहाँ "प्रामाणिक" का क्या अर्थ है?
हदीस अध्ययन में प्रामाणिकता का निर्णय किसी पद्धति और विद्वानों की परंपरा में होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि आधुनिक प्रयोग में घटना दोहराई गई। पूछें कि कौन-सी पद्धति लगी और उससे क्या दिख सकता है।
आस्तिक संग्रह के अधिकार का आधार दे, तो पूछें कि परंपरा से बाहर का व्यक्ति उसे क्यों स्वीकार करे। जवाब केवल उसी परंपरा की निश्चितता के दावे पर लौटे, तो बाहरी व्यक्ति का सवाल बाकी है।
पसंद के विवरण लें और हर कठिन विवरण छोड़ दें?
सहीह अल-बुखारी 1 नीयत पर जोर देता है। उसी संग्रह के दूसरे विवरण पाठ का मानक बनाना, धर्म बदलने पर दंड और आयशा की शादी की पारंपरिक उम्र बताते हैं।[48][47][49][50]
मुसलमान के पास एक मानने और दूसरे पर संदेह करने की वजह हो सकती है। आलोचक के पास भी। वजह क्या है? पहुँचने की कड़ी, टकराव, संदर्भ या अर्थ पर एक जैसा नियम है? या नतीजा अच्छा लगा तो स्वीकार किया?
मैं कठोर विवरण को निश्चित इतिहास बताकर हर मानवीय विवरण को अविश्वसनीय नहीं कह सकता। वह वही चुनने वाली आदत उलटी करके अपनाना होगा।
केवल कुरआन मानने वाले का क्या?
तब केवल हदीस-संग्रह पर टिकी आलोचना उसके चुने अधिकार पर सीधे नहीं पहुँचती। पूछ सकते हैं कि सीमा वहीं क्यों है और उसके कुरआनी तर्क काम करते हैं या नहीं। जो विवरण वह नकारता है, उसे छिपा हुआ उसका विश्वास नहीं बताना चाहिए।
इससे विवरण व्यापक इतिहास या उसे मानने वाली परंपराओं में गैरजरूरी नहीं होता। उस बातचीत में उचित तर्क बदलता है।
क्या संदर्भ आदेश मिटा देता है?
संदर्भ कथन का अर्थ और संबोधित व्यक्ति बदल सकता है। युद्ध का निर्देश शांतिपूर्ण असहमति के नियम से अलग है। खास घटना सार्वभौम आदेश से अलग है।
लेकिन "संदर्भ था" शुरुआत है। संदर्भ क्या था? प्रमाण क्या है? कौन-से शब्द नियम सीमित करते हैं? पाठ व्यापक है, तो संकरा अर्थ उचित क्यों? विद्वान असहमत हों, तो चुनाव कैसे होगा?
जवाब को यह काम करना चाहिए। संदर्भ शब्द बोलकर चर्चा समाप्त नहीं की जा सकती।
दूसरे के जीवन पर नियम लगाने को कितना भरोसा चाहिए?
विवादित विवरण किसी की निजी इबादत चुनने को पर्याप्त हो सकता है। क्या उतना भरोसा दूसरे की आजादी रोकने या दंड उचित ठहराने को भी काफी है? गलती की कीमत अलग है।
नियम गंभीर नुकसान कर सकता हो, तो अनिश्चितता मायने रखती है। लगाने वाले पर प्रमाण का भारी दायित्व होना चाहिए। मेरी सीधी माँग है: विवादित विवरण को ऐसे इंसान पर निर्विवाद सत्ता मत बनाइए जिसे चुनौती देने का उचित मौका नहीं मिला।
अध्याय 17चमत्कार का विवरण कब भरोसेमंद होगा?
चमत्कार का दावा असामान्य घटना से अधिक मानने को कहता है। अक्सर ईश्वरीय काम और संदेशवाहक का अधिकार भी माँगता है। हर कदम का आधार चाहिए।
कुरआन 54:1 चाँद के फटने का उल्लेख करता है। सहीह अल-बुखारी 4864 में इब्न मसऊद से जोड़ा पारंपरिक विवरण मुहम्मद के जीवन में फटना देखे जाने की बात करता है।[51][52] ये धार्मिक दावे के स्रोत हैं। घटना के स्वतंत्र आधुनिक माप नहीं।
ठीक दावा क्या है?
भौतिक चाँद टूटा और फिर जुड़ा? किसी जगह से दृश्य दिखा? आयत भविष्य का संकेत, पुरानी घटना या उपमा मानी गई है? बचाव करने वाले को अपना विवरण बताना होगा।
आलोचक शाब्दिक घटना के खिलाफ तर्क देकर दूसरे अर्थ वाले व्यक्ति को हरा देने का दावा न करे। दूसरे अर्थ को भी पाठ और अपने प्रमाण समझाने होंगे।
गवाह कितने स्वतंत्र हैं?
सचमुच अलग स्रोतों से कई विवरण आएँ, तो पक्ष मजबूत हो सकता है। दोहराव अकेले कमजोर है। एक मूल कहानी दोहराएँ, तो कहानी ज्यादा फैली। हर बार नया अवलोकन नहीं हुआ।
क्या उसी विश्वास की कड़ी से बाहर स्रोत है? विवरण की तारीख तय कर सकते हैं? क्या उसे ऐसे व्यक्ति ने लिखा जो घटना देख सकता था? दूसरी व्याख्याएँ जाँची गईं? अतीत के हर असाधारण दावे में ये सवाल जरूरी हैं।
हर पुरानी घटना का वीडियो क्यों न माँगें?
क्योंकि वह अनुचित नियम होगा। अतीत की कई सामान्य घटनाएँ बिना कैमरे के समर्थित हैं। दस्तावेज, वस्तुएँ, तारीखें और स्रोतों की तुलना इस्तेमाल होती है।
पर दावे का प्रकार तय करता है कि समझाना क्या है। शासक ने चिट्ठी भेजी और आकाशीय पिंड सचमुच टूट गया, ये बराबर सामान्य नहीं। विवरण का भरोसा उस घटना के बारे में दूसरे ज्ञान के साथ जाँचना होगा।
असाधारण कहना तार्किक रूप से असंभव साबित नहीं करता। बात दिखाई गई मानने से पहले मजबूत प्रमाण माँगने की वजह देता है।
अजीब भौतिक निशान से कहानी साबित होगी?
तभी जब निशान ठीक पहचाना जाए और प्रमाण से घटना से जुड़े। दरार जैसी रेखा की तस्वीर अपने आप चाँद टूटने का चमत्कार नहीं है। निशान क्या है? कैसे बना? दूसरे कारणों से चमत्कार अलग कैसे होगा?
पुस्तक यह दावा नहीं करती कि अंतरिक्ष संस्था ने धार्मिक विवरण प्रमाणित किया। ऐसा दावा हो, तो नाम सहित वैज्ञानिक कथन या शोध माँगें। तस्वीर पर जोड़ी पंक्ति पर्याप्त नहीं।
ईश्वर सारे निशान मिटा सकता है, यह जवाब?
सर्वशक्तिमान ईश्वर चाँद बिल्कुल पहले जैसा बना सकता है, ऐसा कहा जा सकता है। इससे विश्वास के भीतर घटना तार्किक रूप से संभव रहती है। प्रस्तावित भौतिक कसौटी भी हट जाती है।
हर अपेक्षित निशान चमत्कार से मिट सकता है, तो निशान का अभाव निर्णायक खंडन नहीं करता। वैसे ही जाँच अनुपलब्ध बनाकर घटना को भौतिक रूप से सत्यापित नहीं कह सकते। बचा दायित्व ऐतिहासिक गवाही को उठाना होगा।
मेरे अपने चमत्कार के अनुभव का क्या?
कारण तय करने से पहले लिखें कि हुआ क्या। सीधे क्या देखा? दूसरों ने क्या बताया? कौन-से सामान्य कारण जाँचे? स्मृति, संयोग या गायब जानकारी मायने रख सकती है?
व्याख्या गलत होने के लिए आस्तिक का बेईमान होना जरूरी नहीं। ईश्वरीय व्याख्या में पर्याप्त आधार की कमी बताने के लिए नास्तिक के पास पूरी दूसरी कहानी होना जरूरी नहीं।
ऐसी परिस्थितियों में घटना दर्ज हो जो संभव सामान्य कारण हटाती हों, तो गंभीर ध्यान मिलना चाहिए। अगला सवाल फिर भी है: इससे केवल इस्लाम क्यों दिखता है? जिस घटना की वजह नहीं पता, वह अभी अल्लाह का हस्ताक्षर किया संदेश नहीं।
अध्याय 18भविष्यवाणी कब प्रमाण बनती है?
मानिए मैं लिखूँ, "शक्तिशाली देश दुख झेलेगा और फिर उठेगा।" इतिहास का लगभग हर लंबा दौर कोई मेल दे सकता है। साफ घटना, समय-सीमा और पहले बना भरोसेमंद रिकॉर्ड जोड़ दूँ, तो भविष्यवाणी कठिन हो जाती है।
कुरआन 30:2-4 रोमन हार के बाद कुछ वर्षों में जीत बताता है। आम अनुवाद तीन से नौ वर्ष लेते हैं।[53] यह "कभी कोई जीतेगा" से ज्यादा खास है। सटीक जाँच होनी चाहिए।
क्या शब्द घटना से पहले तय थे?
भविष्यवाणी की तारीख किस प्रमाण से है? पुरानी तारीख स्वतंत्र आधार से है या उसी परंपरा से निकाली गई जिसे उससे साबित करना है? संबंधित समय के शब्द कितनी सटीकता से दिखा सकते हैं?
ये प्रमाण के सवाल हैं, देर से लिखे जाने की घोषणा नहीं। मैं देर में लिखना कहूँ, तो आधार मुझे देना होगा। आस्तिक घटना से पहले होना पक्के तौर पर दिखा बताए, तो आधार उसे भी देना होगा।
कौन-सी हार, कौन-सी जीत और शुरुआत कब?
युद्ध में कई उलटफेर होते हैं। दावा लड़ाई, अभियान या अंतिम समझौते का है? समय कब से शुरू? नतीजा देखने से पहले और बाद में नियम एक हैं?
शुरुआत और अंत मनमर्जी से चुनने पर भविष्यवाणी असल से ज्यादा सटीक लग सकती है। उचित तरीका पहले कसौटी तय करके रिकॉर्ड देखता है। अंश कई उचित विकल्प छोड़े, तो अनिश्चितता निष्कर्ष में शामिल होनी चाहिए।
ठोस समय-संदर्भ के लिए विद्वानों की ईरानिका समयरेखा हेराक्लियस की निनेवे के पास जीत 627 और रोम से शांति 628 में रखती है।[54] बचाव करने वाला बताए कि चुनी पुरानी हार और जीत सही सिरे क्यों हैं। आलोचक भी सबसे बाद वाला सिरा ही उचित मानकर न चले। ये पुरानी तारीखें अकेले नहीं बतातीं कि भविष्यवाणी पहली बार कब कही गई।
सही भविष्यवाणी ईश्वरीय ज्ञान साबित करेगी?
वह सही भविष्यवाणी का प्रमाण होगी। अगला सवाल उसकी व्याख्या का है। क्या सामान्य आधार पर घटना बहुत असंभावित थी? जानकार उलटफेर की उम्मीद कर सकते थे? कुल कितनी भविष्यवाणियाँ थीं? असफलताएँ भी गिनी गईं?
सैकड़ों विफल अनुमान छोड़कर एक असंभावित सफलता चुनी न गई हो, तो वह ज्यादा रोचक है। कुल कोशिशों की गिनती में वे कोशिशें भी आती हैं जिनका जश्न नहीं होता। वह गिनती माँगिए।
बहुत तरीके आजमाएँ, तो संख्यात्मक ढाँचा मिल सकता है?
अक्षर, शब्द, आयत और अध्याय संख्या गिनना सोचिए। फिर मनपसंद नतीजे वाला तरीका चुनिए। वर्तनी के नियम बदल सकें, शब्द छोड़ सकें और शुरुआत चुन सकें, तो खोजने की छूट बढ़ती है।
इतनी खोज के बाद मिली आकर्षक संख्या का बल पहले घोषित नियम और बाद में पुष्टि जितना नहीं है। कौन-सा पाठ, कौन-से गिनती नियम, लक्ष्य संख्या और कितने वैकल्पिक ढाँचे आजमाए गए, यह पूछिए।
यह संख्यात्मक चमत्कार के दावे की जाँच का प्रस्ताव है। हर ढाँचा गढ़ा हुआ है, ऐसा नहीं मानता। पूछता है कि नतीजा ईश्वरीय संदेश से बेहतर समझता है या खोजने की प्रक्रिया से।
कुरआन की साहित्यिक चुनौती का क्या?
कुरआन 2:23 विरोधियों से तुलनीय सूरह पेश करने को कहता है।[2] तुलनीय किस अर्थ में? सुंदरता, अभिव्यक्ति, संदेश, लय, ऐतिहासिक प्रभाव या कुछ और? पाठ का ईश्वरीय होना ही विवाद है, तो निष्पक्ष निर्णायक कौन?
कलात्मक उत्कृष्टता असली हो सकती है। उसे तार्किक रूप से ईश्वरीय लेखक नहीं चाहिए। किसी महान कविता की बराबरी न हो, तब भी ईश्वर ने कविता लिखी साबित नहीं होता। असाधारण गुणवत्ता से अलौकिक उत्पत्ति तक अलग तर्क चाहिए।
प्रमाण को क्या बेहतर बनाएगा?
