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ईसाई धर्म से मेरे सवाल

त्रिएकता, पीड़ा, बाइबल, पुनरुत्थान, स्त्रियों का दर्जा, दासता और चर्च की जवाबदेही पर 30 पूरे अध्याय।

भूमिकामैं ये सवाल क्यों पूछ रहा हूँ

पादरी किसी दावे को पवित्र कहे, परिवार उसे दोहराए या भीड़ उसे नकारने से डरे, केवल इसलिए मैं उसे नहीं मानता। विश्वास लोगों को जीने का तरीका बताए, तो उसे जाँची जा सकने वाली वजहें देनी होंगी। ईसाई धर्म संसार, हमारी उत्पत्ति, दोष, मृत्यु और शासन के अधिकार पर बड़े दावे करता है। मैं जानना चाहता हूँ कि वह माँगे गए भरोसे का आधार देता है या नहीं।

यह नास्तिक बनाम आस्तिक का दूसरा धर्म-खंड है। इसमें ईसाई धर्म की जाँच है। पहली पुस्तक इस्लाम पर थी। दोनों अलग पुस्तकें हैं, अपने पहले संस्करण में। विषय का धर्म बदलने से बिना बदली पुस्तक का संशोधित संस्करण नहीं बन जाता। इस काम में बाकी धर्मों के खंड नहीं लिखे गए हैं।

भगत सिंह का मैं नास्तिक क्यों हूँ पूछने की आदत को प्रेरित करता है: शक्तिशाली रचयिता दुख क्यों होने देता है और पूजा क्यों माँगता है? उनके नाम से मेरा तर्क सिद्ध नहीं हो जाता। मेरे अपने तर्कों को काम करना होगा। प्रसिद्ध नास्तिक भी गलत हो सकता है।[1]

ईसाई धर्म से मेरा मतलब क्या है?

मैं मुख्य रूप से कैथोलिक, ऑर्थोडॉक्स और प्रोटेस्टेंट ईसाई परंपराओं में मानी जाने वाली शिक्षाएँ जाँचता हूँ। उनमें फर्क हैं। उनके भीतर भी लोगों में फर्क हैं। कुछ ईसाई विकासक्रम मानते हैं। कुछ उत्पत्ति की पुस्तक को पवित्र कहानी पढ़ते हैं, विज्ञान का पाठ नहीं। चर्च नरक, उद्धार, धर्मग्रंथ और स्त्रियों की भूमिका पर असहमत हैं। सवाल उसी मत पर लागू होगा जो व्यक्ति वास्तव में मानता है।

टिप्पणियों में चर्च का कथन बताता है कि चर्च क्या सिखाता है। बाइबल का अंश बताता है कि उस अंश में क्या लिखा है। कोई भी बात अकेले चमत्कार या ईश्वरीय लेखक साबित नहीं करती। स्रोत इसलिए दिए हैं कि पाठक मेरी आवाज पर भरोसा करने की जगह तर्क जाँच सके।

मैं रोजमर्रा की छोटी मिसालें लेता हूँ। वे समझाने के लिए गढ़ी गई हैं, मेरे जीवन की कहानियाँ नहीं। आस्तिक उत्तर विचारों के सरल सार हैं, जब तक किसी उद्धरण को साफ पहचाना न गया हो। वे साक्षात्कारों की लिखित प्रतियाँ नहीं हैं।

किस तरह का प्रमाण चाहिए?

मानव वंश के दावे को भौतिक दुनिया के प्रमाण चाहिए। प्राचीन घटना के दावे को स्रोतों की सावधान जाँच चाहिए। नैतिक नियम को उसके नीचे जीने वाले लोगों के बारे में वजहें चाहिए। ये काम एक-दूसरे से जुड़ते हैं, पर एक काम नहीं हैं। प्रयोगशाला नहीं माप सकती कि निर्दोष बच्चा पूर्वज के काम का दोष सहने योग्य है या नहीं।

मैं स्वतंत्रता, देखभाल, सहमति और बराबर दर्जे का पक्ष लेता हूँ। ये नैतिक मान्यताएँ हैं जिनकी वजह बता सकता हूँ और जिन पर सवाल हो सकते हैं। मैं इन्हें माप बताकर नहीं छिपाता। किसी पाठ में ईश्वर से जोड़ा गया है, केवल इसलिए नियम अच्छा भी नहीं मानता।

सवाल सीधे हैं क्योंकि असर वास्तविक है। बच्चे को सुरक्षा चाहिए। बंदी को आजादी। संदेह करने वाले को बोलने की जगह। किसी मत को बचाने की इच्छा इन जरूरतों का फैसला नहीं कर सकती।

अध्याय क्रम से पढ़ें या विषयसूची और विषय-सूचकांक लें। कठिन शब्द आते ही समझाए गए हैं और पीछे शब्दकोश में भी हैं। चौकोर कोष्ठकों के स्रोत-अंक वेब पतों वाली टिप्पणियों तक ले जाते हैं। आखिरी सवाल-शृंखलाएँ असली बातचीत के अगले सवाल देती हैं।

अध्याय 1ईसाई दावे पर विश्वास करने की वजह क्या होगी?

कोई कहता है कि बाइबल ईश्वर का शब्द है। मैं पूछता हूँ कि कैसे जानते हैं। वह कहता है कि बाइबल खुद को ईश्वरीय प्रेरणा से आया बताती है। इससे किताब का अपने बारे में दावा मिला। उसे स्वीकारने की वजह अभी चाहिए।

मानिए अजनबी पर्ची देकर कहता है कि आपको उसका पैसा चुकाना है। नीचे लिखा है, "इस पर्ची का हर शब्द सच है।" क्या उससे कर्ज तय हो जाएगा? सामान्यतः माँग के अपने कथन से बाहर का आधार चाहते हैं।

दूसरा तीमुथियुस 3:14-17 धर्मग्रंथ को ईश्वरीय प्रेरणा वाला और उपयोगी बताता है। यह धार्मिक शिक्षा का स्रोत है। केवल उद्धृत होने से बाद की बाइबल की हर पुस्तक का अधिकार नहीं दिखाता।[2]

हम कौन-सा दावा जाँच रहे हैं?

दावा हो सकता है कि यीशु नाम के शिक्षक जीवित थे, उनके अनुयायी उन्हें मौत से लौटा मानते थे या ईश्वर ने सचमुच उनके शरीर को मौत से उठाया। दावे अलग हैं। पहले कदम का आधार बाद के कदम तय नहीं करता।

कोई गाँव ठीक बताकर भी उसमें घटी झूठी कहानी सुना सकता है। पाठ में सही जगह के नाम जरूरी हैं, पर हर घटना साबित नहीं करते। वैसे ही एक गलत बारीकी से हर वाक्य झूठा नहीं हो जाता। जिस हिस्से पर बात है, उसे परखें।

साफ वाक्य माँगिए: क्या हुआ, कब, किसके साथ और घटना ईश्वरीय कैसे हुई? दावा बदलता रहे, तो नहीं जान सकते कि दिया प्रमाण उस तक पहुँचता है या नहीं।

आस्था से वजहों की जरूरत मिटती है?

कई ईसाई आस्था को वजहों, अनुभव और ईश्वर से रिश्ते पर भरोसा समझते हैं। मुझे वे वजहें जाँचनी चाहिए। हर आस्था को बिना सोचे मानना कह देना उस काम से बचना होगा।

पर भरोसे पर सवाल फिर भी है: इसी स्रोत पर भरोसा क्यों? स्रोत पवित्र महसूस होता है, तो दूसरे धर्म में उतना ही यकीन रखने वाले को कैसे परखें? भावना असली होकर भी उसकी व्याख्या गलत हो सकती है।

पहला थिस्सलुनीकियों 5:19-22 खुद दावे परखने और अच्छी बात रखने को कहता है। ईसाई गहरी जाँच को अपनी आस्था का हिस्सा मान सकता है। तब जाँच को नापसंद नतीजे तक पहुँचने की भी छूट चाहिए।[3]

क्या साबित करने की जिम्मेदारी किसकी है?

कहानी जानकर गढ़ी गई, यह मैं कहूँ, तो गढ़ने का प्रमाण मुझे देना है। दिया प्रमाण चमत्कार नहीं दिखाता, तो उस सीमित फैसले की वजह समझानी है। पहले ब्रह्मांड का हर रहस्य हल करना जरूरी नहीं।

कोई इलाज बेच रहा है। ग्राहक बीमारी का इलाज न जानते हुए भी प्रमाण माँग सकता है। ग्राहक का अज्ञान गायब परीक्षण-नतीजे की जगह नहीं भरता।

वही नियम मुझ पर है। कोई भी संभव ईश्वर नहीं है, यह खास ईसाई प्रमाण नकारने से बड़ा दावा है। असल में जो दावा करूँ, उसका बचाव करूँ।

अच्छे जवाब को क्या करना चाहिए?

सवाल का उत्तर दे, स्रोत पहचाने और बताए कि उससे क्या निकलता है। दूसरे धर्म पर लगी वही कसौटी सहे। यह भी बताए कि ज्ञान कहाँ खत्म होता है।

ठोस वजह पर मैं मन बदलने को तैयार हूँ। विश्वास की माँग को विश्वास अर्जित करने वाला प्रमाण नहीं मानूँगा। लोगों के जीवन पर असर रखने वाला दावा अगले सवाल के लिए खुला रहे।

अध्याय 2ब्रह्मांड का कारण हो, तो वह ईसाई ईश्वर ही क्यों होगा?

ब्रह्मांड है ही क्यों? गंभीर सवाल है। "ईश्वर" जवाब में प्रस्तावित व्याख्या है। अभी पूछना है कि आधार क्या है, वह किस तरह का ईश्वर बताती है और ईसाई धर्म तक कैसे पहुँचती है।

कुछ तर्क कहते हैं कि अस्तित्व में आना शुरू करने वाली चीज को कारण चाहिए। दूसरे अभी किसी और पर निर्भर चीजों की बात करते हैं। निर्भर चीज के अस्तित्व को अपने बाहर का सहारा चाहिए। तर्क को उसकी अपनी शर्तों पर जाँचें।

ईश्वर को किसने बनाया पूछने से फैसला हो जाता है?

तभी जब तर्क सचमुच हर चीज को बनाने वाला जरूरी कहे। कई सावधान आस्तिक ईश्वर को बिना शुरुआत और निर्भरता वाला मानते हैं। तब उसे किसने बनाया पूछना उनके बताए आधार तक नहीं पहुँचता।

बेहतर सवाल है कि प्रस्तावित अपवाद उचित क्यों है। चेतन मन वाली सत्ता बिना सहारे जरूर है, यह क्या दिखाता है? बुनियादी व्याख्या निजी रचयिता के अलावा कुछ और क्यों नहीं? तर्क ने वह रास्ता हटाया या कमी में परिचित नाम रख दिया?

आधार तर्क का शुरुआती कथन है। निष्कर्ष उससे निकलना बताया परिणाम है। दोनों जाँचें। व्यवस्थित कड़ियों वाला तर्क भी बिना दिखाए शुरुआती दावे से शुरू हो सकता है।

बिग बैंग शून्य से रचना बताता है?

नासा का विवरण फैलता ब्रह्मांड और आरंभिक गर्म इतिहास बताता है। उम्र करीब 13.8 अरब वर्ष, यानी 1,380 करोड़ वर्ष है। यह पूर्ण शून्य से कुछ बन जाने की दिखाई गई घटना नहीं है।[4]

उस वैज्ञानिक सार में त्रिएकता, बाइबल या यीशु का पुनरुत्थान नहीं दिया गया। आस्तिक आगे का तर्क बना सकता है। उसके कदम दिखाए। ब्रह्मांड की उम्र के अनुमान में चर्च का पूरा विश्वास-संग्रह छिपा नहीं है।

बनावट से रचनाकार का धर्म पता चलेगा?

कोई कह सकता है कि ब्रह्मांड का क्रम मन की ओर इशारा करता है। पूछें कि किस गुण को मन चाहिए और विकल्पों की तुलना कैसे हुई। संभावना का हिसाब है, तो कौन-सी संभव दुनियाएँ गिनीं? उनके अवसर कहाँ से मिले?

चर्चा के लिए रचनाकार मान भी लें, तो सवाल बाकी हैं। एक मन या कई? प्रेम करने वाला रचयिता या उदासीन? बोलने वाला या कभी संपर्क न करने वाला? यही धर्मग्रंथ क्यों, दूसरा क्यों नहीं?

इनसे रचनाकार असंभव नहीं दिखता। दिखता है कि सामान्य बनावट का तर्क किसी चर्च की आज्ञा मानने की वजह बनने से पहले कितना और काम माँगता है।

क्या ईश्वर विज्ञान से परे हो सकता है?

आस्तिक प्रयोगों की सामान्य पहुँच के बाहर अंतिम कारण प्रस्तावित कर सकता है। तब तर्क दर्शन का है। वजहें उसी तरह जाँचें। प्रयोगशाला ने पुष्टि की, यह दिखावा न करें।

आगे का दावा दुनिया की घटना का हो, जैसे बाढ़ या ठीक होना, तो उसके संभावित प्रमाण रहते हैं। रचयिता को प्रकृति के बाहर रखने से हर भौतिक दावा जाँच से बाहर नहीं हो जाता।

मेरा उत्तर सीमित और साफ है। अस्तित्व का अनुत्तरित सवाल ईसाई धर्म नहीं दिखाता। पहला कारण दिखाने में तर्क सफल हो भी, तो उसकी प्रकृति और पहचान पर सवाल वहीं से शुरू होते हैं।

अध्याय 3त्रिएकता को रहस्य कहने से क्या वह समझ आ जाती है?

त्रिएकता की शिक्षा है कि एक ईश्वर पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा है। आलोचक पहले दावा समझे। ईसाई एक और एक और एक जोड़ना नहीं जानते, यह आम मजाक काम करने के लिए बहुत कमजोर है।

कैथोलिक शिक्षा एक ईश्वरीय सत्ता या तत्व और तीन व्यक्तियों में फर्क करती है। वेस्टमिन्स्टर कन्फेशन भी एक ईश्वर और तीन व्यक्ति मानता है। कोई यह नहीं कहता कि तीन व्यक्ति ठीक उसी अर्थ में एक व्यक्ति हैं।[5][6]

शब्दों का अर्थ क्या है?

आम बोलचाल में तीन व्यक्ति प्रायः तीन अलग सत्ताएँ होते हैं। इस शिक्षा में शब्दों के खास अर्थ हैं। इसका बचाव करने वाला वे अर्थ समझाए। केवल नाम देकर दावा न छिपाए।

तीनों व्यक्तित्व किस तरह अलग हैं? हर एक पूरी तरह ईश्वर है, तो ईश्वरीय सत्ता एक कैसे है? कौन-सी समझ इस शिक्षा के विरुद्ध होगी और उसे कैसे पहचानेंगे?

खास अर्थ उचित हो सकता है। विज्ञान भी शब्द सावधानी से परिभाषित करता है। पर धारणा की परिभाषा से उससे मेल खाती चीज का अस्तित्व नहीं दिखता। दुनिया में बिना पाए भी काल्पनिक जीव के नियम समझ सकते हैं।

परिचित मिसालों से दावा साबित होता है?

पानी बर्फ, तरल या भाप हो सकता है। एक इंसान माता-पिता, कामगार और दोस्त हो सकता है। वस्तु के तीन हिस्से हो सकते हैं। ये तस्वीरें बातचीत शुरू करने में मदद कर सकती हैं। शिक्षा से फर्क भी हैं: रूप, भूमिकाएँ और टुकड़े अपने आप तीन अलग ईश्वरीय व्यक्ति नहीं।

पूछें कि तुलना में कौन-से गुण मिलते हैं और कौन-से छूट जाते हैं। मिसाल अपनी सीमा में ही उपयोगी है। दावा समझाते-समझाते वह चुपचाप उसे किसी दूसरे दावे में बदल सकती है।

पूरा सिद्धांत बाइबल में एक जगह है?

मत्ती 28:19 बपतिस्मा के सूत्र में पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा साथ रखता है। यूहन्ना 1 वचन को ईश्वरीय दर्जा देता है और उसके देह बनने की बात करता है। ईसाई शिक्षा के बचाव में ऐसे अंश जोड़ते हैं।[7][8]

आगे की व्याख्या को वजहें फिर भी चाहिए। उन पाठों को व्यक्ति और सत्ता का ठीक यही विवरण क्यों चाहिए? कौन-सा दूसरा अर्थ हट रहा है? बाद की परिभाषा पहले के स्रोत समझाने की कोशिश हो सकती है। बाद की तारीख अकेले उसे गलत नहीं बनाती।

आलोचक भी यह दिखावा न करे कि आयत में एक शब्द न होने से उससे जुड़ी हर धारणा गलत हो गई। सवाल शिक्षा और उसके आधार का है।

रहस्य से कौन-सा निष्कर्ष निकल सकता है?

कुछ चीजें पूरी समझ के बिना आंशिक समझी जा सकती हैं। बचाव करने वाला उचित रूप से कह सकता है कि सीमित मन असीम वास्तविकता पूरी नहीं समझेगा। यह उत्तर हमारी समझ की सीमा बताता है। जिस वास्तविकता का दावा है, उसके अस्तित्व का प्रमाण फिर भी देना होगा।

रहस्य हर कठिनाई माफ करे, तो दूसरे धर्म का रहस्य कैसे नकारेंगे? गहरे सच और उलझे वाक्य की सीमा क्या है? वजहें ऐसी चाहिए जो शुरुआत में ही शिक्षा को सच न मान लें।

मैं नहीं कहता कि आसान जोड़ का मजाक त्रिएकता काट देता है। अर्थ और आधार साफ होने से पहले स्वीकारने की माँग नकारता हूँ। रहस्य का नाम देने से उसे तथ्य सिखाने का अधिकार तय नहीं होता।

अध्याय 4यीशु पूरी तरह ईश्वर और पूरी तरह मनुष्य कैसे हैं?