पहले का स्पष्ट रिकॉर्ड, एक अर्थ वाली साफ भविष्यवाणी, सामान्य तरीकों से कठिन अनुमान वाला नतीजा, स्वतंत्र स्रोत की पुष्टि और असफलताओं की उचित गिनती। हर शर्त भ्रम का एक रास्ता घटाती है।
मजबूत भविष्यवाणी पर मैं विचार करूँगा। ढीले मेल को सफलता कहने और मुश्किल पड़ते ही चुपचाप नियम बदलने वाला तरीका स्वीकार नहीं करूँगा। ईश्वरीय सटीकता का दावा सटीक सवाल सहने को तैयार होना चाहिए।
अध्याय 19स्त्रियाँ पुरुषों के लिए बनीं या अपने आप में व्यक्ति हैं?
कोई कहे कि स्त्रियाँ पुरुषों के लिए बनाई गईं, तो मैं ठीक स्रोत और अर्थ माँगूँगा। क्या उसका मतलब बराबर लोगों का साथ है? या स्त्री का उद्देश्य पुरुष की इच्छा पूरी करना है? नैतिक रूप से ये अलग दावे हैं।
कुरआन 4:1 एक जान और उसके जोड़े की बात करता है। उसमें पसली का उल्लेख नहीं। 30:21 जीवनसाथी, सुकून, स्नेह और रहम बताता है। 2:187 कपड़े की ऐसी उपमा देता है जो दोनों ओर जाती है: हर जीवनसाथी दूसरे के संबंध में बताया गया है।[33][55][56]
इन अंशों को ऐसा सीधा कुरआनी वाक्य बनाना गलत होगा कि स्त्री पुरुष की संपत्ति है। मेरी आलोचना को असल में बचाव किए जा रहे विचार तक पहुँचना होगा।
पसली की बात कहाँ से आती है?
सहीह अल-बुखारी 3331 स्त्री को पसली से बना बताता है और टेढ़ेपन की उपमा लेता है। विवरण पुरुषों से स्त्रियों के साथ अच्छा व्यवहार भी कहता है। दोनों बातें स्रोत में हैं।[57]
क्या यह स्त्री की उत्पत्ति का शाब्दिक विवरण, रिश्ते की उपमा या दोनों है? शाब्दिक जैविक दावा मानव प्रजनन और वंश के प्रमाणों के सामने आएगा। उपमा पर उसके सिखाए स्त्री-चित्र के सवाल होंगे।
स्त्री के लिए टेढ़ेपन की उपमा क्यों?
टेढ़ा क्या बताया जा रहा है: व्यक्ति की प्रकृति, कोई आदत या साथी को बदल डालने की पुरुष की गलत माँग? स्त्री सँभाली जाने वाली वस्तु क्यों है? बराबर व्यक्ति क्यों नहीं जो बदले में पुरुष से सवाल करे?
अच्छे व्यवहार की बात पाठ का हिस्सा है। विवरण को स्त्री को जबरन मनमाफिक बनाने की कठोर कोशिशों के खिलाफ चेतावनी समझ सकते हैं। यह उत्पीड़न की अनुमति से बेहतर अर्थ है। फिर भी सवाल है कि पूरे एक लिंग को कमी की उपमा से क्यों दिखाया गया।
पुरुष खुद को स्वभाव से टेढ़ा और स्त्रियों के सावधान प्रबंधन का मोहताज बताए जाने पर आपत्ति करेगा, तो उलटी बात स्त्रियाँ निर्विवाद तारीफ क्यों मानें?
बाद में बना होना मूल्य घटाता है?
नहीं। पसली की कहानी मान भी लें, तो रचना की सामग्री से कम नैतिक मूल्य नहीं निकलता। कहानी में बनाए जाने का क्रम व्यक्ति का मूल्य नहीं मापता।
इब्लीस की आग और मिट्टी की तुलना पहले ही दिखाती है कि सामग्री को दर्जे की सीढ़ी बनाना खतरनाक है। आस्तिक सीधे नहीं मान सकता कि पुरुष से आना स्त्री को अधीन बनाएगा। अतिरिक्त नैतिक तर्क चाहिए।
मेरी राय है कि स्त्री का जीवन उसके लिए मायने रखता है। कहानी उसकी उत्पत्ति पुरुष से जोड़े, तो उसके हित दूसरे दर्जे के नहीं हो जाते। अपने भविष्य पर उसकी आवाज सुनी जानी चाहिए।
साथ देने से सेवा का नियम उचित हो जाता है?
दो लोग एक-दूसरे का सहारा हो सकते हैं। इससे नहीं दिखता कि एक दूसरे का औजार बनकर मौजूद है। स्वतंत्र प्रेम और जन्म से थोपी भूमिका अलग हैं।
पूछें कि स्त्री भूमिका मना कर सकती है? रिश्ता छोड़ सकती है? पढ़, काम और अपना जीवन प्रभावित करने वाले चुनाव कर सकती है? उसकी जरूरत और पुरुष की पसंद टकराएँ, तब क्या? व्यवस्था दोनों को बचाती है या एक को तय करने का स्थायी अधिकार देती है?
सुहावने "साथ" शब्द के पीछे यही व्यवहारिक सवाल छिपे हैं।
कोई मुस्लिम स्त्री शिक्षा स्वीकार करे, तो?
उसकी आवाज ध्यान माँगती है। वह पाठ को सम्मान मान सकती है, पारंपरिक जीवन चुन सकती है या अलग अर्थ दे सकती है। सहमत होने से मैं उसका अज्ञानी होना नहीं निकाल सकता।
उसका निजी चुनाव असहमत स्त्री के अधिकार तय भी नहीं करता। स्वैच्छिक भूमिका दूसरे पर मजबूर की जाए, तो जबरदस्ती बनती है। नैतिक कसौटी यह है कि स्वतंत्रता दोनों को मिलती है या नहीं।
स्त्री का उद्देश्य पुरुष की उससे चाह से तय हो, यह दावा मैं नकारता हूँ। धार्मिक अर्थ यही माँगे, तो नैतिक बचाव चाहिए। "बनाई गई" दोहराना बचाव नहीं देता।
अध्याय 20लिंग से अधिकार, पैसा या गवाही क्यों तय हो?
किसी सामाजिक परिस्थिति में नियम समझ आया हो, फिर भी सबके लिए उचित नहीं हो सकता। धार्मिक कानून हमेशा का कहा जाए, तो पूछना होगा कि लोगों की भूमिकाएँ और योग्यताएँ बदलें तब भी सत्ता का बँटवारा स्थिर क्यों रहे।
तीन अंश ठीक तरह पढ़ने होंगे: कुरआन 4:11 में विरासत, 2:282 में कर्ज के गवाह और 4:34 में शादी का अधिकार।[58][59][60]
क्या हर स्त्री को पुरुष की आधी विरासत मिलती है?
नहीं। यह व्यापक कथन गलत है। बताए इंतजाम में आयत बेटे को बेटी का दुगना हिस्सा देती है। दूसरे उत्तराधिकारियों और परिस्थितियों के अलग नियम हैं। गंभीर आलोचना अपना चुनौती दिया इंतजाम पहचाने।
आस्तिक बचाव अक्सर बड़े पुरुष हिस्से को आर्थिक कर्तव्यों से जोड़ता है। फिर पूछें कि लिंग स्थिर कसौटी क्यों है। बेटी रिश्तेदारों को संभालती हो और बेटा नहीं, तो? दोनों के बराबर कर्तव्य हों, तो? असली बोझ से हिस्सा तय हो सकता है?
सामाजिक कर्तव्य बदलने से इस्तेमाल बदलना उचित है, तो किस तरीके से बदलाव की अनुमति है? बदलाव ही मना है, तो जन्म की श्रेणी असली परिस्थिति से ऊपर क्यों?
गवाही वाला अंश हर मामले पर है?
कुरआन 2:282 लिखित कर्ज के इंतजाम का है। बताई परिस्थिति में दो पुरुष या एक पुरुष और दो स्त्रियाँ हैं, ताकि एक स्त्री दूसरी को याद दिला सके। आयत खुद हर विषय पर स्त्री की बात पुरुष की आधी कहती है, यह कहना लापरवाही है।
छोटा सवाल फिर भी गंभीर है। इस आर्थिक मामले में निर्णायक शर्त लिंग क्यों? ज्ञान, ध्यान और भरोसेमंदी क्यों नहीं? अनुभवी आर्थिक विशेषज्ञ स्त्री को दूसरी स्त्री चाहिए, पर अनुभवहीन पुरुष पर वह शर्त नहीं, तो क्यों?
बचाव में इतिहास में कारोबार के अनुभव तक पहुँच बताई जा सकती है। वही नियम की वजह है, तो अनुभव बदले तब नियम उसके साथ बदलता है? स्थिर रहता है, तो ऐतिहासिक सफाई मौजूदा आपत्ति का पूरा उत्तर नहीं।
पति को कौन-सा अधिकार मिलता है?
कुरआन 4:34 पुरुष की भूमिका को खर्च उठाने से जोड़ता है और वैवाहिक विवाद के कदम बताता है। दरबा कहकर चर्चा किए अरबी क्रिया-रूप पर आधुनिक अर्थ बहुत अलग हैं। बहुत-से पारंपरिक अर्थ सीमित शारीरिक कार्रवाई लेते हैं। कुछ आधुनिक पाठक अहिंसक अर्थ देते हैं। उद्धृत अनुवाद और टिप्पणी यह विवाद दिखाते हैं।[60]
एक अर्थ को "हल्का" कहने से तय नहीं होता कि एक जीवनसाथी को दूसरे पर अनुशासन का अधिकार होना चाहिए। पत्नी को वैसा अधिकार है? गलत व्यवहार किसने तय किया? कोई भी दूसरे का अधिकार सुरक्षित होकर मना कर सकता है?
पति को पत्नी पर शारीरिक अनुशासन लगाने का स्थायी अधिकार मैं अस्वीकार करता हूँ। वयस्क साथी उसके सुधार के नीचे बच्चा नहीं। धार्मिक बचाव बराबर दर्जे का उत्तर दे, केवल प्रहार की तीव्रता सीमित न करे।
एक से ज्यादा पत्नी का क्या?
कुरआन 4:3 न्याय की शर्त से दो, तीन या चार पत्नियों का बताया इंतजाम स्वीकार करता है। न्याय न कर पाने का भय हो, तो एक कहता है। शुरुआती संदर्भ अनाथों का है।[61]
नियम स्त्रियों से बुरा व्यवहार करने की असीम अनुमति नहीं। असमान अनुमति का बचाव फिर भी चाहिए। पुरुष को इस रूप में बहुविवाह और स्त्री को उलटा अधिकार क्यों नहीं? शामिल हर वयस्क का जानकार, स्वतंत्र चुनाव है? कोई जीवनसाथी मना करे, तो क्या होता है?
ऐतिहासिक सुधार अंतिम नैतिक नियम हो सकता है?
बचाव करने वाला पहले के व्यवहार से सुधार दिखा सकता है। प्रमाण हो, तो सुधार मानने योग्य है। लेकिन "पहले से बेहतर" और "हर इंसान के लिए सबसे उचित नियम" अलग दावे हैं।
मेरा सवाल दूसरे पर है। व्यक्तियों की भूमिकाएँ, ज्ञान और जरूरतें अलग हैं, तो ईश्वरीय व्यवस्था लिंग के आसपास सत्ता क्यों जमा दे? बचाव ऐसे कारणों से हो जिन्हें कीमत चुकाने वाला व्यक्ति पूछ और परख सके।
अध्याय 21क्या बच्चा विवाह के लिए जरूरी सहमति दे सकता है?
सहीह अल-बुखारी 5133 कहता है कि मुहम्मद ने आयशा से छह वर्ष की उम्र में शादी की और नौ वर्ष में यौन संबंध शुरू हुआ। इस सुन्नी स्रोत में यही विवरण छपा है।[50] यह गंभीर विवरण है। किसी व्यक्ति को पवित्र कहने से बताया आचरण हानिरहित नहीं हो जाता।
दो सवाल पूछने हैं। क्या विवरण उम्र का ठोस ऐतिहासिक प्रमाण देता है? और बताया आचरण सही था या गलत? पहले दावे पर सवाल करके भी दूसरे का साफ उत्तर दे सकते हैं।
उम्र पर कितनी निश्चितता है?
सुन्नी हदीस के उपयोग में विवरण खूब स्वीकार है। कुछ विद्वान उसके पहुँचने पर प्रश्न करते हैं। जोशुआ लिटिल का ऑक्सफर्ड शोध पढ़ता है कि उम्र के विवरण किससे किस तक पहुँचे और कहानी ने रूप कब लिया।[62]
यह एक विद्वान का पक्ष है, इतिहास पढ़ने वाले सबकी तय राय नहीं। विवरण धर्म में ऊँचा स्थान रखकर भी स्रोत के सवाल सह सकता है। मैं किसी दूसरी ठीक उम्र को तय तथ्य जानने का दावा नहीं करता।
बताई उम्र मानने वालों के लिए नैतिक सवाल साफ है। क्या बताया आचरण हर समय के लिए आदर्श होना चाहिए?
माता-पिता की हामी बच्चे की सहमति है?
माता-पिता बच्चों के कई निर्णय लेते हैं। इससे उन्हें बच्चे को मनमानी वयस्क भूमिका में डालने का अधिकार नहीं मिलता। सहमति स्वतंत्र और जानकारी सहित हामी है। व्यक्ति चुनाव समझे और बिना भय या दबाव मना कर सके।
छोटा बच्चा पूरे जीवन पर चुनाव का असर समझ सकता है? बहुत अधिक शक्ति वाले वयस्क को सुरक्षित मना कर सकता है? उसी वयस्क पर निर्भर हो, तो बोली हुई हाँ पर्याप्त है? शर्तें वयस्कों ने चुनीं, तो अपनी आजादी का प्रमाण बच्चा क्यों दे?
मेरा जवाब सीधा है। माता-पिता की हाँ बच्चे की देखभाल की जरूरत को वयस्क सहमति नहीं बनाती। रिवाज की अनुमति से छोटे बच्चे और वयस्क की शादी सही हो जाती है, यह मैं नकारता हूँ।
"उस समय सामान्य था" से फैसला हो जाता है?
समय की परिस्थिति काम समझाने में मदद करती है। अपने आप उसे सही नहीं बनाती। आम प्रथा भी नुकसान कर सकती है। नैतिक आदर्श हर समय का है, तो बचाव एक समय के रिवाज पर क्यों निर्भर है?
आस्तिक कह सकता है कि धर्म परिपक्वता और सुरक्षा माँगता है। परिपक्वता चुनाव समझने और उसका भार उठाने की तैयारी है। बच्चा तैयार है, कौन तय करेगा? उसकी जरूरत की आवाज कौन है? यौवनारंभ, रिवाज निभाना और जानकारी वाली वयस्क सहमति अलग चीजें हैं।
जिन्हें मासिक धर्म नहीं हुआ, उनके बारे में कुरआन क्या कहता है?
कुरआन 65:4 तलाक के बाद प्रतीक्षा अवधि देता है। उसमें जिन्हें मासिक धर्म नहीं हुआ, वे भी हैं। उद्धृत इब्न कसीर टिप्पणी में कम उम्र की, अभी मासिक धर्म शुरू न हुई लड़कियाँ शामिल हैं। कुछ आधुनिक पाठक दूसरे अर्थ देते हैं। पर छोटी लड़कियों वाला पुराना अर्थ आलोचकों की बनाई बात नहीं।[63][64]
कुरआन 33:49 बताई परिस्थिति में अंतरंग संपर्क से पहले समाप्त विवाह के लिए प्रतीक्षा अवधि नहीं रखता।[65] दोनों अंश साथ पढ़ें। इससे समझ आता है कि आलोचक 65:4 में छोटी लड़कियों की शादी की अनुमति क्यों पूछते हैं। कोई अंश हर बच्चे को शादी का आदेश नहीं देता।
आधुनिक मुसलमान बालविवाह नकारे, तो?
उस इनकार से उचित नैतिक सिद्धांत बचता है। पूछें कि उसकी वजहें क्या हैं और पारंपरिक स्रोतों से रिश्ता कैसे है। विवरण नकारा गया? आचरण अपने समय तक सीमित है? अलग अर्थ का बचाव है?
उत्तर दिखाता है कि बच्चे की जरूरत से टकराने पर धर्म स्वीकार किया अर्थ सुधार सकता है या नहीं। बालविवाह का विरोधी मुसलमान हर पुरानी व्याख्या का बचाव करने को बाध्य नहीं। पर बताए कि कौन-सा अर्थ नकारना कैसे तय करता है।
स्रोत के विवाद से मैं नैतिक सवाल धुँधला नहीं करूँगा। बच्चों के जीवन पर वयस्क दावों से उन्हें सुरक्षा चाहिए। ऐतिहासिक व्यक्ति का गहरा सम्मान वह सुरक्षा कमजोर करने की पर्याप्त वजह नहीं।
अध्याय 22इंसान का मालिक होना नैतिक कैसे हो सकता है?
इंसान की अपनी इच्छाएँ, भय और जीवन हैं। दूसरे को उस पर मालिकाना दावा क्यों मिले? दयालु मालिक से स्वामित्व खुद सही हो जाएगा? भोजन और छत छोड़कर जा सकने की आजादी का स्थान ले सकते हैं?
कुरआन 4:24 निषिद्ध संबंधों के अंश में स्वामित्व के नीचे स्त्रियों से जुड़ा अपवाद रखता है। 90:13 बंधन से किसी को आजाद करना सराहता है।[66][67] दूसरी शिक्षा नैतिक रूप से जरूरी है। वह पहला सवाल खत्म नहीं करती।
संस्था को नियंत्रित करना उसका न्याय साबित करता है?
नियम पुराने नुकसान को सीमित करके भी उसे समाप्त नहीं कर सकता। बेहतर व्यवहार स्थिति सुधार सकता है। इससे व्यक्ति का मालिक होना उचित नहीं दिखता।
नियम स्वामित्व स्वीकार करके मुक्ति की तारीफ भी करे, तो पूछें कि मुक्ति मालिक की इच्छा पर क्यों है। आजादी स्थायी अधिकार की जगह दी जाने वाली कृपा क्यों?
मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा नैतिक और अधिकार की कसौटी पर दासता नकारती है।[68] मैं इनकार इसलिए अपनाता हूँ कि स्वामित्व व्यक्ति का जीवन दूसरे की शक्ति के नीचे रखकर बराबर दर्जा नकारता है। घोषणा प्रयोगशाला का परिणाम नहीं। नैतिक कारणों का बचाव फिर भी चाहिए।
धीरे सुधार वाला जवाब क्या है?
आस्तिक कह सकता है कि दासता दुनिया में गहरी बैठी थी। अचानक समाप्त करने से निर्भर लोगों को नुकसान होता। अच्छे व्यवहार के नियम और मुक्ति के रास्ते सुधार के कदम बताए जाते हैं।
यह इतिहास और कारगर तरीके का दावा है, स्वामित्व अच्छा होने का प्रमाण नहीं। अगले सवाल हैं: ईश्वरीय कानून लोगों के मालिक होने के खिलाफ साफ अंतिम नियम क्यों नहीं दे सकता था? स्पष्ट प्रतिबंध के साथ भोजन, घर और कमाई बचाने का बदलाव नहीं कर सकता था?
सर्वशक्तिमान कानूनदाता दूसरी जमी प्रथाएँ रोक सकता है, तो इंसानी स्वामित्व को साफ निंदा से परे संस्था क्यों रखे?
कैद में स्वतंत्र हामी संभव है?
बंदी की आजादी पहले ही सीमित है। मालिक सुरक्षा, साधन और आवाजाही नियंत्रित कर सकता है। ऐसे में स्वतंत्र चुनाव और निर्भरता में मानने का फर्क कैसे करेंगे?
जीवित रहने को व्यक्ति बाहर से हामी दे सकता है। उससे व्यवस्था बराबर नहीं होती। क्या बिना दंड मना कर सकता है? जा सकता है? सत्ता रखने वाले के खिलाफ स्वतंत्र न्याय माँग सकता है?
धार्मिक स्रोत से स्वामित्व में अंतरंग संबंध उचित बताए जाएँ, तब ये सवाल खास जरूरी हैं। नैतिक मुद्दा प्रभुत्व के नीचे सहमति का है। दयालु व्यवहार का दावा शक्ति का अंतर हल नहीं करता।
बाद में शादी या मुक्ति से स्थिति सुधरे, तो?
सुधार असली हो सकता है। उससे पहले की जबरदस्ती न्याय नहीं बनती। किसी को अपने नीचे करने के बाद मदद देने से उसे वहाँ रखने का अधिकार नहीं दिखता।
आस्तिक ऐतिहासिक युद्ध के नियम और आज के व्यवहार में फर्क कर सकता है। तब सीमा साफ बताए। स्वामित्व सिद्धांत में नकारा गया है या आज की परिस्थिति में केवल उपलब्ध नहीं? कोई पुरानी परिस्थिति लौटने का दावा करे, तो वापसी क्या रोकेगी?
क्या हर मुसलमान को दासता का बचाव करना होगा?
नहीं। मुसलमान अपनी नैतिक समझ और धार्मिक पाठ के अर्थ से उसका विरोध कर सकते हैं। व्यक्ति को उसके असली पक्ष से आँकना चाहिए। मेरा सवाल हर उस विवरण से है जो सही अधिकारी की अनुमति पर अब भी स्वामित्व नैतिक मानता है।
अधिकारी का औचित्य क्या है? केवल अल्लाह ने अनुमति दी, तो जाँचना होगा कि अनुमति ईश्वरीय क्यों मानें और उस नाम से नैतिक सवाल कैसे सुलझा।
मैं लोगों का स्वामित्व अस्वीकार करता हूँ। आजादी मालिक की मर्जी पर रखने वाली व्यवस्था केवल मालिक को दया सिखाकर इस आपत्ति का उत्तर नहीं देती। स्वामित्व के नीचे व्यक्ति को स्वामित्व ही चुनौती देने का मौका चाहिए।
अध्याय 23क्या व्यक्ति आजादी से इस्लाम छोड़ सकता है?
धर्म में जा सकते हैं लेकिन निकल नहीं सकते, तो कितने आजाद हैं? धमकी विश्वास ईमानदार बना सकती है? सुरक्षा के लिए चुप रहें, तो आस्था के दिखावे से ज्यादा क्या मिला?
कुरआन 2:256 धर्म में जबरदस्ती नहीं कहता है। 4:137 विश्वास, अविश्वास, फिर विश्वास और फिर अविश्वास वाले लोगों का उल्लेख करता है। वह ईश्वर के फैसले की बात करता है।[69][70]
विश्वास स्वतंत्र होने के मुस्लिम तर्क में ये अंश जरूरी हैं। सवाल है कि यह स्वतंत्रता दूसरी जगह के कठोर विवरण से कैसे जुड़ती है।
छोड़ने पर मौत वाला विवरण क्यों है?
सहीह अल-बुखारी 6922 में इस्लामी धर्म बदलने वाले को मारने का आदेश शामिल है। उसी विवरण में आग को सजा की तरह इस्तेमाल करने पर असहमति भी है।[49]
यह सुन्नी स्रोत में है। बचाव कठिन है, इसलिए छिपाना नहीं चाहिए। पर इससे हर आज का मुसलमान शांतिपूर्ण इस्लाम छोड़ने वालों की हत्या चाहता है, यह साबित नहीं होता।
कुछ मुस्लिम अर्थ निजी विश्वास बदलने और राज्य के विरुद्ध विद्रोह माने कामों में फर्क करते हैं। दूसरे व्यापक पुराना नियम मानते हैं। पूछें कि कौन-सा अर्थ और उसका आधार क्या है। बस मानना छोड़ देने वाले शांतिपूर्ण व्यक्ति के साथ क्या होगा?
मन बदलना हिंसक विद्रोह है?
नहीं। व्यक्ति धर्म छोड़कर भी दूसरों के अधिकार मान सकता है। हिंसक अपराध करे, तो उसके अपने प्रमाण से फैसला करें। विश्वास बदलने से अपराध मत मान लें।
शांत अविश्वास को दंड योग्य बनाने वाली हानि क्या है? व्यक्ति की हानि या समूह का सदस्यों पर नियंत्रण घटना? कोई इस्लाम अपनाए और दूसरा धर्म उसे मार दे, तो स्वीकार करेंगे?
आखिरी सवाल नियम जाँचता है। मेरे धर्म में आने का अधिकार, पर जाने का नहीं, आपकी सोच की आजादी से ज्यादा मेरे समूह की शक्ति बचाता है।
मुसलमान छोड़ने के अधिकार का बचाव कर सकता है?
हाँ। दार अल-इफ्ता का हालिया पाठ विश्वास की स्वतंत्रता पर कुरआन 2:256 लेता है और धर्म थोपना नकारता है।[71] इससे मुस्लिम संस्था का स्वतंत्र विश्वास के लिए तर्क देना दिखता है। सारे कानूनी विवाद खत्म होना नहीं।
वह मत दंड वाले विवरण को कैसे पढ़ता है? शासक की सीमा क्या है? शांत पूर्व मुसलमान को इस्लाम अपनाने वाले जैसी सुरक्षा है? उत्तर असली व्यक्ति को बचाने जितना साफ होना चाहिए।
भावना आहत होना सजा की पर्याप्त वजह है?
आलोचक रूखा, गलत या अनुचित हो सकता है। उसके दावे उत्तर और सुधार माँग सकते हैं। व्यक्ति पर धमकी या हमला, नबी के ईश्वर की ओर से बोलने के दावे को नकारने से अलग काम है।
धर्म लोगों पर शासन का अधिकार माँगे, तो उन्हें उस दावे पर सवाल की आजादी चाहिए। वरना सत्ता का औचित्य कैसे जाँचेंगे?
वही नियम मुसलमानों को बचाता है। मैं इस्लाम पर सवाल का अधिकार माँगकर मुसलमानों से अपने विचारों पर सवाल का अधिकार नहीं छीन सकता। केवल अपने पक्ष का अधिकार विशेषाधिकार है, बराबर स्वतंत्रता नहीं।
मैं किस सिद्धांत का बचाव करता हूँ?