ईसाई धर्म यीशु को केवल बुद्धिमान शिक्षक नहीं कहता। उसके प्रमुख चर्च उन्हें ईश्वरीय और मानव सिखाते हैं। यूहन्ना 1 वचन के देह बनने की बात करता है। कैथोलिक शिक्षा देहधारण को एक व्यक्ति में दो प्रकृतियाँ बताती है: ईश्वरीय और मानवीय।[8][9]

यहाँ प्रकृति का अर्थ है कि कोई क्या है। व्यक्ति का अर्थ है कि वह कौन है। ये शिक्षा के खास शब्द हैं। दावा केवल ईश्वर के पोशाक पहनने जैसा कहने से अधिक सावधानी माँगता है।

दोनों तरह के गुण अलग हों, तो क्या होता है?

सामान्य मनुष्य सीखता है, थकता है और मर सकता है। ईश्वर आम तौर पर सब जानने वाला और जीवन का स्रोत बताया जाता है। दोनों वर्णन एक व्यक्ति के हों, तो कैसे, यह जानना होगा।

मरकुस 13:32 भविष्य की घटनाओं के अंश में कहता है कि पुत्र दिन या घड़ी नहीं जानता। कैथोलिक शिक्षा यीशु के मानवीय और ईश्वरीय ज्ञान में फर्क करती है। यह प्रस्तावित उत्तर है। साफ स्वीकार नहीं कि ईसाई अपनी शिक्षा भूल गए।[10][9]

पूछें कि फर्क काम कैसे करता है। एक व्यक्ति किस अर्थ में जानता और किस अर्थ में नहीं जानता? क्या यह ज्ञान के दो तरीकों का संगत विवरण है या मुश्किल आते ही जोड़ा नियम? निर्णय में कौन-सा प्रमाण मदद करेगा?

कठिन शिक्षा का गलत होना जरूरी है?

नहीं। कुछ सच्चे विचार समझना कठिन है। हमारी असहजता विरोधाभास नहीं साबित करती। विरोधाभास के लिए एक ही बात को ठीक उसी पहलू से मानना और नकारना होगा।

लेकिन फर्क बना सकने की संभावना से किसी वास्तविक व्यक्ति का विवरण सिद्ध नहीं होता। बचाव करने वाले को धारणा समझाने का समय देकर भी पूछ सकता हूँ कि घटना हुई मानने की वजह क्या है।

देहधारण का तर्क यीशु के पाठों और उनके ईश्वर प्रकट करने के दावे पर बहुत निर्भर है। स्रोतों की अपनी जाँच चाहिए। परिभाषा उस प्रमाण की जगह नहीं लेती।

यीशु की मौत पर क्या ईश्वर का अस्तित्व समाप्त हुआ?

यह सवाल शिक्षा तक नहीं पहुँच सकता। ईसाई को ईश्वरीय सत्ता गायब होना मानना जरूरी नहीं। वह कह सकता है कि यीशु ने सचमुच मानव मृत्यु सही, जबकि ईश्वरीय प्रकृति बनी रही।

अधिक उपयोगी सवाल है कि इस मृत्यु से क्या हासिल होता है और जरूरत क्यों थी। ईश्वरीय व्यक्ति को मानव प्रकृति से जोड़ना क्षमा कैसे संभव करता है? प्रेम करने वाला ईश्वर दूसरे तरीके से संबंध क्यों नहीं सुधार सकता था? दो प्रकृतियों की शिक्षा उद्धार का हर सवाल नहीं सुलझाती।

ईश्वर की पीड़ा इंसानी दुख का जवाब है?

आस्तिक को यह सोच दिलासा दे सकती है कि ईश्वर मानव पीड़ा में आया। इससे विश्वास का भावनात्मक बल समझ सकता है। अपने आप नहीं समझ आता कि रचयिता रोकी जा सकने वाली पीड़ा होने क्यों देता है।

मानिए शासक असुरक्षित शहर में जाकर जोखिम बाँटता है। यात्रा साहस दिखा सकती है। फिर भी पूछ सकते हैं कि खतरा ठीक क्यों नहीं किया। नुकसान में साथ होना और उसे रोकना अलग उपलब्धियाँ हैं।

मैं ऐसा विवरण चाहता हूँ जिसका अर्थ जाँचा जा सके और सच्चाई का आधार हो। सस्ते शब्दों के खेल से देहधारण खारिज नहीं करूँगा। पवित्र जटिलता को प्रमाण या नैतिक व्याख्या की जगह भी नहीं मानूँगा।

अध्याय 5प्रेम करने वाला ईश्वर शैतान और निर्दोषों की पीड़ा क्यों होने देगा?

ईश्वर लोगों से प्रेम करता है और बचा सकता है, तो निर्दोष गंभीर पीड़ा में क्यों छोड़े जाते हैं? सवाल उस दुनिया का है जिसे रचयिता होने देता है। पीड़ित दूसरे धर्म का हो, तो सवाल गायब नहीं होता।

पहला यूहन्ना 4 ईश्वर के विवरण में प्रेम को केंद्र देता है। अय्यूब की पुस्तक स्वर्गीय दृश्य में आरोप लगाने वाले को अनुमति मिलना दिखाती है। उसके बाद भयानक नुकसान और बीमारी हैं। यह दुख की धार्मिक कथा है, ऐसी बैठक होने का स्वतंत्र प्रमाण नहीं।[11][12]

शैतान का नाम ईश्वर की जिम्मेदारी हटा देता है?

कहानी में एक और कर्ता मिलता है। फिर भी पूछेंगे कि उसे किसने बनाया, जोखिम जाना और सीमित करने की शक्ति रखी। शैतान के चुनाव का दावा अभी ईश्वर की अनुमति का उत्तर नहीं।

ईसाई शिक्षा अक्सर शैतान को बनाया गया, फिर पतित हुआ स्वर्गदूत बताती है। उत्पत्ति 3 खुद बगीचे के प्राणी को साँप कहता है। बाद में प्रकाशितवाक्य पुराने साँप को इब्लीस और शैतान से जोड़ता है। स्रोत अलग रखने से हर बाद की बारीकी पहले अध्याय में सीधे डालने से बचते हैं।[13][14][15]

रचयिता खतरा जानता था, तो हानिकारक परिस्थिति जारी क्यों? कौन-सी भलाई को यही पीड़ित और परिस्थितियाँ चाहिए थीं? स्वतंत्र चुनाव जवाब हो, तो पूछें कि कौन-सी हानियाँ वास्तव में व्यक्ति के चुनाव पर टिकती हैं।

स्वतंत्र इच्छा हर नुकसान समझाती है?

गलत चुनने की आजादी किसी की क्रूरता समझा सकती है। अपने आप शिशु की बीमारी या भूकंप नहीं। पतित संसार का अतिरिक्त दावा अपनी वजहें माँगता है।

इंसानी गलत काम में भी चुनाव और नुकसान अलग हैं। हमला चाह सकने की क्षमता मिटाए बिना हमला रोक सकते हैं। शक्तिशाली ईश्वर सार्थक चुनाव बचाकर सबसे बुरे नतीजों को ज्यादा सीमित क्यों नहीं कर सकता था?

कुछ बचाव कहते हैं कि स्थिर प्राकृतिक प्रक्रियाओं की दुनिया काम और सीखना संभव करती है। गंभीर उत्तर है। अगला सवाल है कि ठीक ये प्रक्रियाएँ और इतना दुख जरूरी क्यों था। स्थिरता को हर बीमारी और आपदा चाहिए?

दुख से साहस या करुणा बन सकती है?

कभी लोग नुकसान का अच्छा उत्तर देते हैं। उनका साहस जरूरी है। इससे नहीं निकलता कि हानि अच्छे उद्देश्य से रची गई या पीड़ित पर दूसरों को सीख देने का कर्ज था।

दूसरे को दयालु होने का मौका देने के लिए बच्चे को चोट पहुँचाएँगे? नहीं, तो रचयिता का बच्चा इस्तेमाल करना अलग कैसे? बचाव में पीड़ित के हित रखने वाली वजह चाहिए।

क्या परलोक से आपत्ति खत्म होगी?

संबंध और जीवन लौटाने का वादा सच हो, तो मायने रख सकता है। भरपाई और औचित्य फिर भी अलग हैं। नुकसान भरने से उसे होने देना जरूरी नहीं दिखता।

आस्तिक कह सकता है कि ईश्वर की वजहें हमारी नजर से परे हैं। इससे संभावना खुली रहती है। किसी त्रासदी को प्रेमपूर्ण या उचित दंड बताने का भरोसा भी सीमित होता है।

मैं सिद्ध नहीं कर सकता कि कोई अनजान वजह है ही नहीं। बचाव करने वाला हमारे अज्ञान का नाम लेकर अच्छी वजह साबित नहीं कर सकता। दावा प्रेम का है, तो पीड़ा भरी दुनिया उसकी समझाने वाली बात है। पीड़ितों को शर्मिंदा कर उसका सवाल बंद नहीं करवाया जा सकता।

अध्याय 6ईश्वर ईमानदार खोजी को बिना यकीन क्यों छोड़ेगा?

ऐसा व्यक्ति सोचिए जो जानना चाहता है कि ईसाई धर्म सच है या नहीं। पढ़ता, सुनता और प्रार्थना करता है। फिर भी ईमानदारी से नहीं कह पाता कि मानता है। उसने विद्रोह चुना या भरोसेमंद वजह नहीं मिली?

अविश्वास को दोष बताया जाए, तब फर्क जरूरी है। चर्च जाना या वाक्य दोहराना चुन सकते हैं। वाक्य सच लगना हमेशा चुन नहीं सकते।

साफ प्रमाण स्वतंत्रता मिटा देगा?

आम उत्तर है कि ईश्वर कुछ छिपा रहता है ताकि लोग स्वतंत्र चुनें। लेकिन किसी का अस्तित्व जानना प्रेम या आज्ञापालन मजबूर नहीं करता। सरकारी अधिकारी हैं, यह जानता हूँ। उनसे सवाल करने को स्वतंत्र रहता हूँ।

ईश्वर नैतिक चुनाव खुले रखकर अपना अस्तित्व साफ क्यों नहीं कर सकता? रिश्ते को भरोसा चाहिए, तो कितनी अनिश्चितता जरूरी है? स्पष्ट प्रमाण की ईमानदार माँग नैतिक कमी क्यों?

आस्तिक ईश्वर का ज्ञान और उससे प्रेमपूर्ण रिश्ता अलग कर सकता है। फर्क उपयोगी है। सवाल और साफ होता है: दूसरा माँगते हुए पहला क्यों रोकें?

भविष्य जानना उसे जबरन करवाना है?

अपने आप नहीं। किसी का आगे का काम जान सकते हैं, बिना काम पैदा किए। आलोचक ज्ञान और बल को सीधे एक न माने।

बड़े दावे में रचयिता का परिस्थितियाँ चुनना और बदल सकने की ताकत है। ईश्वर जानता था कि परिस्थितियाँ व्यक्ति के विश्वास पर क्या असर डालेंगी, तो उन्हें क्यों चुना? दूसरी भलाई को वे चाहिए थीं, तो जरूरत का आधार क्या है?

कुछ रिफॉर्म्ड ईसाई आगे बढ़कर घटनाओं के ईश्वरीय निर्धारण और उद्धार के लिए चयन की शिक्षा देते हैं। वेस्टमिन्स्टर कन्फेशन यह मत बताकर भी ईश्वर को पाप का रचयिता नहीं मानता। रोमियों 9 में रहम, कठोर करना और कुम्हार की शक्ति की भाषा है।[6][16]

ये साधारण पूर्वज्ञान से कठिन दावे हैं। परिस्थिति तय करने वाले रचयिता और उसमें आँके व्यक्ति की जिम्मेदारी कैसे बँटेगी? व्यक्ति को घड़ा कहने से नहीं समझ आता कि सोचने और दुख सहने वाला प्राणी खास अंजाम का पात्र क्यों है।

बिना उत्तर की हर प्रार्थना छिपा उत्तर है?

आस्तिक चुप्पी को धैर्य या आगे बढ़ने का अनुरोध समझ सकता है। पूछें कि उस व्याख्या और कोई उत्तर न होने में फर्क कैसे करेगा। हर नतीजा रिश्ते की पुष्टि करे, तो रिश्ते का गलत विश्वास क्या दिखाएगा?

यह व्यक्ति के भीतरी जीवन का मजाक नहीं है। सवाल है कि उसकी व्याख्या ऐसा प्रमाण देती है जिसे अनुभव से बाहर वाला भी स्वीकार करे या नहीं।

खोजने वाले के छिपे बुरे इरादे हों, तो?

कुछ लोग नापसंद तथ्य टालते हैं। संभावना आस्तिक और नास्तिक दोनों पर है। उससे बिना प्रमाण खास व्यक्ति के इरादे का अंदाजा उचित नहीं होता।

पूछें कि खोजी ने किस तर्क का उत्तर नहीं दिया। उसी पर जवाब दें। वह छिपकर ईश्वर से नफरत करता है, यह आरोप अस्तित्व दिखाने की जगह नहीं लेता।

ईमानदार अनिश्चितता को अपने आप दोष बनाने का नियम मैं नकारता हूँ। प्रेम करने वाला शिक्षक विद्यार्थी की स्वतंत्रता मिटाए बिना पाठ स्पष्ट कर सकता है। हर खोजी की परवाह करने वाला बताया ईश्वर भरोसेमंद प्रमाण की असमान पहुँच का मजबूत उत्तर माँगता है।

अध्याय 7कभी खत्म न होने वाला दंड प्रेमपूर्ण न्याय हो सकता है?

सजा का बचाव किया जा सकने वाला उद्देश्य चाहिए। दूसरों की सुरक्षा, नुकसान की भरपाई, व्यक्ति की सीख या उचित दोष व्यक्त करना? जितनी लंबी और कठोर हो, बचाव पर उतना भार बढ़ेगा।

मत्ती 25:31-46 कमजोर लोगों की देखभाल के साथ अंतिम फैसला तथा अनंत दंड और जीवन की भाषा रखता है। कैथोलिक शिक्षा नरक को अनंत मानती है। उसे व्यक्ति के स्वतंत्र इनकार से जुड़ा ईश्वर से अंतिम अलगाव बताती है।[17][18]

क्या हर ईसाई नरक का एक दावा मानता है?

नहीं। कुछ लगातार चेतन दंड मानते हैं। कुछ कंडिशनलिस्ट अंतिम विनाश मानते हैं: हमेशा पीड़ा में जीने के बजाय अंत में जीवन समाप्त होना। रीथिंकिंग हेल का ईसाई कथन इस विकल्प का स्पष्ट बचाव करता है। दोनों मत अलग सवाल माँगते हैं।[19]

आलोचक अनंत यातना के खिलाफ तर्क देकर उसे न मानने वाले को उत्तर दे देने का दावा न करे। बचाव करने वाला भी नरम मत से सवाल टालकर फिर पुराने कठोर मत पर न लौटे।

पहले पूछें कि बचाव किसका है: निरंतर दर्द, अलगाव, विनाश, सुधार या कुछ और? किसके लिए, किस काम पर और कितनी देर?

सीमित जीवन से अनंत दुख उचित हो सकता है?

दंड हमेशा चले, तो गलती से उसका रिश्ता क्या तय करता है? जिसकी अवज्ञा हुई उसका दर्जा हर अपराध को अनंत गंभीर बनाता है? यह नियम दोषी के सीमित ज्ञान और शक्ति से ऊपर क्यों?

सामान्य नैतिक जीवन में शक्तिशाली को नुकसान पहुँचाना कमजोर को नुकसान से अनंत बुरा नहीं हो जाता। ईश्वरीय दर्जे की दलील अपना औचित्य दे। केवल शक्ति होना आधार नहीं।

कुछ बचाव कहते हैं कि व्यक्ति का इनकार जारी रहता है। पूछें कि सीखना, पश्चात्ताप या सुधार अब भी संभव है? नहीं, तो अवस्था तय क्यों? व्यक्ति को केवल हानि में बनाए रखने का उद्देश्य क्या?

खुद अलग हो जाना पूरा जवाब है?

इससे समझ सकता है कि रिश्ता जबरन क्यों नहीं है। उपलब्ध चुनावों की बनावट तय नहीं होती। अलगाव के ये नतीजे किसने बनाए? यही अकेले विकल्प क्यों? पूजा मना करके भी अनंत बर्बादी से बच सकते हैं?

मानिए मेजबान का न्योता कोई मना करता है। इनकार अकेले मेजबान के जोड़े किसी भी नतीजे को उचित नहीं बनाता। न कहने की स्वतंत्रता सार्थक है, जब नतीजों का भी बचाव हो सके।

जीवन समाप्त होने से सारी आपत्तियाँ टलेंगी?

हमेशा दर्द चलने का खास दावा टलता है। फिर भी जानना होगा कि किसका जीवन जाता है, क्यों और फैसला निष्पक्ष है या नहीं। ईमानदार गलत समझ और जानबूझकर क्रूरता चुपचाप एक न बनें।

यह सीमित चर्चा उपयोगी है। बचाव न हो सकने वाली हानि हटाने वाला सुधार मानना चाहिए। साथ में सवाल उठता है कि मूल शिक्षा को इतना अधिकार मिला कैसे।

डर सच दिखाता है?