लोग विश्वास मानने, बदलने, न मानने और वजहों पर चर्चा के लिए स्वतंत्र हों। मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद 18 और 19 यही मानक देते हैं।[68] मैं इसका बचाव इसलिए करता हूँ कि लोग गलत हो सकते हैं और बराबर दर्जे के योग्य हैं। नास्तिकता की मेरी पसंद उनके अधिकार का स्रोत नहीं है।
धमकी बोलना रोक सकती है। गलत दावा सच नहीं बना सकती। बाहर की धार्मिक हामी से यह भी नहीं पता चलता कि व्यक्ति समझकर माना।
मैं विश्वास के शांतिपूर्ण बदलाव पर दंड नकारता हूँ। शांत संदेह करने वाला मौत का पात्र नहीं। ऐसी सजा का बचाव करने वाला बताए कि समूह की वफादारी की माँग ईमानदार निष्कर्ष के अधिकार से बड़ी क्यों है।
अध्याय 24दुआ के बाद अच्छा हुआ, तो क्या अल्लाह ने हस्तक्षेप किया?
कोई दुआ करता है और बाद में अच्छी खबर मिलती है। वह अल्लाह का जवाब कहता है। ईश्वरीय हस्तक्षेप और वैसे भी हो जाने वाली घटना में कौन-सा प्रमाण फर्क करता है?
कुरआन 2:186 ईश्वर को करीब और पुकारने वाले को उत्तर देता बताता है।[72] आस्तिकों के लिए दावा अर्थपूर्ण है। किसी खास भौतिक असर की जाँच के लिए "दुआ जीवन में मायने रखती है?" से अधिक साफ सवाल चाहिए।
किस नतीजे का वादा था?
स्वास्थ्य सुधरना, सहने की ताकत, क्षमा या इस जीवन के बाद की भलाई? ये अलग नतीजे हैं। ठीक होने की जाँच एक साथ सब नहीं मापती।
दावा दुआ से चिकित्सकीय नतीजा सुधरने का है, तो तुलना जरूरी है। अतिरिक्त दुआ बिना मिलते लोगों का क्या हुआ? दूसरी देखभाल बराबर थी? नतीजे के नियम परिणाम देखने से पहले तय थे?
प्रमाण के तर्क को देखभाल बंद करने का निर्देश कभी न समझें। दुआ करें या न करें, इलाज के फैसलों में उचित देखभाल और योग्य सलाह चाहिए।
एक बड़े प्रयोग में क्या मिला?
STEP अध्ययन में हृदय बाईपास शल्यक्रिया वाले 1,802 लोग थे। दूसरों द्वारा तय तरीके से की प्रार्थना के तहत समूहों की तुलना हुई। सौंपी गई प्रार्थना से ठीक होने का लाभ नहीं मिला। जिस समूह को निश्चित पता था कि उसके लिए प्रार्थना हो रही है, उसमें उसी अध्ययन में जटिलताएँ अधिक थीं।[73]
यह उसी तरीके और परिस्थिति का नतीजा है। प्रमाण नहीं कि दुआ हमेशा नुकसान करती है, हर आध्यात्मिक अनुभव झूठा है या कोई ईश्वर हो नहीं सकता। शोध से वह सवाल नहीं हल करवाना चाहिए जो उसने जाँचा नहीं।
"ईश्वर परीक्षा नहीं देता" से प्रमाण का दावा बचता है?
आस्तिक कह सकता है कि अल्लाह मशीन नहीं और जाँच की शर्तों में काम मना कर सकता है। मत के भीतर ईश्वरीय आजादी बचती है। दुआ के असर वैज्ञानिक रूप से दिख जाने का दावा भी सीमित होता है।
खराब नतीजा खिलाफ नहीं गिन सकते क्योंकि ईश्वर मना कर सकता है, तो अच्छा नतीजा अकेले पक्ष में क्यों गिनें? दोनों के साथ निष्पक्ष नियम क्या होगा?
केवल सफलता की कहानियाँ चुनी जा रही हैं?
हजारों दुआ करें, तो कुछ को मनचाहा नतीजा मिलेगा। कितनों को नहीं मिला? उनकी कहानियाँ बराबर सावधानी से दर्ज हुईं? क्या दुआ बिना सफलता की उम्मीद थी?
बहुत तीर फेंककर बाद में सबसे अच्छे झुंड के आसपास घेरा खींचना सोचिए। तस्वीर प्रभावशाली लग सकती है और लक्ष्य का चुनाव छिपा सकती है। दुआ के प्रमाण में नतीजे से पहले माँग जानें और असफलताएँ भी गिनें।
मिसाल तर्क की समस्या बताती है। हर दुआ की कहानी सुनाने वाला जानकर प्रमाण चुनता है, यह दावा नहीं।
फिर भी दुआ व्यक्ति की मदद कर सकती है?
रीति दिलासा, ढाँचा या उम्मीद व्यक्त करने का रास्ता दे सकती है। निजी महत्व और बाहर की घटना बदलने की क्षमता अलग सवाल हैं। दुआ के बाद शांति महसूस हो, तो अकेले उससे अलौकिक जवाब कारण नहीं पहचाना जाता।
मुसलमान दुआ करके नुकसान घटाने का काम भी कर सकता है। मत को निष्क्रियता जरूरी नहीं। मेरी आपत्ति मनचाही घटना से सिद्ध ईश्वरीय कारण तक की छलाँग पर है।
कथित जवाब के बाद क्या पूछूँ?
क्या माँगा, कब लिखा, क्या हुआ, दूसरी व्याख्या क्या है और असफल माँगें कैसे गिनीं? जवाब हो कि ईश्वर अपनी चुनी माँगें सुनता है, तो पूछें कि उसके चुनाव को सामान्य घटनाओं से अलग करने का प्रमाण क्या है।
अच्छी खबर पर कृतज्ञता समझ आती है। खबर के कारण के दावे को अपना प्रमाण चाहिए।
अध्याय 25सही-गलत जानने के लिए अल्लाह जरूरी है?
बच्चे को चोट लगे, तो पीड़ा उसके लिए मायने रखती है। मदद की वजह पाने के लिए उसका धर्म जानना जरूरी नहीं। ईश्वर हो या न हो, वादा टूट सकता है और व्यक्ति को धोखा मिल सकता है।
यह नैतिक सोच की शुरुआत है। हर कठिन सवाल का हल नहीं। इससे दिखता है कि "अल्लाह बिना सब जायज है" को दोहराव की जगह तर्क चाहिए।
काम अच्छा है क्योंकि अल्लाह का आदेश है?
हाँ, तो आदेश मिलते ही कोई भी काम अच्छा हो सकता है? निर्दोष पर क्रूरता स्वीकार करता आदेश हो, तो ईश्वरीय नाम सवाल तय कर देगा? नहीं, तो हम मान चुके कि कथित आदेश को जाँचने में कुछ नैतिक वजहें मायने रखती हैं।
मजबूत धार्मिक जवाब है कि आदेश ईश्वर की जरूरी अच्छी प्रकृति से निकलते हैं। ईश्वर बुराई का आदेश नहीं देगा। इससे मनमाने नियम बनाते शासक की तस्वीर टलती है।
तब पूछें कि अच्छी प्रकृति कैसे पहचानते हैं। खास आदेश उसी से आया, इसका प्रमाण क्या है? आदेश क्रूर लगे, तो गलत अर्थ और ईश्वरीय अधिकार के गलत दावे में फर्क कैसे होगा?
मतभेद से नैतिकता असली नहीं रहती?
दवा और इतिहास में भी मतभेद हैं। मतभेद अकेले नहीं दिखाता कि हर उत्तर बराबर अच्छा है। वजहें तुलना करने के तरीके चाहिए।
नैतिकता में पूछ सकते हैं कि किसको हानि, किसको लाभ, सहमति स्वतंत्र है, मिलते मामलों को समान नियम मिलता है और सत्ता के दुरुपयोग पर सवाल संभव है या नहीं। ये स्वचालित जवाब नहीं। बचाव साफ करने की कसौटियाँ हैं।
कोई कहे कि ईश्वर मना न करे तो दुख अप्रासंगिक है, तो पूछें कि पीड़ित की पीड़ा का अपना वजन क्यों नहीं। आदेश जुड़ने से दुख सहने वाले के लिए क्या बदलता है?
मुसलमान असली नैतिक वजहें दे सकता है?
बिल्कुल। कुरआन 4:135 अपने या रिश्तेदारों के खिलाफ होने पर भी न्याय कहता है। 4:40 ईश्वर की ओर से अन्याय नकारता है।[74][75] ये शिक्षाएँ आस्तिकों को उचित व्यवहार माँगने का आधार देती हैं।
सवाल है कि वजह केवल पवित्र पाठ में होने से काम करती है? निष्पक्ष न्याय अच्छा है, तो प्रभावित लोगों के आधार पर क्यों समझा सकते हैं? समझा सकें, तो वजह अलग विश्वासों में चर्चा योग्य है। नहीं, तो अनुचित नियम को वैसा अधिकार देने वाले विरोधी धर्मग्रंथ को कैसे जाँचेंगे?
अच्छाई की अकेली प्रेरणा दंड का डर है?
दोस्त की परवाह हो सकती है क्योंकि दोस्त मायने रखता है। वादा रख सकते हैं क्योंकि दूसरे उस पर निर्भर हैं। क्रूरता का विरोध हो सकता है क्योंकि पीड़ित पर असर समझते हैं।
धार्मिक आशा और भय भी आचरण को प्रेरित कर सकते हैं। सवाल है कि उनके बिना अच्छा काम असंभव है? नास्तिकता की परिभाषा से देखभाल, वफादारी या संयम का अभाव नहीं निकलता।
अल्लाह में विश्वास अच्छे आचरण की गारंटी भी नहीं। पहचान व्यक्ति के काम और वजहों की जाँच की जगह नहीं है।
क्या विज्ञान पूरा नैतिक नियम-संग्रह साबित करता है?
नहीं। विज्ञान असर दिखाने में मदद करता है: किसे चोट लगी, क्या हानि घटाता है, नीति ने क्या बदला। क्या मूल्यवान मानना चाहिए, उसके लिए नैतिक आधार भी लेते हैं। आधार तर्क का शुरुआती कथन है।
मेरे आधारों में दुख, स्वतंत्र सहमति और बराबर दर्जे का महत्व है। कोई पूछ सकता है कि इन्हें क्यों मानता हूँ। हमारा नुकसान सह सकना साझा है। हर व्यक्ति के पास औजार की तरह बरते जाने का विरोध करने की वजह है। इन्हीं से बचाव करता हूँ।
आस्तिक के नैतिक आधार भी सवाल सहते हैं। शुरुआत को ईश्वरीय कहने से भरोसे की वजह पूछना बंद नहीं होता।
नैतिक आलोचना का फिर क्या होता है?
वह जाँची जा सकने वाली वजहों की माँग बनती है। मैं पूर्ण नियम-संग्रह रखने का दिखावा किए बिना धार्मिक नियम की आलोचना कर सकता हूँ। बेहतर तर्क पर अपना फैसला बदल भी सकता हूँ।
बदलने की क्षमता ताकत है। रोकी जा सकने वाली हानि करने वाला नियम केवल संस्था के अंतिम कह देने से सुरक्षित नहीं होना चाहिए। मैं बचाव के कारणों और उसके नीचे जीने वालों पर असर से नियम परखता हूँ।
अध्याय 26नबी को खास छूट क्यों मिले?
नेता अपने लाभ का खास नियम बताए, तो हम वजह पूछते हैं। पाठ नबी को खास अधिकार दे, तब भी यही सवाल चाहिए।
कुरआन 33:50 मुहम्मद के लिए विवाह संबंधी अनुमतियाँ देता है। एक को बाकी आस्तिकों के बजाय केवल उनके लिए बताता है।[76] अगला सवाल है कि नियम ईश्वर से आया, यह क्यों स्वीकार करें।
अपवाद से झूठ साबित होता है?
नहीं। कुछ भूमिकाओं को अलग नियम चाहिए। न्यायाधीश, चिकित्सक या माता-पिता के कर्तव्य और अधिकार दूसरों से अलग हो सकते हैं। खास नियम अकेले धोखे का प्रमाण नहीं।
पर नियम से लाभ पाने वाला ही अनुमति देने वाला संदेश दे, तो जाँच क्या है? सच्चे ईश्वरीय आदेश और बोलने वाले की इच्छा पूरी करते नियम का फर्क कैसे होगा?
लाभ मिलने भर से मैं मन नहीं पढ़ सकता। हितों के टकराव का सवाल कर सकता हूँ। यानी व्यक्ति का अपना लाभ उस फैसले को प्रभावित कर सकता है जिस पर वह दूसरों का भरोसा चाहता है। जोखिम कैसे जाँचा जाता है?
ठीक यही नियम जरूरी क्यों है?
बचाव करने वाला नबी की शादियों के सामाजिक या राजनीतिक कारण दे सकता है। हर शादी के लिए कारण जाँचें। सभी के अच्छे उद्देश्य थे, यह कहना हर दावे के प्रमाण की जगह नहीं।
अच्छे उद्देश्य को ठीक यही नियम क्यों चाहिए था? दूसरे रास्ते से हो सकता था? कीमत किसने चुकाई? शामिल लोग आपत्ति के लिए स्वतंत्र थे?
उत्तर केवल "अल्लाह ने चुना" हो, तो विवादित संदेश अपने ही बचाव में लौट आया। धर्म से बाहर व्यक्ति को मानने की वजह अभी चाहिए।
ज़ैद वाला अंश क्या कहता है?