भय संभावना को जरूरी महसूस करवा सकता है। कौन-सी धमकी असली है, नहीं दिखाता। विरोधी धर्म भी धमकी दे सकते हैं। परखने को प्रमाण और नैतिक वजहें चाहिए।

पूर्ण प्रेम से जोड़ा है, केवल इसलिए अनंत दंड नहीं मानता। प्रेम और न्याय जैसे आम शब्द कुछ समझाएँ, तो बताए आचरण से कुछ माँगें भी रखें। वरना जिस फैसले का बचाव होना था, उसकी जगह प्रशंसा आ गई।

अध्याय 8उद्धार सही विश्वास पर क्यों निर्भर हो?

उद्धार यानी धर्म के बताए खतरे या दशा से बचना। ईसाई शिक्षा में पाप, ईश्वर से अलगाव और मौत के बाद जीवन से जुड़ा है। आस्था, कृपा, कर्म और सदस्यता का रिश्ता क्या है, इस पर चर्च असहमत हैं।

यूहन्ना 14:6 यीशु को पिता तक मार्ग बताता है। इफिसियों 2:8-10 आस्था के द्वारा कृपा से उद्धार को अच्छे कर्मों के जीवन से जोड़ता है। याकूब 2 कर्मों के बिना आस्था को चुनौती देता है। उचित विवरण एक सुविधाजनक पंक्ति से अधिक पढ़े।[20][21][22]

चर्च के बाहर हर व्यक्ति को दोषी कह सकते हैं?

हर चर्च की शिक्षा यह नहीं है। कैथोलिक धर्मशिक्षा 847 बताई शर्तों में अपने दोष बिना मसीह को न जानने वालों का उद्धार संभव मानती है। कैथोलिक मत जन्म से हर गैर-ईसाई को सीधे नष्ट मानता है, यह गलत होगा।[23]

बाकी सवाल कसौटी के हैं। न जानने की ईमानदार असफलता किसे कहेंगे? दावा पढ़कर भी न मान पाए व्यक्ति का क्या? उसकी स्वतंत्रता, ज्ञान और उद्देश्य भरोसे से कौन आँके?

उदार अर्थ लोगों को कठोर निष्कर्ष से बचा सकता है। बदलाव मानें, फिर भी वादे के अलौकिक नतीजे का आधार पूछें।

कृपा से व्यवस्था न्यायपूर्ण बनती है?

कृपा बिना कमाए मिला उपहार समझी जाती है। उपहार पसंद होने के लिए कमाया होना जरूरी नहीं। लेकिन मदद किसे मिले, रचयिता का वह फैसला नैतिक सवाल माँगता है जब दूसरा रास्ता विनाश हो।

सब खुद को बचाने में एक जैसी कमी रखते हैं, तो असरदार मदद सबको क्यों नहीं? सबको दी जाती है, तो पहुँच और समझ में इतना अंतर क्यों? केवल कुछ चुने जाते हैं, तो चुनाव न्यायपूर्ण कैसे?

वेस्टमिन्स्टर कन्फेशन चयन का एक प्रमुख रिफॉर्म्ड विवरण देता है। इसे हर ईसाई का मत नहीं मान सकते। उसका बचाव करने वाले जिम्मेदारी से रिश्ते सहित अपना नियम समझाएँ।[6]

पश्चात्ताप पीड़ितों की जिम्मेदारी मिटाता है?

व्यक्ति बदलकर क्षमा माँग सकता है। इससे उसका किया सारा नुकसान लौट नहीं जाता या पीड़ित का भरोसा उसका अधिकार नहीं बनता। नैतिक सुधार में सच, भरपाई और आगे हानि से सुरक्षा हो सकते हैं।

क्रूर व्यक्ति सही विश्वास रखे और दयालु संदेह करे, तो विश्वास नैतिक तस्वीर उलटी क्यों करे? बचाव हो सकता है कि असली आस्था में बदला जीवन शामिल है। तब बोला विश्वास-सूत्र फैसला न करे। उस जीवन को जाँचें।

कर्मों के ईसाई अंश चर्चा गंभीर बनाते हैं। यह समझाने की जरूरत नहीं मिटाते कि आस्था स्वीकारना शर्त है ही क्यों।

न्यायपूर्ण ईश्वर ईमानदार नास्तिक समझेगा?

हाँ, तो हर संदेह करने वाले पर धमकी का बचाव कठिन होता है। नहीं, तो पूछें कि विश्वास अर्जित न किए दावे को न मानने में गलत काम क्या है।

कितनी सावधानी से खोजूँ और लोगों से कैसा व्यवहार करूँ, चुन सकता हूँ। उन चुनावों की वजह सहित आलोचना हो सकती है। नैतिक सुरक्षा की कीमत बनाकर निश्चितता गढ़ने की माँग नकारता हूँ। न्यायपूर्ण फैसला बेईमानी और ईमानदार यकीन की कमी में फर्क करे।

अध्याय 9रचना के छह दिन पृथ्वी की उम्र से मेल खाते हैं?

उत्पत्ति 1 दिनों में रचना का क्रम देता है। उसके बाद सातवाँ दिन है। कुछ ईसाई हाल के अतीत के सामान्य दिन पढ़ते हैं। दूसरे साहित्यिक क्रम या लंबे काल समझते हैं। दावे अलग हैं, इसलिए अलग जाँच चाहिए।[24]

पृथ्वी पुरानी है, यह कैसे जानते हैं?

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण रेडियोधर्मी बदलाव और पृथ्वी व उल्कापिंडों के प्रमाण से करीब 4.54 अरब वर्ष, यानी 454 करोड़ वर्ष की उम्र समझाता है। उल्कापिंड अंतरिक्ष की सामग्री का जमीन तक पहुँचा टुकड़ा है। अनुमान परिवार की पीढ़ियाँ गिनकर नहीं मिलता।[25]

कुछ परमाणु अस्थिर हैं। समय के साथ मापने योग्य दर से दूसरे परमाणुओं में बदलते हैं। सही परिस्थितियों में शुरुआती और बने पदार्थ की मात्रा से अनुमान मिलता है कि खनिज कब बना। यह भौतिक तरीका है। उसकी धारणाएँ जाँचनी होती हैं।

ऐसी रेतघड़ी सोचिए जिसकी बहने की दर ज्ञात है। इस्तेमाल के लिए शुरुआत और रेत बाहर निकली या नहीं, समझना होगा। वैज्ञानिक सामग्री पर मिलते सवाल पूछते हैं। हर मामले के अनुकूल तरीके और जाँच लगाते हैं। असली उम्र निकालना मिसाल से अधिक जटिल है।

तरीका अतीत का केवल अंदाजा है?

अतीत का हर अध्ययन अभी बचे प्रमाण लेता है। धार्मिक इतिहास भी। सवाल है कि तरीके की धारणाएँ जाँच सकते हैं और अलग प्रमाण साथ बैठते हैं या नहीं।

बचाव करने वाला खास नमूना या गणना चुनौती दे सकता है। ठीक समस्या और नतीजे पर असर बताए। एक अनुपयुक्त नमूना हर तरीका नहीं मिटाता। एक खराब घड़ी से समय न माप सकना नहीं निकलता।

पृथ्वी की उम्र कार्बन डेटिंग से नहीं निकाली जाती। बहुत पुरानी चट्टान पर कार्बन लगाने की आलोचना उपयुक्त सामग्री के यूरेनियम आधारित तरीके का उत्तर नहीं। आलोचना असली तरीके से मेल खाए।

ईश्वर ने हाल में पुरानी दिखती दुनिया बनाई हो, तो?

यह अलग प्रस्ताव है। ईश्वर ने उम्र के सारे निशान पहले से रखे हों, तो भौतिक इतिहास जानबूझकर भ्रामक हो जाता है। ऐसा होने का स्वतंत्र प्रमाण क्या है?

रचयिता माप लगातार लंबे इतिहास की ओर क्यों लगाएगा और फिर उन पर भरोसा करने वालों को दोष क्यों देगा? प्रस्ताव हर संभव दिखावट समझाए, तो सामान्य लंबे इतिहास से अलग करने वाला अवलोकन क्या होगा?

उत्पत्ति समय-सारणी के बजाय अर्थ की बात हो, तो?

तब हाल के छह-दिन वाले विवरण से टकराव बदलता है। ईसाई पुरानी पृथ्वी स्वीकारकर भी ईश्वर की रचना मान सकता है। उम्र के वैज्ञानिक प्रमाण अकेले वह व्यापक विश्वास नहीं काटते।[26]

अगला सवाल है कि अर्थ चुना कैसे। पाठ तथ्य की समय-सारणी बताया जा रहा था? यहाँ प्रतीकात्मक अर्थ का नियम क्या है? दूसरी कठिन कहानियों में भी वही लगता है?

मैं हाल की रचना का दावा नकारता हूँ क्योंकि संसार के प्रमाण से मेल नहीं खाता। बचाव करने वाला साहित्यिक या धार्मिक विवरण पर आए, तो नया दावा साफ चर्चा करें। शब्द सटीक वैज्ञानिक समय-सारणी होकर साथ में हर वैज्ञानिक जाँच से नहीं बच सकते।

अध्याय 10कौन-से प्रमाण मनुष्य को विकासक्रम में रखते हैं?

विकासक्रम पीढ़ियों में विरासत के गुणों का बदलाव और जीवन का शाखाओं वाला इतिहास है। विरासत का गुण माता-पिता से संतान तक मिलता है। सिद्धांत वंश के ढाँचे समझाता है। यह नहीं कहता कि आधुनिक चिंपैंजी ने अचानक मनुष्य को जन्म दिया।

मनुष्य और आधुनिक चिंपैंजी के पुराने साझा पूर्वज थे। दोनों वंश बदले। परिवार में चचेरे भाई हो सकते हैं, बिना एक दूसरे के पिता बने। स्मिथसोनियन की आनुवंशिकी वाली व्याख्या मनुष्य और दूसरे कपियों का करीबी रिश्ता समझाती है।[27]

क्या बदलाव देखे जा सकते हैं?

हाँ। लंबे प्रयोग में ई. कोलाई जीवाणुओं की अलग आबादियाँ रखी गईं। एक वंश ने उस प्रयोग की परिस्थितियों में ऑक्सीजन रहते साइट्रेट को भोजन बनाने की क्षमता विकसित की। साइट्रेट बढ़ाने के मिश्रण का रसायन है।[28]

इससे जीवाणु मनुष्य नहीं बने। शोधकर्ताओं को नई विरासत वाली क्षमता उठना पढ़ने मिला। अध्ययन विकासक्रम के प्रमाण का एक हिस्सा है, अपने पैमाने और सीमाओं सहित।

तीन पीढ़ियों में गहरे रंग वाले जीवों का बढ़ता हिस्सा प्राकृतिक चयन समझाता है।
केवल समझाने का चित्र, प्रयोग के आँकड़े नहीं। विरासत का कोई गुण बचने या संतान छोड़ने में मदद करे, तो पीढ़ियों में उसका हिस्सा बढ़ सकता है।

प्राकृतिक चयन में विरासत के फर्क जीने और संतान होने पर असर डाल सकते हैं। इससे गुण कितने आम हैं, बदलता है। संयोग और आबादी का इतिहास भी जरूरी हैं। बदलाव से पहले लक्ष्य की योजना बनाना विकासक्रम को नहीं चाहिए।

मानव गुणसूत्र 2 क्यों जरूरी है?

गुणसूत्र डीएनए का पैकेट है। मनुष्य में आम तौर पर 46 और चिंपैंजी में 48 हैं। वंशों के साझा पूर्वज हैं, तो गिनती अलग क्यों?

एक व्याख्या में मानव वंश में पूर्वजों के दो गुणसूत्र जुड़े। आईडो और सहयोगियों ने मानव गुणसूत्र 2 के भीतर दोहराते डीएनए अंश बताए जो पुराने सिरे-से-सिरे जुड़ाव से मेल खाते हैं। सिरों पर अपेक्षित निशान भीतर आमने-सामने मिले।[29]

दो पुराने गुणसूत्र और जुड़ा मानव गुणसूत्र, जिसके बीच पुराने जुड़ाव की जगह दिखाई गई है।
आकार और लंबाई पैमाने पर नहीं हैं। शोध में डीएनए के क्रम जाँचे जाते हैं; यह चित्र समझाने के लिए है, नया प्रयोग नहीं।

प्रस्तावित इतिहास से अनुमानित सटीक ढाँचा धुँधली समानता से अधिक वजन रखता है। चित्र धारणा सरल करता है। वह डीएनए का क्रम या नया प्रयोग नहीं।

डीएनए ही अकेला प्रमाण है?

नहीं। जीवाश्म और संसार के दूसरे प्रमाण मानव रूपों और व्यवहार का इतिहास जोड़ते हैं। स्मिथसोनियन कई प्रमाण साथ देता है। किसी एक जीवाश्म पर हर कदम साबित करने का भार नहीं है।[30]

जीवाश्मों की कमी डीएनए की खोज नहीं मिटाती। परिवार के पेड़ की एक शाखा में विवाद से हर विवरण बराबर अच्छा नहीं बनता। नई खोज कौन-सा निष्कर्ष बदलती है, यह पहचानें।

विकासक्रम पहला जीवन समझाता है?

पहले जीवन की उत्पत्ति अगला शोध-सवाल है। विकासक्रम पढ़ता है कि प्रजनन और फर्क आगे देने वाली व्यवस्थाओं में क्या होता है। पहले जीवन का अधूरा विवरण बाद के वंश के प्रमाण नहीं मिटाता।[31]

ईश्वर ने विकासक्रम इस्तेमाल किया हो, तो?

ईसाई यह मत रख सकता है। तब उसका दावा मानव वंश को विकासक्रम से टकराने वाला नहीं रहा। बाकी सवाल है कि अतिरिक्त ईश्वरीय उद्देश्य या मार्गदर्शन का प्रमाण क्या है।

सामान्य जीव-विज्ञान में अलग हालिया मानव रचना नकारता हूँ क्योंकि साझा पूर्वज जितनी अच्छी तरह मिले-जुले प्रमाण नहीं समझाती। विकासक्रम हर संभव ईश्वर का न होना नहीं साबित करता। वह शाब्दिक उत्पत्ति-कथा से उसकी बताई दुनिया के प्रमाणों का सामना माँगता है।

अध्याय 11क्या आदम और हव्वा सबको दोषी बना सकते हैं?

क्या आदम और हव्वा वे अकेले दो लोग थे जिनसे सभी इंसान शुरू हुए? उनका गलत काम बाद के लोगों को दोषी बना सकता है? सवाल अलग हैं। पहले में डीएनए मदद कर सकता है। बच्चे पर कितना दोष उचित है, नहीं बताता।

उत्पत्ति 3 पहली अवज्ञा और उसके बाद का वर्णन करता है। रोमियों 5 आदम, पाप और मृत्यु को मसीह से जोड़ता है। चर्च इन अंशों को अलग तरीके से लेते हैं। बाद के लोगों को विरासत में क्या मिलता है, सब एक शिक्षा नहीं देते।[14][32]

क्या डीएनए हाल में केवल दो लोगों से शुरुआत दिखाता है?

प्रमाण लंबे और अधिक जटिल मानव इतिहास की ओर हैं। उसमें दूसरे कपियों से साझा पूर्वजों का वंश भी है। सामान्य विरासत में हाल का केवल एक जोड़ा उस तस्वीर से मेल नहीं खाता।[27]

ली और डर्बिन ने पुरानी आबादियाँ पढ़ने को पूरे जीनोम लिए। जीनोम व्यक्ति का पूरा डीएनए-संग्रह है। उन्होंने मॉडल लिया: गणित में व्यक्त नियम, जो संभव इतिहासों को आज के डीएनए ढाँचों से जोड़ते हैं।[33]

उनका आबादी का प्रभावी आकार सभी जीवित लोगों की गिनती नहीं। मॉडल के तहत समूह का आनुवंशिक इतिहास बताता है। पद्धति की सीमा भी है। हालिया घटनाएँ और अचानक थोड़े समय वाले बदलाव साफ पकड़ने में कमजोर है।

एक ग्राफ से यह दावा न बनाएँ कि हर क्षण लोगों की ठीक संख्या जानते हैं। तर्क कई प्रमाण लेता है। अकेले संस्थापक जोड़े का बचाव करने वाला संयुक्त प्रमाण समझाए।

एक साझा मातृपूर्वज का क्या?

वंश की एक रेखा पूरा परिवार का पेड़ नहीं। केवल माँ की माँ तक खोजें, तो साझा पूर्वज उस समय की अकेली स्त्री होना जरूरी नहीं।

परिवार की एक शाखा में आगे चलता नाम सोचिए। नाम का एक साझा स्रोत हो सकता है, जबकि दूसरे लोग भी परिवार के पेड़ में हैं। मिसाल की सीमाएँ हैं। फिर भी दिखाती है कि बची एक रेखा पूरे समूह का आकार क्यों नहीं बताती।

बड़ी आबादी के भीतर दो लोग, मानवता अकेले शुरू करने वाले दो लोगों से अलग दावा हैं। चमत्कार जोड़ना भी दावा बदलता है। किसी बदलाव से डीएनए ने नाम वाले जोड़े को पहचान लिया, यह नहीं दिखता।

आदिपाप बच्चे की अपनी गलती है?

कैथोलिक शिक्षा में यह विरासत की दशा है, आदम के वंशजों का व्यक्तिगत किया दोष नहीं। धर्मशिक्षा 390 पहली घटना का दावा रखते हुए कहानी की भाषा प्रतीकात्मक भी बताती है। प्रतीकात्मक यानी चित्रों से विचार कहना।[13]

वेस्टमिन्स्टर कन्फेशन रिफॉर्म्ड मत देता है जिसमें विरासत का दोष और बिगड़ी प्रकृति हैं। वह हर ईसाई की आवाज नहीं।[6]

पूछें कि कौन-सा दावा है। दशा आगे जाती है, तो अच्छे रचयिता ने असर ऐसा क्यों बनाया? दोष आगे जाता है, तो काम न चुनने वाले के साथ न्याय कैसे?

काम बच्चे को नुकसान दे सकता है, बिना उसे दोषी बनाए?

हाँ। माता-पिता के चुनाव बच्चे को कर्ज या खतरे में छोड़ सकते हैं। बच्चे ने स्थिति नहीं चुनी। इससे मदद की वजह मिलती है, बच्चे को दोष देने की नहीं।

यहेजकेल 18 व्यक्ति के अपने काम पर जोर देता है। बचाव करने वाला उसे रोमियों के साथ पढ़ने का तरीका दे सकता है। कड़ी समझाए। दोनों उद्धृत कर देना काम नहीं करता।[34]

किसी न किए काम का दोष आगे सौंपना मैं नकारता हूँ। विरासत में आहत दशा वाली बात उस खास आरोप से बचती है। फिर भी रचयिता की बनावट, कहानी के इतिहास और धार्मिक इलाज पर भरोसे के सवाल छोड़ती है।

अध्याय 12क्या हाल की विश्वव्यापी बाढ़ प्रमाण समझा सकती है?

उत्पत्ति 6-9 बाढ़, जहाज, विनाश और वाचा की कथा कहता है। वाचा यहाँ समझौते या वचन की बात है। कुछ पाठक हाल की पूरे ग्रह को ढकती घटना मानते हैं। दूसरे क्षेत्र की आपदा या धार्मिक कहानी। अलग रूप अलग प्रमाण का अनुमान देते हैं।[35]

पूरे संसार की घटना को क्या समझाना होगा?

लगभग सारा स्थलीय जीवन मिटाने वाली बाढ़ भौतिक इतिहास का दावा है। पूछें कि चट्टानों के क्रम, आबादियों के इतिहास और बर्फ के लंबे रिकॉर्ड से कैसे बैठती है। घटना कहाँ रखी गई और उस समय क्या निशान चाहिए?

NOAA के संग्रह में अंटार्कटिका की बर्फ की गहरी बेलनाकार परतों का रिकॉर्ड है। अपनी दी उम्र-गणना पर वह करीब 8,01,000 वर्ष पीछे तक जाता है। वैज्ञानिक तारीख और व्याख्या लेता है। शोधकर्ताओं ने बस हर दिखाई निशान एक वर्ष गिना, ऐसा दावा नहीं।[36]

पृथ्वी की बहुत पुरानी उम्र रेडियोमितीय प्रमाणों से समर्थित है। मानव डीएनए भी समझाने योग्य इतिहास रखता है। स्रोत एक जहाज के बचे लोगों से संसार का हालिया फिर शुरू होना नहीं बताते।[25][33]

चुनौती संयुक्त विवरण के मेल की है। बचाव में प्रमाणों में साथ काम करती भौतिक व्याख्या चाहिए। एक चट्टान या स्थानीय बाढ़ की अकेली कहानी पर्याप्त नहीं।

पहाड़ पर समुद्री खोल से बाढ़ साबित होती है?

उससे खोल या उसके भीतर की सामग्री का समझाने योग्य इतिहास दिखता है। अकेले उससे विश्वव्यापी बाढ़ की तारीख या नूह की घटना नहीं पहचानी जाती।

अलग संस्कृतियों की बाढ़-कथाओं पर भी यही तर्क है। साझा विषय इतिहास में रोचक हो सकते हैं। एक ग्रह-भर की घटना दिखाने को तारीख वाले प्रमाण चाहिए कि कथाएँ उसी की हैं। वे अलग आपदाएँ या फैलकर पहुँची परंपराएँ भी हो सकती हैं।

मेरी बात प्रमाण से निकलने वाले निष्कर्ष की है। किसी खास पहाड़ी नमूने की जाँच या हर बाढ़-परंपरा का इतिहास खोज लेने का दावा नहीं।

चमत्कार सारी मुश्किलें हटा सकता है?

बचाव करने वाला पशुओं, पानी, यात्रा और दोबारा बसने के लिए अलौकिक मदद जोड़ सकता है। सामान्य भौतिक तरीके से जाँच कठिन होती है। हर अतिरिक्त काम का अलग प्रमाण क्या है?

ईश्वर ने ग्रह ऐसे लौटाया कि बचे सारे निशान दूसरे इतिहास से बैठें, तो कौन-सा भौतिक अवलोकन कहानी के विरुद्ध होगा? हर जाँच से बचा दावा साथ में उन्हीं प्रमाणों से पुष्ट नहीं कहा जा सकता जिन्हें उसने अप्रासंगिक बना दिया।

स्थानीय बाढ़ नैतिक सवाल सुलझा देगी?

भौतिक दावा बदलता है। इतिहास पढ़ने का काम भी बदल सकता है। बताई हत्याएँ अपने आप उचित नहीं होतीं। दूसरों की गलती पर बच्चे और पशु नष्ट हों, तो कीमत वे क्यों चुकाएँ?

शक्तिशाली रचयिता हानिकारक लोगों को सीधे रोक सकता था? कमजोरों को बचा सकता था? विनाश ही सीख का तरीका क्यों? घटना को न्याय कहना प्रस्तावित उद्देश्य बताता है, उसका न्यायपूर्ण होना नहीं।

कहानी प्रतीकात्मक हो, तो?

तब भूविज्ञान की रिपोर्ट बनाने के बजाय उसकी शिक्षा जाँचें। ईसाई चेतावनी या वादे में अर्थ पा सकता है। इससे हाल की शाब्दिक विश्वव्यापी बाढ़ होना नहीं दिखता।

संसार के मिले-जुले प्रमाणों की व्याख्या के रूप में वह शाब्दिक विवरण नकारता हूँ। व्यापक विनाश पर ईश्वरीय नाम रखकर नैतिक जाँच खत्म करना भी। कहानी का अर्थ और पीड़ितों का अंजाम दोनों सवाल माँगते हैं।

अध्याय 13प्रार्थना के बाद ठीक होना ईश्वर का हस्तक्षेप दिखाता है?

बीमार के लिए प्रार्थना होती है और बाद में सुधार होता है। सुधार वास्तविक और स्वागत योग्य हो सकता है। अगला सवाल उसके कारण का है। केवल पहले और बाद का क्रम जवाब तय नहीं करता।

यूहन्ना 14:12-14 में यीशु के नाम से माँगने के वादे हैं। याकूब 5 प्रार्थना को बीमार की देखभाल से जोड़ता है। आस्तिक वादा ईश्वर की इच्छा, व्यापक संदर्भ या आध्यात्मिक उपचार से समझा सकता है। जाँच से पहले ठीक नतीजे का दावा पहचानें।[37][38]

कौन-सा प्रमाण मदद करेगा?

निदान, पहले और बाद के रिकॉर्ड, मिला इलाज, समय और आगे की स्थिति पूछें। चिकित्सकों का वास्तविक निष्कर्ष क्या था? "बिना व्याख्या" का अर्थ है कि उपलब्ध प्रमाण से कारण नहीं जाना गया। वह ईश्वर को कारण नहीं पहचानता।

असफल मामले भी चाहिए। केवल सुधरे लोग दिखाएँ, तो नहीं जान सकते कि वैसे भी कितने ठीक होते। अतिरिक्त भौतिक लाभ के दावे को निष्पक्ष तुलना चाहिए।

यह देखभाल टालने की माँग नहीं है। चिकित्सकीय फैसलों में योग्य सलाह चाहिए। अलौकिक दावे की जाँच इलाज छोड़ने की वजह नहीं देती।

प्रार्थना के एक बड़े अध्ययन में क्या मिला?

STEP अध्ययन में हृदय बाईपास शल्यक्रिया से गुजरते 1,802 लोग थे। तय तरीके में दूसरों की सौंपी प्रार्थना से बिना जटिलता ठीक होना नहीं बढ़ा। प्रार्थना मिलना निश्चित जानने वाले समूह में उसी अध्ययन में अधिक जटिलताएँ थीं।[39]

यह उस खास शोध और परिस्थिति का परिणाम है। प्रमाण नहीं कि हर प्रार्थना बेकार, हर निजी अनुभव झूठा या कोई ईश्वर संभव नहीं है। वह सरल दावा जरूर चुनौती पाता है कि इस प्रार्थना ने वे मापे नतीजे स्पष्ट सुधारे।

नास्तिक नारा कम नाटकीय बने, तब भी सीमाएँ माननी होंगी।

ईश्वर जाँच मना कर दे, तो?

आस्तिक कह सकता है कि ईश्वर स्वतंत्र काम करता है और प्रयोग में मना कर सकता है। विश्वास के भीतर संभावना बचती है। प्रार्थना का भौतिक असर वैज्ञानिक रूप से दिखने का दावा भी सीमित होता है।

विफल परिणाम कभी विरुद्ध नहीं गिना जाए, तो सफलता अपने आप पक्ष में क्यों? नियम दोनों नतीजों से निष्पक्ष व्यवहार करे।

फिर भी गवाही जरूरी हो सकती है?

हाँ। गवाही अध्ययन योग्य रिकॉर्ड तक ले जा सकती है। हर गवाह को बेईमान घोषित न करें। ईमानदार व्यक्ति कारण गलत पहचान सकता है, चिकित्सकीय बारीकी न जान सकता है या दोहराते हुए बदली कहानी सुन सकता है।

दूसरे धर्म के उपचार-दावे पर भी वही कसौटी हो। हर स्वस्थ होने को नकारे बिना उनका ईश्वरीय कारण नकारते हैं, तो ईसाई उपचार को अपने आप छूट क्यों?

प्रार्थना का वास्तविक निजी महत्व हो सकता है?

व्यक्ति उससे शांति, उम्मीद या साथ पा सकता है। अनुभव का ठीक वर्णन होना चाहिए। दिलासे का अनुभव और दिखाई गई बीमारी की मुक्ति अलग दावे हैं।

अलौकिक कारण दिए बिना किसी का ठीक होना स्वीकार और पसंद कर सकता हूँ। चर्च इसे अधिकार के प्रमाण में ले, तो कृतज्ञ कहानी से अधिक दे। कारण ही अभी दिखाने वाला हिस्सा है।

अध्याय 14चमत्कार का विवरण कब भरोसेमंद होगा?

चमत्कार के दावे में कई कदम हो सकते हैं। किसी ने घटना बताई। कुछ असामान्य हुआ हो सकता है। सामान्य व्याख्याएँ अपर्याप्त लग सकती हैं। फिर बोलने वाला ईश्वरीय कारण और धार्मिक संदेश पहचानता है।

हर कदम को आधार चाहिए। व्याख्या की खाली जगह ईसाई ईश्वर का हस्ताक्षर किया संदेश नहीं।

पुराने चमत्कार का वीडियो होना जरूरी है?

नहीं। हर प्राचीन घटना पर यह अनुचित माँग होगी। इतिहासकार दस्तावेज, वस्तुएँ, तारीखें और स्रोतों की तुलना लेते हैं। विवरण किसने लिखा और जानकारी कैसे मिली, ये आम सवाल पूछ सकते हैं।

बताई घटना फिर भी मायने रखती है। यात्रा का विवरण और मरा व्यक्ति बदले शरीर में लौटा, यह विवरण सामान्य अनुभव से बराबर दूर नहीं हैं। मजबूत दावे को अतिरिक्त भार उठाने लायक प्रमाण चाहिए।

कई विवरण अपने आप स्वतंत्र हैं?

नहीं। कई लोग एक स्रोत दोहरा सकते हैं। स्वतंत्रता में प्रमाण वास्तव में अलग रास्तों से आएँ, कम से कम जाँचे जा रहे पहलू में।

मानिए पाँच वेबसाइट एक गवाह की चिट्ठी छापती हैं। पाँच प्रतियाँ और बताया एक गवाह मिला। प्रतियाँ चिट्ठी बचाने में मदद कर सकती हैं। घटना देखने वाले चार अतिरिक्त लोग नहीं बनते।

सुसमाचारों के आपस में महत्वपूर्ण रिश्ते हैं। USCCB की भूमिका साझा सामग्री और बनने की चर्चा करती है। चार पूरी तरह अलग विवरण गिनने से पहले रिश्ते देखने होंगे।[40]

ईमानदारी कारण साबित करती है?

व्यक्ति निश्चित, साहसी और ईमानदार होकर भी अनुभव के कारण पर गलत हो सकता है। दर्शन का विवरण ईमानदार है, तो व्यक्ति के विश्वास का प्रमाण है। कारण पहचानने को आगे तर्क चाहिए।

इससे कारण सुलझ गया, ऐसा नहीं। एक व्याख्या स्वीकार न करना और दूसरी सिद्ध करना अलग काम हैं। आधार बिना भ्रम, धोखा या गलत पहचान घोषित नहीं करूँ।

प्राकृतिक उत्तर न होना ईश्वर का काम है?

इसका अर्थ है कि चर्चा में पर्याप्त प्राकृतिक व्याख्या दिखाई नहीं गई। ईश्वरीय विवरण को अपना स्थान अर्जित करना है। ईश्वर ने क्या किया? यही ईश्वर क्यों? किस गुण से काम अनजान घटना या अधूरे विवरण से अलग है?

प्रतिद्वंद्वी जिस प्रमाण की उम्मीद न करे, उसे दिखाए तो तर्क मजबूत होता है। किसी भी परिणाम में फिट होने वाली ईश्वरीय शक्ति इस्तेमाल करे, तो कमजोर।

एक असली चमत्कार हर चर्च-शिक्षा सिद्ध करेगा?

असाधारण घटना मजबूती से दिखाई भी जाए, तो पूरा धार्मिक अर्थ सवाल रहेगा। उससे खास पुस्तक-सूची, चर्च का पद या शादी का नियम क्यों दिखेगा? चमत्कार शब्द में ये कड़ियाँ छिपाकर नहीं जोड़ सकते।

ईसाई यीशु, संदेश और पुनरुत्थान का जुड़ा तर्क दे सकता है। पूरा सुनना चाहिए। हर रिश्ता भी समझाए। एक हिस्सा उलझा रह गया, इसलिए सब स्वीकारने की माँग न हो।

मेरी कसौटी गंभीर प्रमाण की जगह छोड़ती है। परिभाषा से चमत्कार असंभव नहीं बनाती। पूछती है कि ईश्वरीय व्याख्या विकल्पों से अधिक समर्थित क्यों है और निष्कर्ष माँगे अधिकार जितना दूर क्यों जाता है।

अध्याय 15बाइबल में कौन-सी पुस्तकें हों, यह किसने तय किया?

कैनन पवित्र पुस्तकों की स्वीकृत सूची है। बाइबल का हर वाक्य सच है पूछने से पहले पूछें कि कौन-सा संग्रह और उसका अधिकार क्यों।

कैथोलिक शिक्षा पुराने नियम की 46 और नए नियम की 27 पुस्तकें सूची में रखती है। वेस्टमिन्स्टर कन्फेशन प्रोटेस्टेंट सूची देता है। एपोक्रिफा कही पुस्तकों को धर्मग्रंथ के अपने नियम से बाहर रखता है। संग्रह अलग हैं। ऑर्थोडॉक्स चर्च इन अमेरिका भी पुराने नियम का लंबा कैनन बताता है।[41][6][42]

बात यह नहीं कि अंतर से हर संग्रह गलत हो जाता है। बात है कि बाइबल शब्द विवादित सीमाओं का फैसला चुपचाप नहीं करता।

प्रेरित पद पूरी विषयसूची दे सकता है?

दूसरा तीमुथियुस का धर्मग्रंथ वाला कथन अक्सर ईश्वरीय प्रेरणा के बचाव में आता है। वह खुद बाद के चर्च की दोनों आवरणों के बीच रखी हर पुस्तक नहीं गिनाता।[2]

सूची चर्च पहचानता है, तो चर्च के फैसले पर भरोसा क्यों? चर्च ने चुनी सूची के पद से अपना अधिकार साबित किया, तो गोल घूमने से कौन-सा स्वतंत्र आधार बचाता है?

बचाव में पहले के चर्चों ने कैसे स्वीकारा, प्रेरितों से संबंध या पवित्र आत्मा का मार्गदर्शन बताया जा सकता है। प्रस्तावित वजहें हैं। उनका प्रमाण और विरोधी संग्रह से फर्क करने का आधार पूछ सकते हैं।

लंबी परंपरा सही चयन साबित करती है?

उससे समुदाय ने कुछ पुस्तकें सुरक्षित और मूल्यवान रखीं, दिखता है। समुदाय के इतिहास में बड़ा प्रमाण हो सकता है। लोकप्रिय स्वीकृति अकेले ईश्वरीय फैसला नहीं दिखाती।

पुराने दस्तावेजों का एक संग्रह सोचिए। उसे सँभालने वाले सहमत हैं कि कौन-से रिकॉर्ड भरोसेमंद हैं। उनकी देखभाल जरूरी है। फिर भी जाँचना होगा कि रिकॉर्ड क्यों चुने गए और हर एक क्या दिखाता है। उनकी सहमति से हर बताई घटना सच नहीं हो जाती।

वैसे ही मतभेद से भरोसेमंद फैसला असंभव नहीं होता। काम मिलता है: विरासत की अपनी सूची को जाँच से ऊपर न मानकर वजहों की तुलना करें।

महत्व होने के लिए हर शब्द ईश्वर का लिखवाया होना जरूरी है?