कुरआन 33:37 ज़ैद, उनकी शादी के अंत और बाद में उसी स्त्री से मुहम्मद के विवाह का उल्लेख करता है। उद्देश्य गोद लिए बेटों की पूर्व पत्नियों से जुड़ा बताता है।[77] इस्लामी परंपरा स्त्री का नाम ज़ैनब बिन्त जहश बताती है।
गोद लिया बेटा जन्म से बेटा नहीं। आलोचक इसे जन्म के रिश्तेदारों के बीच विवाह का गलत दावा न बनाए। असली सवाल सत्ता, शामिल वयस्कों और सामाजिक नियम बदलने के कथित संदेश के हैं।
नियम बदलने का चुना रास्ता निजी विवाह क्यों? पाठ के अपने दावे के बाहर ईश्वरीय उद्देश्य का प्रमाण क्या है? इंसानी कानून का बदलाव इसे समझा सकता है?
नबी का सम्मान सवाल समाप्त कर सकता है?
व्यक्ति को पहले ही पूर्ण आदर्श तय कर दें, तो हर काम उसी तस्वीर में जबरन बैठा सकते हैं। आचरण परखने से पहले तर्क का अंत चुन लिया गया।
दूसरे धर्म के संस्थापक के लिए यही तरीका मानेंगे? उसके हर काम को स्वीकारने के लिए कथित ईश्वरीय आदेश पर्याप्त होगा? नहीं, तो यहाँ कसौटी क्यों घटाएँ?
आस्तिक के पास मुहम्मद पर भरोसे का व्यापक तर्क हो सकता है। उसे बताएँ और अलग जाँचा जाने दें। ईश्वर की ओर से बोलने का अधिकार संदेश को साबित नहीं कर सकता, जब वही संदेश उस अधिकार का अकेला प्रमाण हो।
उचित निष्कर्ष क्या है?
खास अधिकार अकेले नहीं दिखाते कि नबी जानकर संदेश गढ़ रहे थे। इरादे और अतीत के उस दावे को अधिक प्रमाण चाहिए। अधिकार वजह पूछने का ठोस कारण जरूर देते हैं।
किसी को पवित्र कहने से सामान्य जाँच रोक देने की माँग मैं नकारता हूँ। दूसरों के जीवन पर अधिकार का दावा प्रमाण की जरूरत बढ़ाता है, मिटाता नहीं। अपवाद के साथ जीने वालों को उसके न्याय की वजह पूछने का अधिकार है।
अध्याय 27युद्ध के किस आदेश का बचाव हो रहा है?
युद्ध के अंश से कुछ शब्द लेना तर्क को बहुत तीखा बना सकता है। गलत भी बना सकता है। जानना होगा कि किससे कहा गया, कौन-सा संघर्ष था, सीमाएँ क्या हैं और नियम सदा का बताया जा रहा है या नहीं।
कुरआन 9:5 में बहुदेववादियों से जुड़ा लड़ने का आदेश है। पास की 9:4 समझौता निभाने वालों की संधि बचाती है। 9:6 विरोधी समूह के शरण चाहने वाले की रक्षा और सुरक्षित पहुँच का निर्देश देती है।[78][79][80]
आसपास के ये नियम ईमानदार अर्थ का हिस्सा हैं। "यह आयत हर मुसलमान से हर जगह हर गैर-मुसलमान को मारने को कहती है" उस क्रम का उचित सार नहीं।
संदर्भ नैतिक सवाल सुलझा देता है?
नहीं। वह बताता है कि सवाल कौन-सा पूछें। अंश खास युद्ध का है, तो उसके दावे किए आधार और सीमाएँ जाँचें। कोई आज लागू करे, तो नए इस्तेमाल का औचित्य पूछें।
आक्रमणकारी कौन है, यह किस प्रमाण से? संधि टूटना कौन तय करे? न लड़ने वाले को क्या सुरक्षा? दुश्मनी का आरोप सहने वाला उसे चुनौती दे सकता है?
नियम संदर्भ सहित भी अन्यायपूर्ण हो सकता है। संदर्भ दायरा बताता है, अपने आप नैतिक स्वीकृति नहीं देता।
सीमाओं और शांति का क्या?
कुरआन 2:190 लड़ाई को समुदाय से लड़ने वालों से जोड़ता है और सीमा लाँघना रोकता है। 8:61 दूसरा पक्ष शांति की ओर आए, तो शांति की ओर आने को कहता है।[81][82] मुसलमान इनसे युद्ध की सीमाओं का बचाव कर सकता है।
फिर पूछें कि इनका दूसरे अंशों और बाद के अर्थों से रिश्ता क्या है। सुरक्षा दोनों तरफ है? दूसरे धर्म के शांत व्यक्ति को बराबर सुरक्षा है? शासक विरोधियों को दुश्मन बताने के लिए धर्म ले, तो क्या होता है?
मैं ऐसा नियम चाहता हूँ जिसे शासक का निशाना चुनने से पहले जाँचा जा सके। शासक धर्मी है, यह वादा उन लोगों को नहीं बचाता जिनके अधिकार उस फैसले पर हैं।
धर्म से राजनीतिक दर्जा क्यों बदले?
कुरआन 9:29 बताए धार्मिक विरोधियों से लड़ाई और जिज्या का भुगतान शामिल करता है।[83] बचाव में ऐतिहासिक कर, सुरक्षा और सैन्य कर्तव्य बताए जा सकते हैं। इतिहास का दावा जाँचने में बारीकियाँ जरूरी हैं।
वे अकेले स्थायी धार्मिक ऊँच-नीच उचित नहीं करतीं। शांत व्यक्ति के अधिकार धर्म अपनाने पर क्यों टिकें? कर नागरिक कर्तव्य के लिए हैं, तो धार्मिक दर्जा बनाए बिना बराबर शर्तों पर कर्तव्य और कर क्यों नहीं?
व्यवस्था क्यों बनी, उसका ऐतिहासिक विवरण और आज लोग क्यों स्वीकारें, उसका नैतिक तर्क अलग काम हैं।
ताकत धार्मिक सच का प्रमाण है?
युद्ध जीतने से ईश्वर संबंधी मत साबित नहीं होता। राजनीतिक सफलता के कई कारण होते हैं। हारने से मत गलत भी नहीं होता। जीत ईश्वरीय साथ और हार परीक्षा है, तो कौन-सा परिणाम दावा चुनौती देगा?
साम्राज्य की पहुँच को प्रमाण बताएँ, तो भी यही समस्या है। राज्य ताकत से विश्वास फैला सकता है। इससे उसके फैलाव का हिस्सा समझ आता है, दावों की सच्चाई नहीं।
मैं कौन-सा सिद्धांत मानता हूँ?
हिंसा से लोगों की रक्षा उनकी सुरक्षा और अधिकारों से उचित हो सकती है। धर्म के विस्तार को अलग बचाव चाहिए। मत मनवाने या स्थायी धार्मिक अधीनता के लिए जबरदस्ती मैं नकारता हूँ।
फैसला शक्ति इस्तेमाल करने वाले हर पक्ष पर लागू है। मुसलमान की सुरक्षा गैर-मुसलमान जितनी जरूरी है। आलोचना का बल नियम के असर और वजहों में है, आबादी से दुश्मनी में नहीं।
नियम इतना साफ माँगें कि बचाव करने वाले के अपने समुदाय पर भी लागू हो सके। वही व्यवहार दूसरे धर्म से नकारे, तो असमान कसौटी की सफाई उसे देनी होगी।
अध्याय 28निजी रिश्ते को धार्मिक अनुमति क्यों चाहिए?
दो वयस्क आजादी से रिश्ता चुनें, तो उसे नैतिक रूप से गलत क्या बनाता है? पहचानी हानि, टूटा वादा, जबरदस्ती या धोखा? या केवल धार्मिक अधिकारी का प्रतिबंध?
सहमति हर नैतिक सवाल नहीं सुलझाती। लोग ऐसे काम पर सहमत हो सकते हैं जो दूसरों को हानि दे। लेकिन जबरदस्ती का न होना और शामिल लोगों के हित जरूरी हैं। गंभीर प्रतिबंध बताए कि किस गलत काम को रोकता है।
लूत की कहानी क्या कहती है?
कुरआन 7:80-81 में लूत की फटकार और पुरुषों का पुरुषों की ओर इच्छा से जाना है। 29:29 विवरण में दूसरे गलत काम भी रखता है।[84][85] पारंपरिक यौन प्रतिबंध और कहानी के दायरे के आधुनिक तर्क अर्थ के मुद्दे हैं।
बचाव में कहानी केवल जबरदस्ती, आक्रामकता या दूसरी गलतियों की निंदा बताई जाए, तो पूछें कि वह अर्थ अंश के सारे शब्द कैसे समझाता है। हर सहमति वाले समलैंगिक रिश्ते पर लागू किया जाए, तो पूछें कि कौन-सी हानि रिश्ते को गलत बनाती है।
पाठ का होना नैतिक तर्क समाप्त नहीं करता। वह बताता है कि किस दावे का बचाव चाहिए।
"अप्राकृतिक" कहना गलत होना समझाता है?
प्राकृतिक का अर्थ आम, जैविक रूप से पैदा, इंसान से न बना या नैतिक रूप से उचित हो सकता है। अर्थ अलग हैं। क्या होता है, इसका तथ्य अकेले नहीं तय करता कि क्या होना चाहिए।
दवा प्राकृतिक प्रक्रिया बदलकर भी मदद कर सकती है। प्राकृतिक प्रक्रिया भारी हानि कर सकती है। प्रकृति से नैतिक नियम चाहिए, तो बताएँ कि चुना गुण लोगों के अधिकार क्यों तय करे।
यह अध्याय हर प्राकृतिक व्यवहार अच्छा होने पर नहीं टिका। ठप्पे से हानि और स्वतंत्रता का विवरण बदल देने वाला छोटा रास्ता नकारता है।
समुदाय की असहजता से नियंत्रण उचित है?
दूसरे अलग जीएँ, तो लोगों को परेशानी हो सकती है। भावना असली है। अपने आप दूसरे के जीवन पर शासन का अधिकार नहीं दिखाती।
गैर-मुस्लिम समुदाय की असहजता से मुस्लिम इबादत या शादी रोकना उचित होगा? नहीं, तो यहाँ बचाव वाले प्रतिबंध से फर्क क्या है? संगत नियम अपने धर्म को केवल प्राथमिकता दिए बिना फर्क समझाए।
स्वेच्छा से चुने धर्म के कर्तव्यों का क्या?
वयस्क कठिन धार्मिक नियम चुन सकता है। यह अर्थपूर्ण निजी प्रतिबद्धता हो सकती है। अगले सवाल न चुनने वालों, छोड़ने वालों या थोपे नियम से हानि पाने वालों के हैं।
क्या बिना धमकी असहमत हो सकते हैं? मदद पा सकते हैं? समुदाय का फैसला नकारकर भी बुनियादी गरिमा रख सकते हैं? कर्तव्य स्वतंत्र प्रतिबद्धता पर है, तो उसे मना कर सकने की वास्तविक क्षमता चाहिए।
प्रतिबंध की आलोचना को आस्तिकों का तिरस्कार चाहिए?
नहीं। आस्तिक दूसरे की परवाह करते हुए भी मेरे नकारे नियम को मान सकता है। सही निशाना नियम, उसका औचित्य और उसके नाम की जबरदस्ती है। पूरी आबादी एक मन नहीं।
मेरा नैतिक पक्ष साफ है: केवल प्रतिबंध बताने से व्यक्ति का समलैंगिक रिश्ता गलत नहीं दिखता। बचाव में असली लोगों और हानियों का उत्तर देने वाली वजहें चाहिए। धार्मिक ढाँचे के बाहर रिश्ता होने से बराबर दर्जा गायब नहीं होना चाहिए।
जवाब "अल्लाह बेहतर जानता है" हो, तो?
पूछें कि बोलने वाला कैसे जानता है कि अल्लाह क्या माँगता है और संदेह करने वाले पर वह दावा क्यों चले। अधिकार का दावा खुला है। कोई दूसरा अनदेखे अधिकारी की नापसंदगी बताए, केवल उससे स्वतंत्रता नहीं छिननी चाहिए।
नैतिक सोच को प्रमाण और सुधार की जगह चाहिए। प्रभावित लोगों को जवाब न देने वाले नियम ने बिना सवाल आज्ञापालन अर्जित नहीं किया।
अध्याय 29ईश्वरीय नाम से कठोर सजा न्यायपूर्ण हो जाती है?
सजा व्यक्ति का जीवन हमेशा के लिए बदल सकती है। लगाने से पहले पूछें कि उद्देश्य क्या है, दोष कितने भरोसे से साबित है, भूल कैसे सुधरेगी और कम हानिकारक तरीका लोगों को बचा सकता है या नहीं।
कुरआन 5:38 चोरी पर शारीरिक दंड बताता है। 24:2 ज़िना पर शारीरिक दंड देता है। ज़िना निषिद्ध यौन संबंधों का शब्द है।[86][87] आयतें अकेले बाद के इस्लामी कानून का हर विवरण नहीं देतीं। विचारधाराएँ शर्त, अपवाद और प्रमाण की चर्चा करती हैं।
सुरक्षा-शर्तें आपत्ति का जवाब हैं?
सुरक्षा-शर्तें जरूरी हैं। कुरआन 24:4 आरोप के गवाहों की जरूरत और बिना आधार के आरोप की सजा भी बताता है।[88] आलोचक दंड बताकर ऐसे न दिखाए कि प्रमाण के मानक हैं ही नहीं।
अगला सवाल है कि वे शर्तें पर्याप्त हैं या नहीं और दोष निश्चित होने पर भी दंड उचित है या नहीं। पूरी तरह सिद्ध अपराध पर भी अत्यधिक सजा हो सकती है। प्रमाण और अनुपात अलग मुद्दे हैं।
सजा का काम क्या है?