कई ईसाई लेखकों को निष्क्रिय कलम नहीं मानते। कैथोलिक शिक्षा मानव लेखक, साहित्यिक रूप और लेखकों के इरादे की चर्चा करती है। यह मशीन की तरह लिखवाने की सरल तस्वीर से अधिक समृद्ध दावा है।[41]

साथ में सीमा का सवाल आता है। कौन-से हिस्से ईश्वरीय शिक्षा, कौन परिस्थिति के असर और कौन सुधार योग्य? कठिन अंश मिलने से पहले फर्क कैसे होगा?

दावा उद्धार के लिए ईश्वर के चाहे सच तक सीमित हो, तो पूछें कि दायरे में क्या आता है। तथ्य की समस्या आने के बाद ही नियम सटीक नहीं बनाया जा सकता।

बाहर का व्यक्ति क्या निष्कर्ष निकाले?

कैनन का अस्तित्व धार्मिक फैसले और संरक्षण का प्रमाण है। अंतिम संग्रह का ईश्वरीय लेखक होना अभी नहीं। संग्रह का अधिकार दिखाने वाले काम में बाकी है।

बाइबल को साहित्य और इतिहास का बड़ा संग्रह पढ़ सकता हूँ, बिना उसके लिए किए हर दावे को माने। कोई उसे ईश्वर का अंतिम नियम कहकर आज्ञा माँगे, तो सीमाओं और अधिकार की वजहें उसकी सामग्री जितनी गहरी जाँच के लिए खुली हों।

अध्याय 16पाठ सुरक्षित रहने से उसके दावे सच हो जाते हैं?

मानिए डायरी की बिल्कुल सही प्रति बच गई। लेखक ने क्या कहा, इसका भरोसा हो सकता है। उसका विवरण सही था या नहीं, यह अभी जानना है। शब्द बचाना और घटना की पुष्टि अलग उपलब्धियाँ हैं।

बाइबल का पाठ बहुत सावधानी से आगे पहुँचा हो, तब भी फर्क लागू है। इंसानी दावा बिना नकल की गलती के भी इंसानी दावा रह सकता है।

पांडुलिपियों के अंतर पूरी बाइबल बेकार बनाते हैं?

नहीं। पांडुलिपि हाथ से लिखी प्रति है। प्रतियाँ मिलाने से पाठ पहचान और अंतर ढूँढ़ सकते हैं। विविधता के प्रमाण का मतलब हर पंक्ति अनजान नहीं।

बहुत प्रतियाँ दिखाने वाला तुलना की उपयोगी सामग्री बताता है। अगले सवाल हैं कौन-सी प्रतियाँ, कब की, आपस में क्या रिश्ते और क्या अंतर। संख्या अकेले फैसला नहीं करती।

हर वर्तनी के अंतर को अलग नष्ट शिक्षा गिनने वाला आलोचक भ्रमित गिनती देता है। पहचानें कि अंतर बदलता क्या है।

मरकुस के अंत का क्या हुआ?

कई छपी बाइबल में मरकुस 16 का छोटा अंत पद 8 पर और लंबा अंत पद 9-20 में है। USCCB की पाठ-टिप्पणियाँ लंबे अंत की बाद की रचना को मरकुस के अपने काम से अलग करती हैं। यह भी बताती हैं कि कैथोलिक लंबा अंत अधिकृत संग्रह का हिस्सा मानते हैं।[43]

यह स्वीकार नहीं कि पूरा पुनरुत्थान उसी अंत में बाद में जोड़ा गया। खाली कब्र और पुनरुत्थान की घोषणा उससे पहले हैं। बिंदु छोड़ने वाला आलोचक प्रमाण से अधिक कहता है।[44]

असली सवाल मूल रचना, बाद में शामिल होने और धार्मिक अधिकार के रिश्ते का है। अंश चर्च में अधिकृत होकर भी ऐसा इतिहास रख सकता है जिसे पाठक जानने का हक रखते हैं।

व्यभिचार में पकड़ी स्त्री की कहानी का क्या?

कई बाइबल में परिचित कहानी यूहन्ना 7:53-8:11 पर है। USCCB की टिप्पणियाँ उस जगह उसे बाद में जोड़ा अंश बताती हैं। वह शुरुआती यूनानी पांडुलिपियों में नहीं और कुछ प्रतियों में दूसरी जगह है।[45]

नैतिक आकर्षण से यूहन्ना के पाठ में उसका मूल स्थान नहीं सिद्ध होता। पाठ का इतिहास भी पूरे सुसमाचार का हर हिस्सा गलत नहीं साबित करता। निष्कर्ष प्रमाण से मेल खाए।

दूसरे धर्म की प्रिय पंक्ति केवल पसंद से मूल मानेंगे? स्थान बदला, केवल इसलिए उसकी नैतिक समझ छोड़ देंगे? फैसले अलग हैं।

क्या अनुवादकों पर पद चुपके मिटाने का आरोप लगाएँ?

कभी अंतर इस कारण है कि अनुवाद किस पांडुलिपि का पाठ लेता है। टिप्पणी खुलकर बताती है। साजिश कहने से पहले स्रोत और टिप्पणियाँ मिलाएँ। पादटिप्पणी बात उजागर करने का संकेत भी हो सकती है।

पूछें कि पाठ का आधार क्या है और संस्करण अनिश्चितता साफ करता है या नहीं। बड़ी पाठ-संबंधी समस्या का पता पाठक को केवल बहस में चुनौती के बाद नहीं लगना चाहिए।

इन सवालों के बाद क्या बचता है?

सुरक्षित पाठ और सावधान तुलना से बहुत सीख सकते हैं। धार्मिक दावा आगे जाता है: शब्द ईश्वरीय अधिकार रखते हैं। उसे केवल बच जाने से अधिक वजहें चाहिए।

दो छोटे रास्ते नकारता हूँ। सुरक्षित किताब जरूरी नहीं सच हो और पांडुलिपि के अंतर वाली जरूरी नहीं बेकार। गंभीर काम पाठ दिखाना, दावे परखना और किसी हिस्से को दूसरे का जीवन क्यों चलाना चाहिए, समझाना है।

अध्याय 17क्या सुसमाचार चार अलग प्रत्यक्षदर्शियों के विवरण हैं?

बाइबल के चार सुसमाचार मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना कहलाते हैं। शीर्षक परंपरा से पहुँचा नाम देता है। अकेले नहीं बताता कि हर वाक्य किसने लिखा या लेखक ने घटना देखी थी।

USCCB अमेरिका के कैथोलिक बिशपों की संस्था है। बाइबल की उसकी टिप्पणियाँ सुसमाचार की परंपराओं के लिखित होने की व्याख्या देती हैं। मत्ती की टिप्पणी अनजान लेखक का उल्लेख करती है जिसने मरकुस और दूसरी सामग्री ली। स्रोतों पर ये मत ईसाई प्रकाशन में हैं।[40][46]

अनजान लेखक का मतलब झूठी कहानी?

नहीं। नाम न पता हो तब भी लेखक सही तथ्य बचा सकता है। नाम वाला लेखक गलती कर सकता है। लेखक जानने से यह आँकने में मदद मिलती है कि क्या जान सकता था और कैसे।

कोई सीधा प्रत्यक्षदर्शी विवरण कहे, तो आधार पूछें। लेखक खुद वहाँ होने का दावा करता है? बाद का स्रोत नाम देता है? बाद का दावा असली लेखन से कैसे जुड़ता है?

जाँचे बिना न रिश्ता मान लें, न पहले ही नकारें। तर्क को कदमों को जोड़ने वाला प्रमाण चाहिए।

लूका अपने काम के बारे में क्या कहता है?

लूका 1:1-4 पहले के विवरण और गवाहों से पहुँची सामग्री लेने को कहता है। घोषित उद्देश्य व्यवस्थित विवरण देना है। यह स्रोत इस्तेमाल करने का दावा है, हर दृश्य खुद देखने का नहीं।[47]

उद्देश्य गंभीरता से लें। फिर भी पूछ सकते हैं कि लेखक ने काम कितना अच्छी तरह किया। सावधान शुरुआत आगे की हर घटना साबित नहीं करती।

किसी को स्थानीय इतिहास लिखते सोचिए। मेहनत करे और पुरानी चिट्ठियाँ ले। फिर भी चिट्ठी, तारीख और उनसे निकाले दावे जाँचेंगे। यहाँ भी काम वही बचता है।

एक लेखक दूसरे को इस्तेमाल करे, तो क्या बदलेगा?

मिलते दो विवरण एक पुराना स्रोत बचा सकते हैं। घटना तक दो अलग रास्ते हमेशा नहीं देते। USCCB की मत्ती टिप्पणी मरकुस का उपयोग बताती है और लेखन-क्रम में मत्ती उसके बाद रखती है।[46]

दो रिपोर्ट दुर्घटना बताएँ। एक दूसरी की नकल हो, तो उनका मेल दोनों के खुद देखने से अलग वजन रखेगा। स्रोतों में कौन-सी स्थिति है, जानना होगा।

इसका मतलब हर समानता नकल नहीं। मतलब है कि गिनने से पहले रिश्ते पढ़ें।

अंतर ईमानदारी साबित करते हैं?

बचाव हो सकता है कि छोटे अंतर अलग नजरिए दिखाते हैं। कभी उचित अर्थ है। अंतर दोहराने, संपादन या भूल से भी आ सकते हैं। होना भर कारण नहीं चुनता।

आलोचक उलटी गलती कर सकता है: हर छूटी बात को टकराव मानना। एक लेखक एक आगंतुक और दूसरा दो बता सकता है। पहला दूसरे को नकारता नहीं, तो विरोध जरूरी नहीं।

विवरण मिलाना कठिन हो, तो उन्हें जोड़ने वाली अतिरिक्त कहानी को भी आधार चाहिए। सोच सकना, प्रमाण में मिलना नहीं है।

मजबूत तर्क को क्या चाहिए?

तारीख, नाम, स्रोतों के रिश्ते और बताई घटनाओं के आधार चाहिए। लोग कुछ मानते थे, उसका विवरण और वह हुआ, उसका प्रमाण अलग रहें।

सुसमाचार गंभीर पढ़ाई के योग्य हैं। काम करने से पहले चार स्वतंत्र आधुनिक गवाह-बयान गिनना निष्कर्ष को आगे पहुँचा देता है। ईश्वर का शब्द मानने को कहने से पहले मैं स्रोतों की जाँच चाहता हूँ।

अध्याय 18पुनरुत्थान के प्रमाण वास्तव में क्या दिखाते हैं?

कुरिन्थियों को पौलुस का पहला पत्र मसीह के उठने पर बहुत वजन रखता है। आस्था का महत्व उससे जुड़ता है। कमजोर रूप खारिज करने की जगह सबसे मजबूत तर्क जाँचें।[48]

तर्क शुरुआती दर्शन-विवरण, खाली कब्र और यीशु के लौटने पर आश्वस्त समूह को जोड़ता है। कैथोलिक शिक्षा इन निशानियों से अपना पक्ष रखती है। आगे का दावा है कि ईश्वर ने यीशु को बदले शारीरिक जीवन में उठाया।[49]

पौलुस की गवाह-सूची क्या देती है?

पौलुस मसीह को नाम वाले लोगों और समूहों के सामने प्रकट बताता है। एक समूह एक साथ पाँच सौ से अधिक का था। यह दावे का लिखित विवरण है। हमारे पढ़ने को बचे पाँच सौ अलग बयान नहीं।[48]

पौलुस को समूह का कैसे पता? हर व्यक्ति ने क्या अनुभव किया? उसकी सूची दोहराए बिना किस रास्ते से दावे जाँच सकते हैं? अंश हर व्यक्ति का साक्षात्कार नहीं देता।

इससे पौलुस का झूठ सिद्ध नहीं। पता चलता है कि हमारे पास क्या है। ईमानदार विवरण, असली अनुभव और उसका कारण अलग बातें रहते हैं।

खाली कब्र से साबित होगा?

सही समय पर कब्र खाली दिखा भी सकें, तो कारण समझाना होगा। कैथोलिक धर्मशिक्षा भी कहती है कि गायब शरीर अकेले पुनरुत्थान का सीधा प्रमाण नहीं।[49]

यीशु को देखने के विवरण बड़े तर्क में जरूरी हैं। यूहन्ना 20 में मुलाकातें हैं, थोमा का संदेह भी। पूछें कि विवरण कैसे लिखा गया और दूसरों से रिश्ता क्या है।[50]

दोनों तरह के विवरण साथ में अधिक वजन रख सकते हैं। जोड़ने से हर एक की जाँच की जरूरत नहीं हटती। उठने की क्रिया का सीधा रिकॉर्ड भी नहीं मिलता।

आलोचक को पूरी दूसरी कहानी देनी होगी?

नहीं। उसे गढ़नी नहीं चाहिए। धोखा, दर्शन, गलत पहचान और कहानी में बदलाव ऐसे संभव विचार हैं जिनकी चर्चा होती है। एक का नाम देने से होना नहीं दिखता।

हर घटना का रास्ता न खोज पाऊँ, तब भी पूछ सकता हूँ कि प्रमाण ईश्वरीय कारण पहचानता है? प्रतिद्वंद्वी में भी कमियाँ हैं, केवल इसलिए पसंद का विवरण नहीं जीतता।

ईसाई अपना मत सबसे अच्छा मेल कह सकता है। बताए कि विवरण भरोसेमंद क्यों, कौन-से सामान्य कारण हटते हैं और ईश्वर का काम बेहतर उत्तर क्यों है। तुलना केवल विकल्प गिनाकर नाम से खारिज करने से अधिक करे।

विश्वास के लिए मरने की तैयारी उसे सच बनाती है?

मौत और परिस्थिति अच्छी तरह ज्ञात हों, तो ईमानदारी दिख सकती है। लोग ईमानदारी से गलत भी मानते हैं। हर व्यक्ति की मौत और सीधे ज्ञान का प्रमाण भी चाहिए।

अध्याय हर प्रेरित की मौत का सत्यापित रिकॉर्ड नहीं देता। बहस में घूमती सूची उसकी जगह नहीं। न मानें कि हर व्यक्ति का चुनाव या तथ्य जाँचने का मौका समान था।

मैं विश्वास क्यों रोकता हूँ?

मुलाकात के विवरण से ईश्वर द्वारा व्यक्ति को उठाने तक बड़ा कदम है। स्रोतों को भार उठाना होगा। रिश्ते, बारीकियाँ और भरोसे के आधार जाँच का हिस्सा हैं।

मैं यीशु की मौत के बाद हर घटना जानने का दावा नहीं करता। यहाँ जाँचा पक्ष माँगी निश्चितता से ईश्वरीय पुनरुत्थान साबित करने को कमजोर पाता हूँ। शुरुआती समूह का विश्वास दिखाना और विश्वास सच दिखाना अलग आकार के नतीजे हैं।

आगे के प्रमाण से फैसला चुनौती पा सकता है। धर्म में केंद्रीय स्थान सावधानी से जाँचने की वजह है, सवाल से बचाने की नहीं।

अध्याय 19कुँवारी गर्भधारण और जन्म-कथाओं का आधार क्या है?

मत्ती और लूका कहते हैं कि किसी मानव पिता के बिना यीशु का गर्भधारण हुआ। ये इस विश्वास के स्रोत हैं। गर्भधारण का तरीका साबित करने वाले स्वतंत्र चिकित्सकीय रिकॉर्ड नहीं हैं।[51][47]

आलोचक को मरियम के निजी जीवन की कहानी नहीं गढ़नी चाहिए। जन्म के विवरण शादी में उनकी ठीक उम्र नहीं देते। बिना आधार आरोप सच दिखाने में मदद नहीं करता। सवाल है कि ईश्वरीय विवरण के लिए पर्याप्त प्रमाण हैं या नहीं।

सामान्य जीव-विज्ञान हर संभव चमत्कार नकार देता है?

नहीं। ईश्वर ने काम किया, यह सामान्य प्रक्रिया के अपवाद का दावा है। सामान्य प्रक्रिया समझाने से घटना का असामान्य होना दिखता है। अपने आप हर ईश्वरीय काम असंभव नहीं होता।

यहाँ अपवाद क्यों मानें, बचाव करने वाला फिर भी दिखाए। तथ्य तक पहुँच किसकी थी? लेखकों तक कैसे आया? दूसरी धार्मिक जन्म-कथा से इसे अलग क्या करता है?

आस्था में कहानी का उद्देश्य गायब अवलोकन नहीं देता। न आरोप गढ़ें, न चमत्कार मान लें।

निष्कलंक गर्भधारण का अर्थ क्या है?

कैथोलिक शिक्षा में इसका अर्थ है कि मरियम अपने अस्तित्व की शुरुआत से आदिपाप से मुक्त थीं। यह यीशु के मानव पिता बिना गर्भधारण के समान दावा नहीं।[52]

नाम का अर्थ ठीक समझने पर असली सवाल पूछ सकते हैं। मरियम को आदिपाप से वह सुरक्षा मिल सकती थी, तो सबको क्यों नहीं मिली? उन्हें वह मिली ही थी, इसका आधार क्या है?

सवाल वास्तव में सिखाए मत के हैं। दो अलग विश्वास मिलाने पर निर्भर नहीं।

जन्म-कथाएँ एक समय में बैठती हैं?