दूसरों की सुरक्षा? आगे अपराध रोकना? पीड़ित का नुकसान भरना? दोष जताना? अलग उद्देश्य अलग उत्तर दे सकते हैं। पूछें कि कौन-सा उद्देश्य और क्या प्रमाण है कि कम हानिकारक तरीके से यह दंड बेहतर काम करता है।
भय कुछ काम रोक सकता है। इससे हर डरावनी सजा न्यायपूर्ण नहीं होती। शासक छोटे अपराध पर भयानक दंड से डरा सकता है। फिर भी कीमत की उचितता पूछेंगे।
फैसला गलत हो, तो क्या?
नुकसान लौटाया जा सकता है? झूठे आरोप, गलत गवाह या अधिकारी के दुरुपयोग की जिम्मेदारी किसकी? व्यवस्था इंसानी निर्णय की गलती मानती है? या ईश्वरीय कानून का दावा गलती मानना कठिन करता है?
पूर्ण ईश्वरीय संदेश मानने वाला भी पहचाने कि अर्थ और लागू करना इंसानों का काम है। ईश्वरीय स्रोत न्यायाधीश को सर्वज्ञ नहीं बनाता। न लौटने वाली सजा में फर्क बेहद जरूरी है।
भूख से चोरी की नैतिक जाँच बदलेगी?
कारण और परिस्थितियाँ मायने रखते हैं। लालच, जबरदस्ती और तत्काल भूख से बचने के लिए लेना अलग नैतिक स्थितियाँ हैं। बचाव करने वाला कह सकता है कि कानूनी परंपरा फर्क पहले से मानती है।
तब पूछें कि कमजोर व्यक्ति को ठीक कौन-सा नियम बचाता है और सुरक्षा पक्की है या नहीं। अच्छा न्यायाधीश समझ जाएगा, इससे तय नहीं होता कि बुरा या गलत न्यायाधीश क्या कर सकता है।
यह सिद्धांत की नैतिक जाँच है, किसी देश के मौजूदा कानून की सलाह नहीं। आज के कानूनी सवाल को जगह का वास्तविक कानून और तथ्य चाहिए।
ईश्वर का आदेश कहकर क्यों न मान लें?
क्योंकि कानूनदाता की पहचान ही विवादित दावों में है। आदेश की प्रामाणिकता कैसे तय हुई? सही अर्थ कौन-सा? अधिकार पर संदेह करने वाला उसके इस्तेमाल को चुनौती का हक क्यों खोए?
कानून अच्छा है, तो बचाव करने वाला अच्छाई समझाए। अच्छाई केवल आज्ञापालन है, तो नैतिक बचाव की जगह समर्पण की माँग आ गई।
परंपरा इस्तेमाल सुधार सकती है?
हाँ, तो सुधार की वजहें क्या? उन्हें खुले में जाँचें। नहीं, तो मजबूत प्रमाण रोकी जा सकने वाली हानि या बेहतर सुरक्षा का विकल्प दिखाएँ तब क्या होगा?
पवित्र दर्जा सजा को नैतिक जाँच से ऊपर रखता है, यह मैं नकारता हूँ। दंडित व्यक्ति वास्तविक कीमत चुकाता है। उसे अपराध, प्रमाण और उपलब्ध विकल्पों का उत्तर देने वाली वजहें चाहिए। पाठ की श्रद्धा अकेले यह भार नहीं उठाती।
अध्याय 30जवाबों के बाद क्या बचता है?
मेरा निष्कर्ष है कि यहाँ जाँचे तर्क इस्लाम का दावा किया ईश्वरीय अधिकार नहीं दिखाते। मानव वंश का मजबूत भौतिक आधार है। हाल का केवल एक संस्थापक जोड़ा मिले-जुले प्रमाणों से समर्थित सामान्य जैविक इतिहास में फिट नहीं होता। सुरक्षित पाठ, चमत्कार का विवरण या गहरा भावनात्मक अनुभव अकेले ईश्वरीय संदेश साबित नहीं करता।
प्रभुत्व उचित बनाने को अधिकार पर्याप्त मानने वाले नैतिक बचाव भी मैं नकारता हूँ। बच्चे को सुरक्षा चाहिए। इंसान संपत्ति नहीं हो सकता। शांत संदेह दंडनीय नहीं होना चाहिए। ये फैसले दुख, स्वतंत्रता और बराबर दर्जे की वजहों पर हैं। मैंने वजहें साफ की हैं, माप के रूप में छिपाई नहीं।
क्या पुस्तक ने हर संभव ईश्वर का न होना साबित किया?
नहीं। इस्लाम के तर्क की विफलता नास्तिकता का हर रूप साबित नहीं करती। एक शाब्दिक रचना-दावे के खिलाफ वैज्ञानिक खोज विकासक्रम से काम करने वाले ईश्वर को नहीं मिटाती। किसी मत पर नैतिक आपत्ति अपने आप उसकी उत्पत्ति का पूरा इतिहास नहीं देती।
सीमित निष्कर्ष फिर भी बड़ा है। विश्वास और आज्ञापालन माँगने वाला दावा केवल इसलिए उनका पात्र नहीं कि विकल्प में सवाल बाकी हैं। मैं खोज जारी रखकर भी विश्वास रोक सकता हूँ।
कौन-से जवाब गंभीरता से लेने चाहिए?
"ईश्वर का ज्ञान चुनाव मजबूर नहीं करता।" यह सीधे जबरन करवाने के आसान दावे का उत्तर है। फिर रचना, नियंत्रण और परिस्थितियों की जिम्मेदारी पूछें।
"आदम और हव्वा अकेले जैविक पूर्वज नहीं थे।" इससे आनुवंशिक दावा बदलता है। प्रस्तावित जोड़े और उसके खास दर्जे का प्रमाण पूछें।
"कुरआन नैतिक संकेत देता है, विज्ञान की पाठ्यपुस्तक नहीं।" इससे अतिशाब्दिक वैज्ञानिक अर्थ टल सकता है। फिर पूछें कि खास अंश सटीक भविष्यवाणी बताकर क्यों प्रचारित होते हैं।
"कठोर विवरण अविश्वसनीय या सीमित संदर्भ के हैं।" पद्धति, उसके प्रमाण और हर जगह एक जैसा इस्तेमाल पूछें।
"इस्लाम का अर्थ बराबर स्वतंत्रता बचाने वाला हो सकता है।" पूछें कि कठिन पाठ कैसे समझाता है और व्यवहार में शांत लोगों को सुरक्षा मिलती है? उचित सुधार का उसकी उचित वजहों के लिए स्वागत होना चाहिए।
मुझे कौन-से दावे छोड़ने चाहिए?
बिना जैविक लिंग का ईश्वर तार्किक रूप से असंभव है, यह छोड़ना चाहिए। सभी मुसलमान विकासक्रम नकारते हैं या दंड पर एक मत हैं, यह भी। पसली की कहानी और हव्वा नाम को सीधे कुरआन का बताना भी।
छपी हदीस हर ऐतिहासिक सवाल तय करती है, यह नहीं कहूँ। प्रार्थना के एक प्रयोग को हर दुआ का प्रमाण न बनाऊँ। खास छूट से मुहम्मद के निजी इरादे पढ़ लेने का दावा न करूँ।
कमजोर दावे हटने से असली सवाल सामने रहते हैं। तर्क अधिक माँग करता है, क्योंकि जवाब को सच में चुनौती दी बात का सामना करना होगा।
मेरा मन क्या बदलेगा?
भरोसेमंद स्वतंत्र प्रमाण बदल सकता है। ऐसा ठोस तर्क भी जिसके शुरुआती आधार जाँच सहें और निष्कर्ष किए दावे तक पहुँचे। कथित ईश्वरीय संदेश सामान्य उचित व्याख्या से बाहर स्पष्ट पहले की जानकारी दे, तो गंभीर जाँच चाहिए।
तब भी पूछूँगा कि प्रमाण क्या दिखाता है। जिस घटना की वजह नहीं पता, वह जाँच माँग सकती है। उससे जुड़े हर नैतिक नियम का सही होना अपने आप सिद्ध नहीं होता। शक्तिशाली सत्ता का अस्तित्व उसकी नैतिक पूर्णता अपने आप नहीं दिखाता।
असली बातचीत का अंत कैसा हो?
सहमति, सीमित मतभेद या जाँचने के स्रोत पर खत्म हो सकती है। अपमान पर खत्म होना जरूरी नहीं। कोई "मुझे नहीं पता" कहे, तो ईमानदार उत्तर रहने दें। पूछें कि क्या इससे दूसरों से विश्वास माँगने का उसका भरोसा बदलता है।
मुझे न पता हो, तो वैसी ईमानदारी मैं भी दूँ। मेरी नास्तिकता प्रमाण के लिए खुली रहे। वरना बिना सवाल विश्वास की आदत रखकर मैंने केवल उसका विषय बदला।
भगत सिंह की मिसाल पूछते रहने की वजह देती है कि शक्ति पूजनीय और दुख स्वीकार्य क्यों हो।[1] हर दावे की अपनी जाँच का कर्तव्य उससे नहीं हटता।
मैं इस्लाम को इस जाँच से छूट नहीं देता। किसी किताब, नबी या संस्था को नहीं मिलनी चाहिए। दावा मजबूत है, तो अगला सवाल सहे। कमजोर है, तो धमकी उसे मजबूत नहीं करेगी।
सवालबातचीत में साथ रखने के सवाल
जवाब हो: "अल्लाह ने बनाया"
कौन-सी देखी बात समझानी है? प्रस्तावित कारण उसे कैसे समझाता है? उस कारण का आधार क्या है? वह दूसरा कारण छोड़कर अल्लाह की पहचान क्यों करता है? आगे कौन-सा प्रमाण इस्लाम दिखाता है?
गंभीर पहले-कारण का तर्क आए, तो उसके असली आधार जाँचें। केवल शुरू होने वाली चीजों का तर्क "ईश्वर को किसने बनाया?" दोहराने से नहीं कटेगा।
जवाब हो: "यह परीक्षा है"
नतीजा पहले जानने वाले के लिए क्या हासिल करती है? इतना खतरा क्यों? यही परीक्षार्थी और परिस्थितियाँ क्यों? कम हानि से वही भलाई संभव थी? वादे का फैसला निष्पक्ष कैसे जानते हैं?
चुनाव वास्तविक बनाने का दावा और ईश्वर को नतीजा सीखने की जरूरत, दोनों अलग रखें।
जवाब हो: "स्वतंत्र इच्छा से बुराई समझ आती है"
कौन-सी बुराई? बिना इंसानी चुनाव की हानि का क्या? चुनाव बचाकर रचयिता नुकसान सीमित क्यों नहीं कर सकता था? परिस्थितियाँ बनाने वाले को छोड़कर जिम्मेदारी केवल काम करने वाले को दी जा रही है?
मानें कि चुनाव जानना उसे सीधे मजबूर करना नहीं। फिर रचना, अनुमति और नियंत्रण पूछें।
जवाब हो: "अल्लाह का लिंग नहीं"
यहाँ लिंग का ठीक अर्थ क्या है? पशु का शरीर नहीं, तो जैविक लिंग क्यों लगेगा? कौन-से गुण वास्तव में बताए जा रहे हैं? अर्थ और आधार क्या हैं?
लिंगहीन सत्ता अपने आप विरोधाभास है, यह दिखावा न करें। अस्तित्व और बताए चरित्र के प्रमाण पर जाएँ।
जवाब हो: "विकासक्रम केवल सिद्धांत है"
विज्ञान में सिद्धांत का अर्थ क्या है? विरासत के देखे बदलाव, डीएनए का ढाँचा, जीवाश्म या उम्र, किस प्रमाण को नकारते हैं? दूसरा विवरण बारीकियों का बेहतर अनुमान कैसे करता है? उसे गलत क्या दिखाएगा?
जीवन की उत्पत्ति और बाद के जैविक बदलाव के प्रमाण अलग रखें।
जवाब हो: "आदम और हव्वा हमारे पूर्वज हैं"
अकेले जैविक संस्थापक या बड़ी आबादी में जोड़ा? हाल में या बहुत पहले? सामान्य विरासत या अतिरिक्त चमत्कार? हर रूप क्या अनुमान करेगा? नाम वाले जोड़े का प्रमाण क्या है?
कुरआन के शब्द, बाद में नाम देने वाली परंपरा और आधुनिक आनुवंशिक मॉडल अलग रखें।
जवाब हो: "कुरआन ने विज्ञान पहले बताया"
ठीक कौन-सा नतीजा? कौन-से शब्द दिखाते हैं? खोज से पहले अर्थ स्पष्ट था? दूसरे अर्थ क्या हैं? संभव मेल ईश्वरीय लेखक दिखाता है या केवल संगति?
आकर्षक तस्वीर या वाक्य से पहले सटीक दावा माँगें।
जवाब हो: "पवित्र स्रोत में है"
कौन-सा स्रोत, अंश और अनुवाद? कुरआन, हदीस या टिप्पणी? अधिकार कौन मानता है? इतिहास के दावे का आधार क्या है? नैतिक नियम की अलग वजह क्या है? दूसरे धर्म का यही तर्क मानेंगे?
सही उद्धरण पाठ की बात दिखाकर भी उसकी सच्चाई और अधिकार खुले छोड़ सकता है।
जवाब हो: "तब सामान्य था"
सामान्य यानी आम या सही? प्रथा से क्या हानि हुई? प्रभावित व्यक्ति मना कर सकता था? उदाहरण सदा का है, तो सीमित समय का बचाव क्यों? आज इसी मुद्दे पर कौन-सा सिद्धांत चले?