मत्ती जन्म हेरोदेस के समय रखता है। लूका लोगों के पंजीकरण को क्विरिनियुस से जोड़ता है। USCCB की लूका टिप्पणियाँ तारीख की समस्या बताती हैं। हेरोदेस की मौत 4 ईसा पूर्व और संबंधित जनगणना 6-7 ईस्वी में रखती हैं।[51][53]

जनगणना लोगों की आधिकारिक गिनती या पंजीकरण है। मूल स्रोतों के BCE का अर्थ सामान्य युग से पहले और CE का अर्थ सामान्य युग है। यहाँ उन्हीं संख्या वाले ईसा पूर्व और ईस्वी शब्द हैं। 1 ईसा पूर्व और 1 ईस्वी के बीच शून्य वर्ष नहीं। तारीखें इतिहास के काम से हैं, क्रिसमस की चुनी तारीख से नहीं।

बचाव में पाठ का अलग अर्थ, क्विरिनियुस की पहले की कोई भूमिका या दूसरा पंजीकरण बताया जाता है। जिस प्रस्ताव से मेल बैठाया जा रहा है, उसका स्वतंत्र प्रमाण क्या है? कोई घटना हो सकती थी, इतना कहना और उसका रिकॉर्ड दिखाना अलग बातें हैं।

मुश्किल दोनों कथाओं के मेल की है। इससे किसी भी सुसमाचार की हर पंक्ति झूठी नहीं होती।

यशायाह में जन्म की साफ भविष्यवाणी है?

यशायाह 7 आहाज की परिस्थिति में निशानी देता है। मत्ती उसका अंश यीशु पर लागू करता है। USCCB की टिप्पणियाँ पहला संदर्भ और युवती या कुँवारी अनूदित शब्द बताती हैं।[54][55]

ईसाई बाद में पूरा हुआ व्यापक अर्थ मान सकता है। उसे वजहें चाहिए। यीशु से पहले पाठक ठीक यही घटना कैसे निकालता? दूसरे अर्थ का नियम क्या है?

पहले पाठ में वह अर्थ केवल बाद की कहानी जानने पर दिखे, तो स्वतंत्र भविष्यवाणी का दावा कमजोर होता है। दोनों के बीच धार्मिक रिश्ता देखने वाले को उसमें अर्थ फिर भी मिल सकता है।

क्या दिखाना बाकी है?

गर्भधारण का दावा, जन्म-कथाओं की विश्वसनीयता और भविष्यवाणी से उनका रिश्ता, तीनों का आधार चाहिए। वे गोल घूमकर एक-दूसरे का प्रमाण नहीं बन सकते।

उस गोलाई से बनी निश्चितता नकारता हूँ। पाठक कथाएँ पवित्र मान सकता है। ईश्वर के काम का सार्वजनिक प्रमाण बनाएँ, तो स्रोत और तारीख की मुश्किलों से सवाल होंगे।

अध्याय 20भविष्यवाणी कब सफल अनुमान गिनी जाएगी?

मानिए मैं कहूँ कि शहर खतरा झेलेगा और फिर उबरेगा। कई घटनाएँ फिट होंगी। शहर, घटना और समय पहले बता दूँ, तो दावा कठिन होता है। पूरी भविष्यवाणी का तर्क ऐसी सावधानी माँगता है।

जानना होगा कि शब्दों का पहले क्या अर्थ था, कब लिखे गए, तारीख का भरोसा कितना और बाद की घटना कैसे दिखाई। चौंकाता मेल जाँच की शुरुआत है।

भविष्यवाणी घटना से पहले तय थी?

पाठ की तारीख विवाद में हो, तो पहले से मान नहीं सकते। कौन-सी पांडुलिपि, उद्धरण या दूसरा प्रमाण शब्दों को पहले रखता है? उस तारीख पर कितना पाठ समर्थित है?

आलोचक घटना के बाद लिखना कहे, तो वजहें वह भी दे। पसंद की व्याख्या को मदद होगी, इसलिए कोई पक्ष तारीख तय नहीं कर सकता।

बाद का लेखक पहले का पाठ जानता था?

हाँ, तो बताया मेल कहानी सुनाने का तरीका दिखा सकता है। असली घटना को धर्मग्रंथ से समझना भी हो सकता है। चुनने को स्वतंत्र आधार चाहिए।

पिछले अध्याय की यशायाह मिसाल दिखाती है कि पहला संदर्भ और बाद का ईसाई इस्तेमाल अलग क्यों हों। व्यापक ढाँचा या प्रतीकात्मक पूर्ति, पहले कोई भी निकाल सकने वाले सटीक अनुमान से अलग दावा है।[55][51]

पूछें कि ठीक किस गुण से भविष्यवाणी विफल मानी जाती। हर नतीजा बाद में बैठ सके, तो दिखती सफलता कम बताती है।

एक पीढ़ी में आने के वादे का क्या?

मरकुस 13 बड़े उपदेश में ब्रह्मांडीय घटनाएँ, मनुष्य के पुत्र का आना और "यह पीढ़ी" की भाषा रखता है। उसी अंश में पुत्र दिन और घड़ी न जानता भी बताया है।[10]

कौन हिस्सा यरूशलेम के पतन का, कौन भविष्य की वापसी का और पीढ़ी का अर्थ क्या, इस पर ईसाई अलग हैं। आलोचक हर वाक्य का एक निर्विवाद समय मानने के बजाय वे मत जाँचे।

मुश्किल वास्तविक है। घटनाएँ अलग करने का पाठ संबंधी नियम क्या है? कौन उम्मीद पूरी दिखी जानने से पहले वह नियम दिखाई देता है? अर्थ गलत क्या दिखाएगा?

ईश्वर का समय देरी का उत्तर है?

दूसरा पतरस 3 आने के वादे पर संदेह को ईश्वरीय और इंसानी समय की तुलना तथा धैर्य से उत्तर देता है। यह देरी पर धर्म का अपना उत्तर है।[56]

इससे समझ सकता है कि आस्तिक प्रतीक्षा क्यों करे। हर लंबी देरी वादे से संगत हो, तो प्रतीक्षा को समय-सीमा से पुष्ट सटीक भविष्यवाणी नहीं बना सकते।

बचाव करने वाला खुली समय-सारणी का दावा दे सकता है। तब प्रमाण का बल ईमानदारी से बताए। खुला समय और सटीक पूरी समय-सारणी अलग तर्क हैं।

क्या कोई भविष्यवाणी धर्म का आधार हो सकती है?

स्पष्ट, पक्की तारीख वाली और स्वतंत्र पुष्टि की जानकारी बहुत मायने रख सकती है। फिर भी सामान्य ज्ञान के स्रोत, संयोग, सफलताओं का चुनाव और ईश्वरीय लेखक तक आगे का निष्कर्ष पूछेंगे।

परिभाषा से हर भविष्यवाणी नहीं नकारता। नतीजा चुनने से पहले सफलता की शर्त माँगता हूँ। घटना के बाद ही सटीक बनने वाली भविष्यवाणी ने साफ पहले अनुमान का अधिकार नहीं पाया।

अध्याय 21क्षमा के लिए यीशु की मौत क्यों चाहिए?

ईश्वर क्षमा कर सकता है, तो किसी को मरना क्यों पड़े? कर्ज पूरा चुकाना जरूरी है, तो माफ किस अर्थ में हुआ? सवाल प्रायश्चित के विचार तक जाते हैं: यीशु का जीवन और मृत्यु ईश्वर व मानवता का रिश्ता कैसे सुधारते बताए जाते हैं।

इब्रानियों 9 बलिदान और रक्त की भाषा लेता है। मत्ती 6 क्षमा की प्रार्थना सिखाता है और दूसरों को क्षमा करने से जोड़ता है। ईसाई इन और दूसरे पाठों से मुक्ति के अलग विवरण बनाते हैं।[57][58]

क्या सभी ईसाई विवरण समान हैं?

नहीं। कुछ मसीह के दंड सहने पर जोर देते हैं। दूसरे मृत्यु पर जीत, उपचार, मेल-मिलाप या प्रेमपूर्ण मिसाल पर। कैथोलिक शिक्षा प्रेम में स्वैच्छिक आत्म-समर्पण बताती है। एक मॉडल के विरुद्ध तर्क हर दूसरे का उत्तर नहीं।[59]

पहला उपयोगी सवाल है कि मौत क्या हासिल करती है और नतीजे को यही साधन क्यों चाहिए। धार्मिक शब्दों की सूची अभी संबंध की व्याख्या नहीं।

निर्दोष को दोष सौंप सकते हैं?

कोई दूसरे का आर्थिक कर्ज चुका सकता है। उससे गलत काम करने वाला नहीं बन जाता। नैतिक जिम्मेदारी कर्ता के काम, ज्ञान और चुनाव की है।

मानिए न्यायाधीश निर्दोष स्वयंसेवक को दंड देकर दोषी वयस्क छोड़ देता है। स्वयंसेवक की सहमति उदारता दिखा सकती है। फैसला न्यायपूर्ण कैसे बनेगा? अपराधी के विरुद्ध पीड़ित की माँग का क्या हुआ?

बचाव हो सकता है कि ईश्वरीय मामला मिसाल से अलग है। फिर नैतिक काम करने वाला फर्क समझाएँ। मसीह अद्वितीय है दोहराने से नहीं पता चलता कि दोष या दंड बदलना उचित क्यों।

क्या यह बस पिता का किसी दूसरे बच्चे को चोट देना है?

वह वर्णन त्रिएकता और स्वैच्छिक समर्पण छोड़ देता है। ईसाई कह सकता है कि अजनबी पर थोपने के बजाय ईश्वर पुत्र के द्वारा खुद कीमत सहता है।[59]

इससे कच्चे आरोप का एक हिस्सा उत्तर पाता है। बचता सवाल है कि सर्वशक्तिमान ईश्वर को पीड़ा और मृत्यु की कीमत जरूरी क्यों थी। संबंध सुधरना इस व्यवस्था से क्यों बँधा है? दूसरे तरह की क्षमा और सुधार को क्या रोकता है?

पूर्ण न्याय यही माँगता है, तो न्याय का ऐसा विवरण चाहिए जो माँग दिखाए। पूर्ण शब्द गायब तर्क नहीं देता।

पुनरुत्थान बलिदान मिटा देगा?

अपने आप नहीं। बाद में ठीक होने पर भी वास्तविक पीड़ा सह सकते हैं। यीशु ने केवल सप्ताहांत छोड़ा, कहना शिक्षा में बताई पीड़ा को हल्का करता है।

मजबूत सवाल जरूरत और असर का है। मौत ने ऐसा क्या बदला जो दूसरे तरीके से न बदल सकता था? बाद का पुनरुत्थान पहले इंतजाम का न्याय दिखाता है या केवल बचाव की कहानी पूरी करता है?

क्षमा से भरपाई की जरूरत मिटती है?

मिटनी नहीं चाहिए। अपराधी पश्चात्ताप करे, तब भी पीड़ित को सुरक्षा, पहचान और भरपाई चाहिए हो सकती है। आध्यात्मिक घोषणा पीड़ित की ओर से व्यवहारिक कर्तव्य तय नहीं करती।

निर्दोष की पीड़ा को जिम्मेदारी समझाने की जगह रखने वाली नैतिक व्यवस्था नकारता हूँ। दूसरे प्रायश्चित मॉडल वह खास समस्या टाल सकते हैं। फिर भी उन्हें अलौकिक विवरण की सच्चाई, जरूरत और पीड़ितों की सुरक्षा की वजहें चाहिए।

अध्याय 22पसली की कहानी स्त्रियों पर अधिकार उचित करती है?

उत्पत्ति 2 पुरुष से बनी और साथी बनकर उसके पास लाई स्त्री बताता है। पहली पुस्तक के कुरआनी अंश के उलट, परिचित अंग्रेज़ी अनुवादों में बाइबल की यह कथा स्पष्ट पसली की बात रखती है।[60]

पहला सवाल इस्तेमाल का है। भौतिक उत्पत्ति का दावा, साझा मानवता की तस्वीर या पुरुष को अधिकार देने का नियम? दावे अलग तर्क माँगते हैं।

बाद में बने होने से मूल्य कम होगा?

नहीं। कहानी का रचना-क्रम व्यक्ति का मूल्य नहीं तय करता। चर्चा में कथा मान लेने से भी दूसरे वयस्क पर शासन का अधिकार नहीं दिखता।

शाब्दिक चमत्कारी उत्पत्ति दावा हो, तो घटना का प्रमाण पूछें। प्रतीकात्मक हो, तो प्रतीक क्या सिखाता है और नैतिक अर्थ क्यों मानें, पूछें। पढ़ने का तरीका बदले, तो खुलकर बताएँ।

कहानी से हर आज के पुरुष में पसली कम होना भी नहीं निकलता। एक पूर्वज का कथित शारीरिक बदलाव हर वंशज को विरासत में मिलना जरूरी नहीं। परिचित मजाक अपने निशाने के विश्वास तक नहीं पहुँचता।

नया नियम भूमिकाओं पर क्या कहता है?

इफिसियों 5 का संबंधित हिस्सा परस्पर अधीनता से शुरू है। पति को मुखिया बताकर पत्नी से गंभीर प्रेम की माँग भी है। दोनों हिस्से शामिल हों।[61]

प्रेम का कर्तव्य होने से अधिकार बराबर हो जाते हैं? अगर पति की बात हमेशा आखिरी मानी जाए, तो पत्नी को वैसा ही अधिकार कहाँ मिला? उसके काम, पढ़ाई या सुरक्षा पर दोनों असहमत हों, तो फैसला कौन करे?

ऊपर वाले का दयालु व्यवहार बराबर दर्जा नहीं है। लिंग से सत्ता देने वाले नियम को ऊपर वाले को प्रेमपूर्ण कहने से अधिक वजह चाहिए।

स्त्री होने से पढ़ाना क्यों रोका जाए?

पहला तीमुथियुस 2 स्त्री के सिखाने या अधिकार चलाने पर रोक रखता है और आदम-हव्वा का कारण देता है। ईसाई विवाद करते हैं कि स्थानीय परिस्थिति है या स्थायी नियम।[62]

नियम किसी स्थानीय समस्या के लिए था, तो उस सीमा का प्रमाण क्या है? वह हर चर्च पर हमेशा लागू है, तो सक्षम स्त्री का लिंग उसके ज्ञान, निर्णय और आचरण से ऊपर क्यों रखा जाए?

गलातियों 3:28 दूसरे भेदों के साथ पुरुष और स्त्री के पार मसीह में एकता कहता है। बचाव में आध्यात्मिक बराबरी और अलग भूमिका का फर्क हो सकता है। फिर भी शक्ति असमान बाँटने की वजह समझाएँ।[63]

स्त्री अपनी मर्जी से पारंपरिक भूमिका चुने, तो?

उस चुनाव का सम्मान होना चाहिए। स्त्री किसी खास पारिवारिक इंतजाम को पसंद कर सकती है या उसके धार्मिक अर्थ का बचाव कर सकती है। इससे मना करने वाली स्त्री पर वही इंतजाम थोपने का अधिकार नहीं मिलता।

क्या वह धमकी, बहिष्कार या मूल स्वतंत्रता खोने के डर के बिना मना कर सकती है? असुरक्षित रिश्ता छोड़ सकती है? उसका इनकार उचित है या नहीं, यह कौन तय करे? इन व्यावहारिक सवालों के जवाब बताते हैं कि अलग भूमिकाओं की सुहावनी भाषा के पीछे कैसा इंतजाम है।

लिंग के कारण पुरुष का स्त्री पर स्थायी शासन-अधिकार नकारता हूँ। वयस्क ऐसी वजहों के योग्य हैं जो उनकी क्षमता, चुनाव और हित गंभीरता से लें। रचना-कथा साहित्य या विश्वास के रूप में चर्चा योग्य है। बिना तर्क के स्वामित्व या अपने आप अधिकार का भार नहीं उठा सकती।

अध्याय 23दासता को दयालु स्वामित्व बताकर बचा सकते हैं?

इंसान का मालिक होना उसके जीवन को दूसरे की सत्ता में रखता है। अच्छा भोजन, नरम व्यवहार या दयालु मालिक हानि घटा सकते हैं। स्वामित्व उचित क्यों, नहीं समझाते।

लैव्यव्यवस्था 25:39-46 गरीब इस्राएलियों और विदेशी दासों के नियम अलग करती है। विदेशियों को विरासत की संपत्ति बनाकर रखने और आगे देने की अनुमति है। हर इंतजाम सामान्य नौकरी बताना पाठ गलत कहना है।[64]

ऐतिहासिक संदर्भ नैतिक फैसला कर देता है?

समझा सकता है कि व्यवस्था क्यों थी और नियम कैसे काम करते थे। दूसरे तरीकों के मुकाबले कुछ नियम कम हानि देते थे, दिख सकता है। सुधार और अंतिम नैतिक स्वीकृति फिर भी अलग हैं।

आज इंसानों की विरासत वाली संपत्ति की व्यवस्था को मालिक के कर्तव्य होने से बचाएँगे? नहीं, तो धार्मिक मामले में स्वामित्व सही बनाने वाला अतिरिक्त तथ्य क्या? प्रथा का पुराना होना तथ्य नहीं देता।

संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा दासता नकारती है। मैं इसे स्पष्ट नैतिक मानक लेता हूँ, वैज्ञानिक खोज नहीं। मेरी वजहें व्यक्ति की स्वतंत्रता, हित और बराबर दर्जे की हैं।[65]

ईसाई पत्र दासता सीधे खत्म करते हैं?

इफिसियों 6 दास और मालिक को निर्देश देता है। मालिक पर भी कर्तव्य हैं। यह संस्था समाप्त करने वाला स्पष्ट सार्वभौम आदेश नहीं।[66]

फिलेमोन में उनेसिमुस को भाई मानने की अपील है। पाठक उसमें नैतिक दबाव देख सकते हैं। पत्र हर जगह के हर दास के लिए सामान्य मुक्ति-कानून नहीं देता।[67]

बचाव हो सकता है कि मसीह में बराबरी अंत में दासता कमजोर करती है। गलातियों 3 तर्क की भाषा देता है। फिर पूछें कि स्वामित्व से आजादी साफ कहने के बजाय मजबूत सिद्धांत जारी अनुमति के विरुद्ध निकालना क्यों पड़े।[63]

अचानक समाप्त करने से हानि हो सकती थी?