बालविवाह, स्वामित्व और असमान सत्ता पर पूछें। उनके अलग इतिहास एक जैसे न बताएँ।
जवाब हो: "ईश्वर की बुद्धि समझ नहीं सकते"
क्या जानते हैं और क्या केवल संभावना है? सीमा आलोचना रोकती है, तो काम अच्छा जानने का दावा भी कमजोर करती है? अधिकार पर भरोसे की स्वतंत्र वजह क्या है? कौन-सा अवलोकन भरोसा घटाएगा?
ज्ञान की सीमा दोनों पक्षों का आत्मविश्वास सीमित करने की वजह है।
जवाब हो: "कितने लोग मानते हैं"
गिनती सच दिखाती है? ज्यादा बड़ा विरोधी विश्वास सच हो जाएगा? लोग स्वतंत्र प्रमाण ले रहे हैं या विरासत का दावा? लोकप्रियता हटा दें, तो तर्क का क्या बचता है?
लोकप्रियता प्रभाव समझा सकती है। अपने आप दावा तय नहीं करती।
जवाब हो: "तुम बस पाप करना चाहते हो"
किस तर्क का उत्तर दिया? आलोचक का इरादा डीएनए या पाठ के शब्द बदलेगा? मन का अंदाजा लगाए बिना वजहें देख सकते हैं? अपने विश्वास का यही खारिज होना स्वीकार करेंगे?
प्रमाण हो, तो इरादे पर सवाल हो सकता है। अंदाजे का इरादा वजह का खंडन नहीं।
जवाब हो: "नास्तिक सब कुछ साबित नहीं कर सकते"
इस नास्तिक ने ठोस दावा क्या किया? उसके लिए आधार क्या देना है? आपके तर्क का कौन-सा भाग उसके पास पूर्ण सिद्धांत होने पर निर्भर है? उसकी अनिश्चितता आपके निष्कर्ष का गायब प्रमाण देती है?
नास्तिक विज्ञान का नाम लेकर प्रमाण न समझाए, तो उससे भी यही पूछें।
शब्दशब्दों की छोटी मदद
आदम और हव्वा
कुरआन आदम का नाम देता है। हव्वा उनकी पत्नी का पारंपरिक इस्लामी नाम है। कुरआन उनका निजी नाम नहीं देता।
नास्तिकता
ईश्वरों में विश्वास न होना। मजबूत अर्थ में किसी ईश्वर का अस्तित्व न होने का मत। खास तर्क बताए कि किस दावे का बचाव है।
प्रामाणिकता
पाठ या विवरण के स्रोत और भरोसे पर फैसला। परंपरा की श्रेणी और स्वतंत्र ऐतिहासिक जाँच की पद्धति अलग हो सकती है।
परंपरा में अधिकृत
किसी खास धार्मिक परंपरा में अधिकार वाला स्वीकृत स्रोत। परंपरा से बाहर हर व्यक्ति का मानना जरूरी नहीं।
गुणसूत्र
डीएनए का पैकेट। मनुष्य में आम तौर पर 23 जोड़ों में 46 गुणसूत्र होते हैं।
सहमति
स्वतंत्र और जानकारी सहित हामी। बल, भारी दबाव या निर्भरता में बोली हाँ पर्याप्त न हो सकती है।
निर्भर अस्तित्व
जिसे किसी दूसरे की जरूरत हो या जो अलग भी हो सकता था। दर्शन में शब्द का ठीक अर्थ बताना चाहिए।
सहसंबंध
दो चीजों का साथ बदलना। अकेले इससे एक का दूसरे का कारण होना नहीं दिखता।
ईश्वरीय तकदीर
घटनाएँ ईश्वर के निर्धारण या इच्छा के अधीन होती हैं, यह शिक्षा। इंसानी चुनाव से रिश्ता विवादित है।
डीएनए
विरासत की जैविक जानकारी ले जाने वाले अणु। उनका ढाँचा वंश पढ़ने में मदद करता है।
भ्रूण
विकास की शुरुआती अवस्था का जीव।
आबादी का प्रभावी आकार
मॉडल में आबादी के आनुवंशिक व्यवहार का माप। जीवित हर इंसान की सीधी गिनती नहीं।
विकासक्रम
पीढ़ियों में आबादी के विरासत वाले गुणों का बदलाव। व्यापक विवरण साझा पूर्वजों से शाखाओं का रिश्ता समझाता है।
पूर्वज्ञान
घटना होने से पहले उसका ज्ञान। अलग तरह की स्वतंत्रता से उसकी संगति दर्शन का सवाल है।
हदीस
मुहम्मद के कथन, काम या शुरुआती संबंधित घटनाओं का आगे पहुँचा विवरण। मुस्लिम परंपराओं में संग्रह और मानक अलग हैं।
हव्वा
आदम और हव्वा देखें। अंग्रेज़ी अनुवाद में प्रायः ईव नाम होता है।
इब्लीस
कुरआन 18:50 में जिन्नों में बताया विद्रोही। फर्क बताए बिना केवल गिरा हुआ फरिश्ता नहीं कहना चाहिए।
स्वतंत्र प्रमाण
ऐसा आधार जो जाँचे दावे को केवल दोहराकर या मानकर अपना जवाब न ले।
जिन्न
इस्लामी शिक्षा में इंसान और फरिश्तों से अलग प्राणी-वर्ग। अस्तित्व धार्मिक दावा है, स्थापित जैविक खोज नहीं।
जिज्या
कुरआन 9:29 में बताया भुगतान। ऐतिहासिक व्यवस्था और नैतिक औचित्य अलग सवाल हैं।
आवश्यक सत्ता
दर्शन में ऐसी सत्ता जिसका न होना संभव नहीं बताया जाता। नाम देने से अस्तित्व अपने आप सिद्ध नहीं होता।
प्राकृतिक चयन
जीने और प्रजनन में फर्क, जिससे विरासत के गुण आबादी में कम या अधिक आम हो सकते हैं।
सर्वशक्तिमान
सारी शक्ति वाला। गंभीर विवरण सामान्यतः तार्किक रूप से संभव कामों की क्षमता लेते हैं, विरोधाभास सच करने की नहीं।
सर्वज्ञ
सब जानने वाला। भविष्य का कौन-सा तथ्य जाना जा सकता है, यह फिर भी समझाना होगा।
तर्क का आधार
तर्क का शुरुआती दावा। उससे सही कदम में निष्कर्ष निकले, तो भी आधार खुद सच होना सिद्ध नहीं होता।
उचित अनुपात
मुनासिब संतुलन। अपराध से उचित ठहरने की सीमा पार करती सजा की आलोचना हो सकती है।
ईश्वरीय संदेश
ईश्वर से आया बताया संदेश। दूसरों के विश्वास या आज्ञापालन की वजह बने, तो दावे को आधार चाहिए।
वैज्ञानिक सिद्धांत
प्रमाणों पर टिकी, जाँच के लिए खुली व्यापक व्याख्या। शब्द का मतलब साधारण अंदाजा नहीं।
सूरह
कुरआन का अध्याय।
तफसीर
कुरआन की व्याख्या या टिप्पणी। टिप्पणी का दावा चुपचाप कुरआन के अपने शब्द न बनाया जाए।
आगे पहुँचना
लोगों, प्रतियों या पढ़कर सुनाने से पाठ या विवरण का आगे जाना।
ज़िना
निषिद्ध यौन संबंधों का धार्मिक कानूनी शब्द। परिभाषा, प्रमाण और दंड में एक आयत या एक विचारधारा से अधिक बातें हैं।
लेखक की बातइस संस्करण के बारे में
नास्तिक बनाम आस्तिक: इस्लाम से मेरे सवाल लवप्रीत सिंह की अलग Atheist vs Believer: Questions Islam Must Answer पुस्तक का पहला पूरा हिंदी संस्करण है। यह पहली पुस्तक इस्लाम पर केंद्रित है। बाकी धर्मों के खंड इस संस्करण में शामिल नहीं हैं।
पक्ष नास्तिक है। स्रोतों में मुस्लिम मूल पाठ और मुस्लिम पक्ष का बचाव भी हैं, ताकि असहमति असल दावों से हो। वैज्ञानिक खोज, ऐतिहासिक फैसला और नैतिक तर्क के आधार अलग हैं। पुस्तक उनका फर्क साफ रखती है।
रोजमर्रा के दृश्य समझाने के लिए गढ़ी मिसालें हैं। लेखक के जीवन की घटनाओं के दावे नहीं। पुस्तक के लिए नए प्रयोग, पांडुलिपि की भौतिक जाँच या साक्षात्कार करने का दावा नहीं है।
शोध, मसौदे, हिंदी रूपांतरण और संपादन में GPT उपकरणों की मदद ली गई। पाठ लेखक की समीक्षा और सुधार के लिए उपलब्ध है। जिन लेखकों और संस्थाओं का काम उद्धृत है, वे केवल संदर्भ होने से पुस्तक का समर्थन नहीं करते।
लवप्रीत सिंह का लेखन misterlove.in पर उपलब्ध है।
टिप्पणियाँ और स्रोत — पुस्तक 1
स्रोतटिप्पणियाँ और स्रोत
Why I am an Atheist. Bhagat Singh, 1930; transcription from The People, 27 September 1931, Marxists Internet Archive.
मूल निबंध। रचना, पीड़ा और सत्ता से सवाल की प्रेरणा। नया उद्धरण या लेखक का समर्थन नहीं गढ़ा गया।
Quran 2:23. Quran.com.
तुलनीय सूरह की चुनौती। निर्णय की कसौटी साफ करनी होगी।
Evolution Resources. US National Academies of Sciences, Engineering, and Medicine.
वैज्ञानिक सिद्धांत, प्रमाण और विज्ञान तथा अलौकिक दावों का फर्क।
Overview of the Universe. NASA Science.
फैलाव, आरंभिक गर्म ब्रह्मांड और लगभग 13.8 अरब वर्ष का इतिहास। पूर्ण शून्य से रचना का दावा नहीं।
Quran 112:1-4. Quran.com.
एक ईश्वर, आत्मनिर्भरता और जन्म देने या जन्मने से इनकार।
Quran 35:15. Quran.com; Mustafa Khattab translation.
ईश्वर का किसी पर निर्भर न होना।
Quran 51:56-58: worship and divine need. Quran.com; translations compared, including Mustafa Khattab.
मानव और जिन्न की रचना का बताया उद्देश्य। आगे की आयतें उनसे भोजन या रोजी की जरूरत नकारती हैं।
Quran 18:50. Quran.com; Mustafa Khattab translation.
इब्लीस स्पष्ट रूप से जिन्नों में है। वह विद्रोह करता है।
Quran 7:12. Quran.com.
इब्लीस इनकार में आग और मिट्टी की तुलना करता है।
Quran 7:14-18. Quran.com.
मोहलत और भटकाने की धमकी का आसपास का विवरण। अंग्रेज़ी शोध में अलग आयत और अध्याय का पाठ देखा गया।
Why Do People Suffer? God's Existence and the Problem of Evil. Yaqeen Institute for Islamic Research, Muslim theological argument.
स्वतंत्रता, परीक्षा, बड़ी भलाई और परलोक से आस्तिक का अपना बचाव। बताई सफाई का स्रोत, छिपे उद्देश्य की अनुभवजन्य पुष्टि नहीं।
Quran 67:2. Quran.com; Mustafa Khattab translation.
जीवन और मृत्यु को कर्मों की परीक्षा बताना।
Quran 17:15. Quran.com.
व्यक्ति का अपना बोझ और संदेशवाहक के बाद दंड।
Quran 76:29-30. Quran.com; Mustafa Khattab translation.
इंसानी इच्छा और ईश्वरीय इच्छा अंश में साथ हैं।
Quran 57:22. Quran.com.
आपदाओं को होने से पहले दर्ज बताया गया।
Quran 18:74-82. Quran.com.
मूसा और मारा गया लड़का। 18:80-82 की बाद की सफाई शामिल है। पाठक को नकल की अनुमति नहीं।
Quran 18:80-82. Quran.com.
लड़के की मौत की दी सफाई, माता-पिता की चिंता और बदली संतान सहित। 18:74 के साथ पढ़ें।
Quran 13:11. Quran.com.
लोगों और उनके अपने बदलाव का रिश्ता। दुआ को हानि का अकेला इस्लामी उत्तर नहीं बताया गया।
Quran 4:56. Quran.com.
दंड और उसे महसूस करने की शारीरिक क्षमता का लौटना। भयावह विस्तार के बिना अपने शब्दों में समझाया गया।
Quran 98:6. Quran.com.
उद्धृत अंश में टिके रहने वाला दंड। अवधि और किन पर लागू है, इस पर मतभेद माने गए।
Quran 39:53. Quran.com.
ईश्वरीय क्षमा की आशा। सभी मुस्लिम मतों का एक जैसा फैसला नहीं बताया गया।
Quran 42:11. Quran.com.
ईश्वर जैसा कुछ नहीं। जैविक लिंग और व्याकरण के लिंग अलग सवाल हैं।
Mechanisms: the processes of evolution. University of California Museum of Paleontology, Understanding Evolution.
विरासत, विविधता, चयन और दूसरे कारण। सरल व्याख्या और चित्र का आधार, नए प्रयोग का दावा नहीं।
Historical contingency and the evolution of a key innovation in an experimental population of Escherichia coli. Blount, Borland and Lenski, PNAS 105 (2008), 7899-7906. DOI 10.1073/pnas.0803151105.