बचाव में भोजन, घर या समाज के टूटने की चिंता हो सकती है। व्यवहारिक चिंताएँ हैं। शक्तिशाली कानूनदाता स्पष्ट रोक के साथ लोगों को बचाने वाला बदलाव क्यों नहीं जोड़ सकता था?

कठिन बदलाव स्थायी स्वामित्व अच्छा नहीं बनाता। सावधानी से बदलाव बनाने की वजह देता है। दास की जरूरत रास्ता चलाए, मालिक की सत्ता को अनंत छूट न दे।

दासता-विरोधी ईसाई आलोचना का उत्तर है?

ईसाई आस्था और नैतिक सोच से दासता का विरोध कर सकता है। उसे बाइबल के हर पुराने इस्तेमाल का बचाव नहीं करना। उसका विरोध जरूरी है।

फिर सवाल पद्धति का है: स्वीकृत अनुमति या अर्थ को नकारने का सिद्धांत क्या था? दूसरे हानिकारक नियम को भी सुधार सकता है? नैतिक समझ पाठ को केवल मानने के बजाय परखने में मदद करती है?

आस्तिक के अच्छे काम बाइबल का हर नियम अच्छा नहीं बनाते। हानिकारक काम हर ईसाई को क्रूर नहीं बनाते। नियम खुद जाँचा जाए।

स्वामित्व में सहमति बच सकती है?

पूछें कि व्यक्ति जा, काम मना कर, परिवार बचा और मालिक को चुनौती दे सकता है? निर्भरता में बोली हाँ जीवित रहने का चुनाव हो सकती है। बंदी दशा की हामी अकेले स्वतंत्र व्यवस्था नहीं बनाती।

मैं इंसानी स्वामित्व नकारता हूँ। दयालु होने के निर्देश व्यक्ति का व्यवस्था चुनौती देने का स्थायी अधिकार नहीं बदलते। ईश्वरीय नाम दावा अधिक शक्तिशाली बनाता है, स्वतंत्रता का नुकसान कम गंभीर नहीं।

अध्याय 24ईश्वर का आदेश बच्चों को मारना उचित कर सकता है?

पहला शमूएल 15:1-3 में शमूएल शाऊल को अमालेक का विनाश करने का आदेश देता है, बच्चों सहित। पाठ इसे ईश्वर का आदेश बताता है। यही दावा नैतिक समस्या बनाता है। घटना ठीक बताई तरह हुई, यह पहले साबित किए बिना भी आदेश की उचितता पूछ सकते हैं।[68]

पुराने युद्ध का विवरण बताता है कि क्या हुआ हो सकता है। नैतिक बचाव पूछता है कि आदेश सही था या नहीं। दोनों को अलग उत्तर चाहिए।

समूह की गलती बच्चों को दोषी बनाती है?

बच्चा अपने लोगों या पूर्वजों के हर काम का जिम्मेदार नहीं। समूह खतरनाक था, यह बचाव हो, तो उसके आचरण को चुन न सकने वालों पर निशाना उचित क्यों?

शक्तिशाली ईश्वर बच्चों को बचाकर दूसरों की रक्षा कर सकता था? नुकसान करने वाले वयस्क रोके जा सकते थे? ईश्वर अकेला जरूरी नतीजा जानता है, तो यहाँ जरूरत का प्रमाण क्या?

दुश्मन समूह का हिस्सा कहने से बच्चे का अपना जीवन और हित नहीं मिटते। नैतिक तर्क उनका हिसाब रखे।

जीवन देने वाले को उसे खत्म करने का अधिकार है?

बनाने की शक्ति और मिटाने की नैतिक अनुमति अलग दावे हैं। माता-पिता बच्चे को अस्तित्व देने में मदद करते हैं। इससे उसके जीवन पर मनमाना असीम अधिकार नहीं मिलता।

बचाव हो सकता है कि ईश्वर का जीवन से रिश्ता बिल्कुल अलग है। तब कौन-सा फर्क अधिकार देता है और यही तरीका क्यों स्वीकार करता है, समझाएँ। रचयिता जीवन समाप्त कर सकता है, उससे खास हत्या का अच्छा होना अपने आप नहीं दिखता।

क्या युद्ध की भाषा बढ़ा-चढ़ाकर कही गई?

बचाव में विनाश की भाषा को मौतों की सटीक गिनती के बजाय पुराने लेखकों की जीत बताने की शैली माना जा सकता है। इतिहास का दावा बदलता है और जाँच चाहिए।

फिर भी बच्चों सहित पूरे विनाश को पवित्र आदेश बनाकर पेश करने का सवाल रहता है। तस्वीर नैतिक रूप से उचित क्यों? पाठ अतिशयोक्ति करता है, तो सीमा कैसे दिखती है? कठिन अंश आसान करने के बाहर भी संभव अर्थ को प्रमाण चाहिए।

बंदी स्त्रियों का क्या?

व्यवस्थाविवरण 21:10-14 बंदी स्त्री को पत्नी बनाने के नियम देता है। प्रतीक्षा और नापसंद होने पर मुक्त करने का नियम शामिल है। सीमाएँ ईमानदार विवरण में हों।[69]

उससे बंदी की स्वतंत्र सहमति तय नहीं होती। क्या शुरुआत में विवाह मना कर सकती थी? विजेता की सत्ता के नीचे दूसरा जीवन चुन सकती थी? उसके फैसले से अलग हित कौन बचाता है?

नैतिक मुद्दा नियंत्रण के नीचे सहमति का है। बंदी बनाने वाले की सीमा हानि घटाकर भी सवाल अनसुलझा छोड़ सकती है।

क्या ईसाइयों को अब आदेश निभाने हैं?

कई लोग पुराने इस्राएल के नियम और युद्ध को चर्च के आज के कर्तव्य से अलग करते हैं। हर ईसाई नकल का पक्ष लेता है, यह दिखावा न करें। सीमित सवाल है कि आज गलत माना आदेश अपने मूल समय में पूर्ण नैतिक क्यों कहलाए।

कभी लोगों ने ईश्वर गलत समझा, तो पूछें कि संभावना पाठ के अधिकार पर क्या असर करती है। आदेश सही था, तो नैतिक वजह माँगें।

कोई ईश्वर से जोड़ दे, केवल इसलिए निर्दोष बच्चों की हत्या की अनुमति वाला नियम नकारता हूँ। न लौटने वाली हानि की सफाई से पहले धार्मिक अधिकार दिखाया और नैतिक रूप से जाँचा जाए। पवित्र दावा पीड़ितों को अधिक गहरी जाँच माँगने की वजह देता है।

अध्याय 25निजी वयस्क रिश्ते को चर्च की अनुमति क्यों चाहिए?

वयस्क स्वतंत्र रिश्ता चुनें, तो रोक की व्याख्या चाहिए। किसे हानि? बल, धोखा या टूटी प्रतिबद्धता है? गलत होने का दावा असली स्थिति से है या केवल अधिकारी की नापसंदगी से?

सहमति हर नैतिक सवाल हल नहीं करती। दूसरे को हानि वाले काम पर लोग सहमत हो सकते हैं। पर गंभीर रोक केवल जोड़े का पारंपरिक ढाँचे से फर्क बताने से अधिक करे।

दिए अंश क्या कहते हैं?

रोमियों 1 मूर्तिपूजा और गलत काम के बड़े विवरण में समलैंगिक आचरण रखता है। लैव्यव्यवस्था 20:13 प्राचीन पुरुष समलैंगिक संबंध की रोक और शारीरिक दंड देता है। अंशों के ईसाई अर्थ और इस्तेमाल अलग हैं।[70][71]

कुछ बचाव हर समलैंगिक संबंध पर रोक लगाते हैं। दूसरे बताए आचरण और परिस्थिति पर तर्क देते हैं। पूछें कि हर अर्थ शब्द, संदर्भ और प्रस्तावित दायरा कैसे समझाता है।

सबके लिए रोक हो, तो पूछें कि वफादार, सहमति वाला वयस्क रिश्ता गलत कैसे है। कोई इस्तेमाल नकारे, तो उसका असली पक्ष मानें। आलोचक उसके नकारे नियम को उसका नहीं बता सकता।

अप्राकृतिक कहने से हानि समझ आती है?

प्राकृतिक का अर्थ आम, जैविक रूप से पैदा या नैतिक रूप से उचित हो सकता है। अर्थ अदल-बदल नहीं सकते। क्या होता है, यह तथ्य अकेले क्या होना चाहिए तय नहीं करता।

बीमारी प्राकृतिक होकर भी रोकने योग्य हो सकती है। इंसान की बनाई मदद उपयोगी हो सकती है। नाम अकेले नैतिक तर्क नहीं।

मानव उद्देश्य का विवरण आए, तो पूछें कि उद्देश्य सही क्यों और आधार क्या है। वह दूसरे का जीवन क्यों चलाए? क्या शामिल लोगों को अपने हित वाला व्यक्ति मानता है?

हर पुरानी सजा आज की ईसाई नीति होनी चाहिए?

नहीं। ईसाई पुराने इस्राएल के नागरिक नियम और चर्च की मौजूदा भूमिका अलग कर सकते हैं। किसी पर सजा का समर्थक होने का आरोप लगाने से पहले फर्क कहें।

मूल नैतिक नियम का सवाल फिर भी है। तब शारीरिक सजा सही थी, तो किससे? गलत थी, तो पाठ के पवित्र अधिकार का भूल से रिश्ता क्या है? समय की दूरी दोनों का उत्तर एक साथ नहीं।

चर्च स्वैच्छिक मानक बना सकता है?

वयस्क कठिन निजी प्रतिबद्धता चुन सकते हैं। आजादी मायने रखती है। अगले सवाल न चुनने, छोड़ने या अपनी सुरक्षा व परिवार के रिश्ते सहमत होने पर निर्भर पाने वालों के हैं।

क्या बिना धमकी असहमति रख सकते हैं? मदद पा सकते हैं? असहमत होते हुए समुदाय बुनियादी गरिमा बचाता है? बल या असमान अधिकारों से थोपने पर धार्मिक नियम सार्वजनिक नैतिक मुद्दा बनता है।

असहमति आस्तिकों का तिरस्कार उचित करती है?

नहीं। आस्तिक मेरे नकारे नियम का बचाव करते हुए भी दूसरों की परवाह कर सकता है। मैं नियम और उसकी अनुमति वाली हानि पर बात करूँ, पूरी आबादी का एक चरित्र न गढ़ूँ।

मेरा फैसला साफ है। प्रतिबंध उद्धृत करने से समलैंगिक रिश्ता गलत नहीं दिखता। बचाव सहमति, प्रतिबद्धता, हानि और बराबर दर्जे का उत्तर दे। ईश्वरीय अनुमति विवादित दावे का हिस्सा है। उसे विवाद सुलझाने वाला पहले से नहीं मान सकते।

अध्याय 26क्या संदेह चरित्र की कमी है?

कोई चर्च में कठिन सवाल पूछे और उसे अधिक आस्था रखने को कहा जाए। उद्देश्य दिलासा हो सकता है। जवाब मिलने से पहले जाँच बंद भी हो सकती है।

अनिश्चितता, सावधान फैसला, उदासीनता और जानबूझकर बेईमानी अलग करें। एक दशा नहीं हैं। ईमानदारी से सोचने की कोशिश के कारण विश्वास न हो सकता है।

बाइबल प्रमाण माँगना रोकती है?

स्रोत एक से अधिक बात पर जोर देते हैं। इब्रानियों 11 आस्था और न देखी चीजों पर बोलता है। यूहन्ना 20 थोमा को प्रमाण माँगता दिखाकर लिखी निशानियों का उद्देश्य देता है। पहला थिस्सलुनीकियों दावे परखने को कहता है।[72][73][3]

इस तरह ईसाई अपनी परंपरा में खोज का बचाव कर सकता है। पूछें कि अनुमति कहाँ तक है। जाँच असहमति तक पहुँच सकती है या केवल पहले स्वीकृत निष्कर्ष मंजूर है?

विश्वास बचाने वाला उत्तर ही अनुमत हो, तो जाँच की मंजिल तय है। सवाल है कि वह गलती सुधार कैसे सकती है।

आस्था सामान्य भरोसे जैसी है?

आम भरोसा उचित हो सकता है। दूसरों और खुद न जाँचे ज्ञान पर निर्भर हैं। अच्छा भरोसा जाँच, पुराने काम का रिकॉर्ड और गलती सुधारने के रास्ते लेता है।

तुलना हर धार्मिक भरोसा समान उचित नहीं बनाती। पूछें कि इस दावे की जाँच क्या है। स्रोत पर सवाल हो सकते हैं? स्वतंत्र प्रमाण है? भरोसा क्या घटाएगा?

नतीजा लेने से पहले हर वैज्ञानिक यंत्र खुद बनाना जरूरी नहीं। संबंधित पद्धति और रिपोर्ट देने वालों पर भरोसे की वजह चाहिए। भरोसा माँगता चर्च अपने आधार उतने ही साफ दे।

नैतिक आरोप तर्क का उत्तर है?

कोई कह सकता है कि नास्तिक नियमों से बचना चाहता है। वह इरादा दिखा भी दें, तो डीएनए की खोज गायब या ऐतिहासिक समस्या ठीक नहीं होती।

आलोचक अहंकारी या अनुचित हो सकता है। आस्तिक डरा या बचाव में हो सकता है। संभावनाएँ व्यक्तियों की हैं। तर्क का फैसला प्रमाण और वजहों से फिर भी होगा।

पूछें कि कौन-सा आधार गलत या कदम असफल है। जवाब केवल सवाल करने वाले के मन का अंदाजा हो, तो सवाल बाकी।

भय से निश्चितता का अभिनय उचित है?

व्यक्ति नरक, पारिवारिक संघर्ष या बहिष्कार के जोखिम से मानने को कह सकता है। दबाव बोले शब्द समझा सकते हैं। शब्द सच या ईमानदारी का विश्वास हैं, नहीं दिखाते।

दूसरे धर्म की धमकी बड़ी हो, तो वह सही हो जाएगा? नहीं, तो डर धार्मिक दावा चुन नहीं सकता।

नास्तिक का कर्तव्य क्या है?

सुनना, स्रोत जाँचना, भूल मानना और आसान तोड़-मरोड़ से बचना। मत नकारना उसके बारे में दावे गढ़ने की छूट नहीं। बिना प्रमाण निश्चितता दोनों तरफ खराब आदत है।

मैं ईमानदार निष्कर्ष की स्वतंत्रता बचाता हूँ, धार्मिक निष्कर्ष की भी। धार्मिक पक्ष असफल कहने की भी। खोज सह सकने वाला विश्वास जवाब से पहले संदेह को चरित्र का अपराध बनाने का मोहताज नहीं होना चाहिए।

अध्याय 27ईश्वर की ओर से बोलने वाले चर्च की जाँच कौन करे?

चर्च सिखा सकता है, देखभाल कर सकता है और लोगों को जोड़ सकता है। वह पैसा, विद्यालय और समूह में व्यक्ति की जगह भी नियंत्रित कर सकता है। अपनी शक्ति का गलत इस्तेमाल करे, तो उसे चुनौती कौन दे?

मत्ती 16 में पतरस, चर्च, चाबियाँ और बाँधने या खोलने का अंश है। उससे कौन-सी शक्ति मिलती है, चर्च असहमत हैं। अर्थ विवाद का हिस्सा है। उद्धरण बाहरी व्यक्ति के लिए विवाद तय नहीं करता।[74]

पवित्र भूमिका उसका धारक सुरक्षित बना देती है?

भूमिका कर्तव्य दे सकती है। हर धारक को ईमानदार या समझदार नहीं बनाती। पूछें कि उसने किया क्या, काम कौन देखता है और शिकायत आने पर क्या होता है।

समूह में जगह खोए बिना नुकसान बता सकते हैं? बच्चा सम्मानित वयस्क के विरुद्ध बोल सकता है? नेता अपनी जाँच रोक सके, तो पीड़ित कैसे सुना जाएगा?

ये सवाल बड़े चर्च और छोटी स्थानीय धार्मिक संस्था, दोनों पर लागू हैं। स्नेहपूर्ण सार्वजनिक छवि सत्ता की जाँच की जगह नहीं लेती। भरोसे का आधार ऐसा हो जो नापसंद तथ्य सामने आने पर भी जाँचा जा सके।

वास्तविक जाँच में क्या मिला?

ऑस्ट्रेलिया में संस्थाओं द्वारा बच्चों के यौन उत्पीड़न पर प्रतिक्रिया की जाँच के लिए रॉयल कमीशन हुआ। रॉयल कमीशन प्रमाण जुटाने की शक्तियों वाली सार्वजनिक जाँच है। अंतिम रिपोर्ट 15 दिसंबर 2017 को सौंपी गई।[75]

धार्मिक संस्थाओं पर रिपोर्ट में उत्पीड़न संभालने की गंभीर विफलताएँ थीं। कैथोलिक नेताओं की विफलताएँ और दूसरी धार्मिक परिस्थितियों की समस्याएँ शामिल थीं। बच्चों की सुरक्षा और शिकायत संभालने के बेहतर तरीके भी माँगे गए।[76]

ये जाँच के निष्कर्ष हैं। हर पादरी की आपराधिक दोषसिद्धि या हर चर्च का समान रिकॉर्ड नहीं। आज हर चर्च सलाह कैसे निभाता है, मैंने नहीं जाँचा।

ये निष्कर्ष इतना आश्वासन नकारने के लिए पर्याप्त हैं कि धार्मिक पद होने से बाहरी जाँच की जरूरत खत्म हो जाती है। बच्चे को ऐसी सुरक्षा चाहिए जो केवल आरोपित संस्था के शब्द पर न टिकी हो।

गलत काम करने वाला ईश्वर को गलत साबित करता है?