मूल प्रयोग में ई. कोलाई की एक आबादी ने ऑक्सीजन रहते साइट्रेट इस्तेमाल करना सीखा। अकेले यह मानव विकासक्रम का प्रदर्शन नहीं।
The evolution of whales. University of California Museum of Paleontology, Understanding Evolution.
जीवाश्म और शारीरिक बदलाव। चित्र के हर नाम वाले जीवाश्म को सीधा पूर्वज नहीं बताया गया।
About Astrobiology. NASA Astrobiology.
जीवन की उत्पत्ति और विकास वैज्ञानिक शोध के सवाल। पूरी उत्पत्ति फिर से बना लेने का दावा नहीं।
Human Evolution Evidence. Smithsonian Institution, Human Origins Program.
मिलते जीवाश्म, पुरातात्त्विक और आनुवंशिक प्रमाण। तर्क एक अकेली जोड़ने वाली हड्डी पर नहीं है।
Genetics. Smithsonian Institution, Human Origins Program.
मानव और कपियों के आनुवंशिक रिश्ते। गिने हिस्सों और अंतर के प्रकार से प्रतिशत बदलता है।
Origin of human chromosome 2: an ancestral telomere-telomere fusion. IJdo et al., PNAS 88 (1991), 9051-9055. DOI 10.1073/pnas.88.20.9051.
मूल शोध का सारांश। भीतर आमने-सामने के टीलोमियर दोहराव पुराने जुड़ाव का आधार हैं। सारांश और संस्थागत व्याख्याएँ देखी गईं।
Homo sapiens. Smithsonian Institution, Human Origins Program.
हमारी प्रजाति लगभग तीन लाख वर्ष पहले अफ्रीका में उभरी। सीमाएँ और आबादियों का इतिहास शोध के सवाल हैं।
Quran 2:35. Quran.com.
कुरआन आदम का नाम देता है और उनकी पत्नी को बिना निजी नाम संबोधित करता है।
Sahih al-Bukhari 3330. Abu Hurayra report, Sunnah.com; Arabic and English text.
अरबी में हव्वा, अंग्रेज़ी में ईव। केवल पारंपरिक नाम के लिए उपयोग, स्त्रियों के बारे में विवरण के दूसरे दावे का समर्थन नहीं।
Quran 4:1. Quran.com.
एक जान और उसका जोड़ा। पारंपरिक अर्थ और वैकल्पिक व्याख्या अलग रखी गई हैं।
Quran 3:59. Quran.com.
आदम, मिट्टी और ईश्वर का आदेश।
Quran 32:7-9. Quran.com.
आसपास के अंश में मिट्टी, संतान और रूह। आधुनिक आनुवंशिकी का विवरण नहीं बताया गया।
Inference of human population history from individual whole-genome sequence. Li and Durbin, Nature 475 (2011), 493-496. DOI 10.1038/nature10231.
मूल PSMC शोध। प्रभावी आकार मॉडल पर निर्भर माप है, सीधी जनगणना नहीं। बहुत हालिया या थोड़े समय की संकरी आबादी पकड़ने की सीमा है।
Quran 23:12-14. Quran.com; English renderings of alaqah and related terms compared.
भ्रूण के चरण, हड्डी और मांस। कई अनुवाद अकेले अनोखी वैज्ञानिक भविष्यवाणी सिद्ध नहीं करते।
Lecture: Musculoskeletal Development. UNSW Embryology, Mark Hill / educational resources.
मांसपेशी, उपास्थि और हड्डी बनने की प्रक्रियाएँ साथ चलती हैं। उपास्थि के ढाँचे और बाद की हड्डी का फर्क।
Quran 86:5-7. Quran.com.
द्रव, रीढ़ और पसलियाँ। शरीर के दावे और अर्थ संबंधी दावे अलग हैं।
Quran 51:47. Quran.com.
कुछ अर्थ फैलाव लेते हैं। व्यापकता, शक्ति और फैलाव को मात्रात्मक ब्रह्मांडीय भविष्यवाणी से अलग रखना होगा।
Quran 51:47: comparison of English translations. Quranic Arabic Corpus, University of Leeds project.
अलग अनुवाद फैलाव, विशालता या शक्ति लेते हैं। आधुनिक अर्थ अकेला उपलब्ध अर्थ नहीं माना गया।
Quran 21:30. Quran.com.
आकाश और धरती का जुड़ना व अलग होना, जीवन का पानी से रिश्ता। अपने आप गर्म बिग बैंग से पहचान नहीं।
Quran 41:9-12. Quran.com.
रचना का क्रम। चार दिनों में पहले दो शामिल हो सकते हैं। आसान आठ-दिन की आपत्ति निर्णायक नहीं मानी गई।
Quran 10:99. Quran.com.
ईश्वर सबको मानने वाला बना सकता था। विश्वास मजबूर करने का सवाल।
Quran 15:9. Quran.com.
पाठ की रक्षा का उसका अपना वादा जाँचने का दावा है, अपना स्वतंत्र प्रमाण नहीं।
What is the Birmingham Quran?. University of Birmingham, Cadbury Research Library.
चर्मपत्र के दो पत्ते। 95.4 प्रतिशत संभावना वाला 568-645 ईस्वी काल पशु सामग्री का है, सीधे स्याही या पूरे कुरआन का नहीं।
Sahih al-Bukhari 4987. Anas report, Sunnah.com English edition.
उस्मान का मानक बनाना और दूसरी सामग्री जलाना बताता अधिकृत सुन्नी विवरण। आगे पहुँचा विवरण, समकालीन वीडियो नहीं।
Sahih al-Bukhari 1. Umar report, Sunnah.com English edition.
सुन्नी अधिकृत विवरण में नीयत का महत्व। हर नैतिक आदेश का औचित्य इससे नहीं दिखता।
Sahih al-Bukhari 6922. Ikrima report, Sunnah.com English edition.
धर्म छोड़ने और दंड का विवरण। सुन्नी संग्रह का दर्जा, शिया संग्रह और आज किसी कानूनी अर्थ की स्वीकृति अलग हैं।
Sahih al-Bukhari 5133. Aisha report, Sunnah.com English edition.
शादी की उम्र का पारंपरिक विवरण। उसमें कही बात और अलग ऐतिहासिक विवाद को मिलाया नहीं गया।
Quran 54:1. Quran.com.
चाँद के फटने का अंश और अर्थ का सवाल।
Sahih al-Bukhari 4864. Ibn Masud report, Sunnah.com English edition.
चाँद का पारंपरिक विवरण। पुष्टि में स्वतंत्रता चाहिए, केवल दोहराया कथन नहीं।
Quran 30:2-4. Quran.com.
रोमन हार और जीत की भविष्यवाणी। तारीख और सटीकता जाँच का हिस्सा हैं।
Chronology of Iranian History, Part 1. Encyclopaedia Iranica, scholarly chronology.
627 में निनेवे के पास जीत और 628 में शांति। इनसे कुरआनी भविष्यवाणी की तारीख स्वतंत्र रूप से तय नहीं होती।
Quran 30:21. Quran.com.
जीवनसाथी, सुकून, स्नेह और रहम। स्त्री को पुरुष की संपत्ति बताने वाला कथन नहीं।
Quran 2:187. Quran.com.
रोजे और वैवाहिक अंतरंगता के अंश में दोनों ओर कपड़े की उपमा।
Sahih al-Bukhari 3331. Abu Hurayra report, Sunnah.com.
पसली और टेढ़ेपन की उपमा के साथ अच्छा व्यवहार कहता है। शाब्दिक उत्पत्ति और नैतिक उपमा अलग अर्थ हैं।
Quran 4:11. Quran.com.
बताए इंतजाम में बेटी के मुकाबले बेटे का हिस्सा। हर विरासत का अनुपात समान नहीं।
Quran 2:282. Quran.com.
कर्ज के अनुबंध के गवाह। हर न्यायिक मामले का सार्वभौम नियम नहीं बताया गया।
Quran 4:34. Quran.com; multiple English renderings and surrounding text.
पुरुष का अधिकार, खर्च और विवादित दरबा क्रिया। पुराने और आधुनिक अर्थ अलग हैं।
Quran 4:3. Quran.com.
न्याय की शर्त से दो, तीन या चार पत्नियों की अनुमति। न्याय का भय हो तो एक। अनाथों का संदर्भ शामिल है।
The Hadith of Aishah's Marital Age: a study in the evolution of early Islamic historical memory. Joshua J. Little, DPhil thesis, University of Oxford, 2022; repository record and abstract.
विवरण के पहुँचने के इतिहास को चुनौती देता मूल ऐतिहासिक शोध। बताया तर्क स्वीकार है, विद्वानों की एकमत राय या तय दूसरी उम्र नहीं।
Quran 65:4. Quran.com, including accessible classical tafsir.
प्रतीक्षा और जिन्हें मासिक धर्म नहीं हुआ। पुराना कम उम्र वाला अर्थ तथा आधुनिक विकल्प दोनों माने गए।
Ibn Kathir (abridged), tafsir on Quran 65:4. Quran.com, English translation of a classical commentary.
उपलब्ध टिप्पणी स्पष्ट रूप से मासिक धर्म शुरू न हुई लड़कियाँ लेती है। पुराना अर्थ, आज सभी मुसलमानों की स्वीकृति नहीं।
Quran 33:49. Quran.com.
बताए अंतरंग संपर्क से पहले खत्म विवाह की प्रतीक्षा नहीं। केवल 65:4 का संदर्भ जाँचने में उपयोग।
Quran 4:24. Quran.com.
विवाह संबंधी अंश में स्वामित्व के नीचे लोगों का अपवाद। ऐतिहासिक दासता और सहमति के सवाल।
Quran 90:13. Quran.com.
बंधन से मुक्त करना सराहा गया। सुधार स्वामित्व का अलग सवाल नहीं मिटाता।
Universal Declaration of Human Rights. United Nations, Articles 1, 4, 18 and 19.
बराबरी, दासता का विरोध और विश्वास व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्पष्ट आधुनिक नैतिक मानक। वैज्ञानिक प्रमेय नहीं बताया गया।
Quran 2:256. Quran.com.
धर्म में जबरदस्ती नहीं। दायरे के अलग अर्थ पहचाने गए।
Quran 4:137. Quran.com.
बार-बार विश्वास और अविश्वास, साथ में ईश्वर का फैसला।
Insight: Freedom of belief discussion. Egypt's Dar al-Ifta, Insight special edition 24.
आधुनिक मुस्लिम संस्था का विश्वास की आजादी का बचाव। मुसलमानों के बारे में व्यापक दावों के खिलाफ उदाहरण।
Quran 2:186. Quran.com.
ईश्वर को पास और दुआ का उत्तर देता बताया गया।
Study of the Therapeutic Effects of Intercessory Prayer (STEP). Benson et al., American Heart Journal 151 (2006), 934-942. DOI 10.1016/j.ahj.2005.05.028.
हृदय बाईपास के 1,802 रोगियों का यादृच्छिक समूह वाला अध्ययन। तय प्रार्थना से ठीक होने का लाभ नहीं मिला। हर दुआ या हर ईश्वर की जाँच नहीं।
Quran 4:135. Quran.com.
अपने या रिश्तेदारों के विरुद्ध होने पर भी न्याय का निर्देश।
Quran 4:40. Quran.com.
ईश्वर को अन्याय न करता बताया गया।
Quran 33:50. Quran.com.
विवाह संबंधी अनुमतियाँ, एक अनुमति स्पष्ट रूप से केवल नबी के लिए।
Quran 33:37. Quran.com.
ज़ैद और बाद का विवाह, गोद लिए बेटों की पूर्व पत्नियों के नियम से जुड़ा। गोद और जैविक वंश मिलाए नहीं गए।
Quran 9:5. Quran.com.
लड़ाई का आदेश 9:4 की संधि के अपवाद और 9:6 की रक्षा के साथ पढ़ना होगा।
Quran 9:4. Quran.com.
संधि निभाने वालों के साथ संधि का सम्मान।
Quran 9:6. Quran.com.
सुरक्षा माँगने वाले विरोधी की रक्षा और सुरक्षित पहुँच।
Quran 2:190. Quran.com.
समुदाय से लड़ने वालों से लड़ना और सीमा लाँघने पर रोक।
Quran 8:61. Quran.com.
दूसरा पक्ष शांति चाहे, तो शांति की ओर आना।
Quran 9:29. Quran.com.
अंश में लड़ाई और जिज्या। ऐतिहासिक विवरण और आज का नैतिक औचित्य अलग हैं।
Quran 7:80-81. Quran.com.
पुरुषों की ओर जाने पर लूत की फटकार। आज के रिश्तों पर इस्तेमाल नैतिक और अर्थ संबंधी विवाद है।
Quran 29:29. Quran.com.
कथा में दूसरे गलत काम भी हैं। दायरे के दावों को पूरा संदर्भ चाहिए।
Quran 5:38. Quran.com.
पाठ की चोरी की सजा। कानूनी शर्त, प्रमाण का मानक और नैतिक जाँच अलग मुद्दे हैं।
Quran 24:2. Quran.com.
पाठ में ज़िना का शारीरिक दंड। हर विचारधारा का पूरा कानून या पाठकों का निर्देश नहीं।
Quran 24:4. Quran.com.
आरोप के गवाह और बिना आधार आरोप का दंड। चर्चा में सुरक्षा-शर्त शामिल है।