नहीं। आस्तिक किसी के बुरे काम और आस्था अलग कर सकता है। उत्पीड़न से हर संभव ईश्वर के न होने तक कूदना प्रमाण से बाहर होगा।

यहाँ चुनौती लोगों का जीवन चलाने के चर्च के अधिकार-दावे को है। नेता असफल हों, तो उन्हें जिम्मेदार कौन ठहराए? उनके ईश्वर की ओर से बोलने के दावे की जाँच करने वाले को क्या ईश्वर का शत्रु समझे बिना सुन सकते हैं?

ईश्वर के नाम पर किया गया दावा ठुकराना कठिन हो सकता है। इसलिए ऐसी शक्ति के इस्तेमाल की और सावधानी से जाँच होनी चाहिए।

क्षमा जरूरी कार्रवाई की जगह ले सकती है?

पीड़ित क्षमा चुन सकता है। चुनाव पीड़ित का है। दूसरों को सुरक्षित रखने, प्रमाण बचाने या लागू कानूनी प्रक्रिया की जरूरत नहीं मिटती।

क्षमा करने का दबाव मदद चाहने वाले को चुप कर सकता है। भरोसा लौटाने से पहले कौन-से कदम उठाए जाते हैं? जाँच कौन करता है? क्या जाँच उन तथ्यों को भी निकाल सकती है जिन्हें चर्च छिपाना चाहता हो?

इन सवालों में यह मान नहीं लिया गया कि हर शिकायत सिद्ध है। माँग ऐसी निष्पक्ष प्रक्रिया की है जो लोगों की रक्षा करे और दावे जाँचे। किसी का पद या भीड़ का फैसला पहले ही दोष तय न कर दे।

सत्ता अपने नीचे लोगों को क्या दे?

साफ वजहें, ईमानदार रिकॉर्ड और भूल सुधारने के रास्ते। व्यक्ति अपनी मूल सुरक्षा जोखिम में डाले बिना फैसले को चुनौती दे सके।

मैं यह नहीं मानता कि सम्मान के कारण चर्च को जाँच से छूट मिलनी चाहिए। वह देखभाल कर सकता है और जीवन में अर्थ दे सकता है। फिर भी दूसरे का जीवन चलाने के अधिकार का आधार और उसकी सीमाएँ बतानी होंगी। किसी पवित्र नाम का बचाव करने के लिए अपनी सुरक्षा छोड़ना किसी का कर्तव्य नहीं है।

अध्याय 28क्रूरता गलत जानने के लिए ईश्वर चाहिए?

बच्चे को चोट लगे, तो पीड़ा उसके लिए मायने रखती है। मदद की जरूरत ब्रह्मांड की उत्पत्ति पर हमारी सहमति का इंतजार नहीं करती। चर्चा को ठोस बात मौजूद है: दुख, नुकसान सह सकना और देखभाल से बदल सकना।

शुरुआत हर नैतिक सवाल नहीं सुलझाती। दिखाती है कि "ईश्वर बिना सब जायज" को दोहराव से अधिक तर्क चाहिए।

ईश्वर के आदेश से काम अच्छा है?

आदेश अकेला अच्छा बनाता है, तो आदेश पर कोई भी काम अच्छा हो सकता है? नहीं, तो काम का कोई गुण या ईश्वर की प्रकृति पहले से नैतिक वजह का काम कर रही है।

मजबूत ईसाई उत्तर है कि अच्छाई ईश्वर की आवश्यक अच्छी प्रकृति से निकलती है। आवश्यक यानी प्रकृति और हो ही नहीं सकती थी। यह मनमाने आदेश देते शासक से गंभीर प्रस्ताव है।

प्रकृति की पहचान कैसे, पूछें। पाठ कठोर आदेश ईश्वर से जोड़े, तो अच्छाई से मेल कैसे तय होगा? ईश्वरीय नाम मिलते ही हर आचरण अच्छा हो, तो व्याख्या आज्ञापालन पर लौट आई।

धार्मिक कथाओं में उचित नैतिक समझ हो सकती है?

बिल्कुल। मत्ती 7 दूसरों से वैसा व्यवहार कहता है जैसा अपने लिए चाहें। लूका 10 का अच्छा सामरी समुदाय की सीमा के पार देखभाल ठोस बनाता है। विचार लोगों की मदद क्यों करते हैं, चर्चा कर सकते हैं।[77][78]

वजहें ठोस हों, तो धर्म से बाहर भी चर्चा योग्य हैं। अच्छी शिक्षा मानने के लिए उसके संग्रह के हर अलौकिक दावे को मानना नहीं चाहिए।

वैसे ही बुरा नियम मिलने से हर मानवीय शिक्षा नहीं मिटती। काम वजहों को एक कसौटी से परखने का है, एक स्रोत को पूरी छूट का नहीं।

विज्ञान पूरा नैतिक नियम-संग्रह साबित करता है?

नहीं। असर दिखाने में विज्ञान मदद करता है: किसने दुख सहा, क्या हानि घटाता है और नीति से क्या बदला। क्या मायने रखना चाहिए, तय करने में नैतिक शुरुआती आधार भी चाहिए।

मेरे आधारों में दुख, स्वतंत्र सहमति और बराबर दर्जा हैं। बचाव इसलिए करता हूँ कि लोगों के अपने हित हैं और केवल औजार बनाए जाने का विरोध करने की वजहें हैं। इन मान्यताओं की आगे वजह मुझसे पूछी जा सकती है।

मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा समान गरिमा, स्वतंत्रता और दासता से सुरक्षा का सार्वजनिक मानक देती है। नैतिक व राजनीतिक दस्तावेज है, प्रयोगशाला का प्रमेय नहीं।[65]

मतभेद से हर उत्तर बराबर अच्छा होता है?

असहमत लोगों के कुछ तर्क बेहतर समर्थित हो सकते हैं। पूछें कि नियम मिलते मामलों से समान व्यवहार करता है, पीड़ितों का हिसाब रखता है और भूल सुधारने देता है?

दूसरे धर्म का थोपा नियम नकारेंगे, तो अपने में वही रूप क्यों मानें? बोलने वाले का धर्म यह तय न करे कि दुख गिना जाएगा या नहीं।

नास्तिकता खुद अच्छे व्यवहार की गारंटी है?

नहीं। अविश्वास दया, ईमानदारी या पूरा नैतिक सिद्धांत नहीं देता। नास्तिक बुरा काम और बुरे नियम का बचाव कर सकते हैं। उन्हें भी वजह और गहरी जाँच देनी है।

मेरा दावा है कि ईश्वर का अस्तित्व पहले तय किए बिना नैतिक सोच चल सकती है। प्रभावित लोगों की वजहों से क्रूरता नकार सकता हूँ। ईश्वरीय आदेश का सिद्धांत नैतिकता का एक प्रस्ताव है। बाकी सबको बिना आधार घोषित कर अपनी जरूरत सिद्ध नहीं कर सकता।

अध्याय 29परलोक न हो, तो जीवन अर्थ खो देगा?

आस्तिक कह सकता है कि छोटा जीवन हमेशा न चले, तो मायने नहीं रखता। मैं नहीं समझता कि अवधि अकेली मूल्य क्यों तय करे। समाप्त हुई बातचीत भी मदद कर सकती है। दोस्ती साथ के समय में दोनों के लिए जरूरी हो सकती है।

मिसालें परलोक का न होना सिद्ध नहीं करतीं। सीमित चीज अपने आप बेकार होने के अतिरिक्त दावे को चुनौती देती हैं।

उद्देश्य बाहर से दिया जाना जरूरी है?

सौंपा काम जीवन को दिशा दे सकता है। देने वाले का हित भी कर सकता है। दूसरी सत्ता की इच्छा मेरे जीवन का अंतिम उद्देश्य अपने आप क्यों बने?

काम अच्छा किससे है, पूछ सकते हैं। मदद, कम दुख या स्वतंत्र प्रतिबद्धता व्यक्त करता है? वजहें जरूरी हैं, तो चर्चा होगी। केवल आज्ञा उत्तर है, तो मूल्य के सवाल की जगह माँग आ गई।

रचयिता का लोग बना सकना उन्हें इस्तेमाल करने का असीम अधिकार नहीं दिखाता। असर अनुभव कर सकें, तब उनका जीवन नैतिक सवाल का हिस्सा हो जाता है।

उम्मीद खुद अपने पूरे होने का प्रमाण है?

आशा समझने योग्य और मूल्यवान हो सकती है। मनचाही घटना की गारंटी नहीं। प्रियजन को फिर देखना चाहने से पुनर्मिलन इंतजार में है, साबित नहीं होता।

शोक से सावधानी से पेश आएँ। लालसा पर व्यक्ति का मजाक जरूरी नहीं। नास्तिक को मौत भावनात्मक रूप से आसान बताना भी नहीं। ईमानदारी में नुकसान मानना है, दिलासे को ज्ञान बनाए बिना।

सवाल है कि वादे से पूरी होती जरूरत के बाहर उस भविष्य का आधार क्या है।

सभी ईसाई मौत एक तरह बताते हैं?

नहीं। सेवेंथ-डे एडवेंटिस्ट कथन मौत को पुनरुत्थान से पहले अचेत दशा बताता है। दूसरे मत मृत्यु के बाद चेतन जीवन अलग बताते हैं। आलोचक चुनौती से पहले खास दावा पहचाने।[79]

अंतर अपने आप भविष्य का जीवन असंभव नहीं दिखाते। स्रोत और अलग तस्वीरें चुने जाने के सवाल उठाते हैं। मौत के बाद का भरोसे से दिया विवरण भरोसे की वजह समझाए।

धार्मिक व्याख्या अनिश्चित हो, तब भी रीति मदद कर सकती है?

सभा साथ दे सकती है। रीति शोक को ढाँचा। प्रार्थना भय या कृतज्ञता व्यक्त करने का रास्ता। ये संभव मानवीय काम दिखाई अलौकिक व्याख्या से अलग हैं।

नास्तिक मत बिना माने लाभ स्वीकार सकता है। आस्तिक रीति का महत्व रखकर उसके ऐतिहासिक या वैज्ञानिक दावे जाँचने दे सकता है। दोनों को इंसानी अनुभव झूठा बताने की जरूरत नहीं।

अविश्वास को भावनाहीन जीवन चाहिए?

नहीं। अनंत पुरस्कार का दावा बिना परिवार की परवाह, कला का आनंद, ज्ञान की खोज और हानि का विरोध कर सकते हैं। वजहें उन जीवनों में उठती हैं जिन्हें अभी मदद या चोट मिल सकती है।

यह उपलब्ध वजहों का कथन है। हर नास्तिक आसानी से उद्देश्य पाता है, ऐसा दावा नहीं। लोग अलग हैं। आस्था खोने से रिश्ते और उम्मीद बदल सकते हैं। ईमानदार विवरण कठिनाई की जगह छोड़े।

हानि की जगह अनंत जीवन पसंद होगा, केवल इसलिए उसका वादा नहीं मानता। उसके बिना आज का प्रेम या देखभाल अर्थहीन भी नहीं मानता। मदद का मूल्य ब्रह्मांड के हमेशा काम याद रखने की गारंटी का इंतजार नहीं करता।

अध्याय 30इन सवालों से क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं?

यहाँ जाँचा पक्ष मुझे ईसाई धर्म को ईश्वर की ओर से बोलता दिखाने जितना मजबूत नहीं लगता। पहला कारण दिखे भी, तो अकेले त्रिएकता की पहचान नहीं। सुरक्षित पाठ हर बताई घटना नहीं साबित करता। यीशु दिखने का विवरण भी अनुभव का कारण माँगता है।

पवित्र नियम को हानि की पर्याप्त सफाई बनाने वाले दावे भी नकारता हूँ। जन्म के समूह से बच्चा दोषी नहीं। स्त्री का लिंग पुरुष को शासन-अधिकार नहीं देता। बंदी की स्वतंत्रता की जरूरत का उत्तर केवल मालिक को दया सिखाकर नहीं।

दावे अलग वजहें लेते हैं। डीएनए वंश पढ़ने में, रिकॉर्ड अतीत में, हानि और निष्पक्षता के तर्क नियम परखने में मदद करते हैं। साफ रखें कि कौन-सा काम कर रहे हैं।

क्या पुस्तक ने हर संभव ईश्वर खारिज कर दिया?

नहीं। ईसाई धर्म का पक्ष नकारना ईश्वर का हर विचार तय नहीं करता। हाल की रचना के खिलाफ प्रमाण विकासक्रम से काम करने वाले रचयिता को नहीं काटता। बुरा नियम मिलना उसकी उत्पत्ति ठीक नहीं बताता।

सीमित नतीजा फिर भी जरूरी है। संदेह करने वाला बाकी सब नहीं समझा सकता, केवल इसलिए दावा भरोसा अर्जित नहीं करता। विश्वास की माँग को अपना आधार चाहिए।

कौन-से जवाब चर्चा बदलें?

त्रिएकता सत्ता और व्यक्ति अलग करती है। इससे तीन व्यक्तियों को उसी अर्थ में एक कहने के कच्चे आरोप का उत्तर मिलता है। बात स्वीकारकर भी शिक्षा का आधार पूछ सकते हैं।

चुनाव जानना उसे करवाना नहीं। स्वतंत्र इच्छा की एक आसान आपत्ति उत्तर पाती है। फिर पूछें कि रचयिता ने परिस्थितियाँ चुनकर, असर जानकर, हानि क्यों होने दी।

पुरानी पृथ्वी और विकासक्रम मानता ईसाई हाल की रचना वाले से अलग दावा करता है। अनंत यातना नकारने वाले से उसे मानने वाले जैसे सवाल नहीं होंगे। दासता का विरोध करने वाला ईसाई पुरानी अनुमति नकारने की वजह पर सुना जाए।

इनसे विवाद सटीक होता है। आगे काम बिना नया दावा सिद्ध नहीं होता।

मुझे क्या कहना छोड़ना चाहिए?

प्रतियों के अंतर से बाइबल का हर वाक्य अनजान है, यह नहीं कहूँ। मरकुस के लंबे अंत में ही पुनरुत्थान का पहला दावा है, यह दिखावा नहीं। पौलुस की सूची पाँच सौ बचे बयान नहीं और बयान न मिलने से लोग गढ़े होना नहीं।

मरियम की उम्र या निजी जीवन न गढ़ूँ। हर पुराना दर्शन मतिभ्रम था न कहूँ। मतिभ्रम में अनुभव जिस वस्तु को दिखाता लगता है, वह वस्तु सामने नहीं होती। खास मामले की व्याख्या बनाने से पहले प्रमाण चाहिए।

चर्चों पर सार्वजनिक जाँच के निष्कर्ष हर सदस्य की दोषसिद्धि न बनाऊँ। नास्तिक अपने पक्ष की गलती भी सुधारे।

मेरा मन क्या बदल सकता है?

मजबूत प्रमाण बदल सकता है। ठोस तर्क भी जिसके शुरुआती दावे बचाव योग्य हों और निष्कर्ष असली दावे तक पहुँचे। स्रोत की समस्या हल हो, तो नतीजा मानें।

पक्की दिखाई अजीब घटना भी उससे माँगी शक्ति के सवाल छोड़ेगी। किसी को शासन का अधिकार क्यों मिले? शक्ति और अच्छाई को अलग वजहें चाहिए। आदेश देने वाला जान जाने से हर संभव आदेश न्याय नहीं बनता।

बातचीत कैसे खत्म हो?

जाँचने के स्रोत, छोटे हुए विवाद या ईमानदार अनुत्तर पर रुक सकती है। किसी को छोटा महसूस करवाना सच की कसौटी नहीं। उसे सोचने का समय चाहिए हो सकता है, सवाल करते नास्तिक को भी।

भगत सिंह की मिसाल शक्ति की पूजा और दुख की स्वीकृति पर सवाल सिखाती है। उनका नाम मेरे अगले दावे की जाँच का कर्तव्य नहीं हटाता। किसी धर्म को छूट नहीं देता और अपने पसंदीदा उत्तरों को भी नहीं।[1]

विश्वास का प्रमाण है, तो लोगों को देखने दें। नियम नुकसान करता है, तो बचाव पीड़ितों का उत्तर दे। श्रद्धा की माँग अकेले दोनों काम नहीं करती।

सवालबातचीत में साथ रखने के सवाल

जवाब हो: "ईश्वर ब्रह्मांड का कारण है"

तर्क क्या है? उसके शुरुआती दावे क्या हैं? पहले कारण तक पहुँच भी गए, तो कौन-सा अतिरिक्त प्रमाण उसे ईसाई धर्म, त्रिएकता और बाइबल से जोड़ता है? तर्क का कौन-सा कदम दूसरे विकल्पों को हटाता है?

तर्क केवल शुरुआत वाली या किसी पर निर्भर चीजों के बारे में हो, तो "ईश्वर को किसने बनाया?" पूछना उसका पूरा जवाब नहीं है। उसके असली आधार जाँचें।

जवाब हो: "त्रिएकता रहस्य है"

यहाँ सत्ता और व्यक्ति का अर्थ क्या है? दावे का कौन-सा हिस्सा समझ में आया? उसे सच मानने का आधार क्या है? दूसरे धर्म को भी अपनी बात रहस्य कहने से क्या रोकता है?

शिक्षा तीन व्यक्तियों को ठीक उसी अर्थ में एक कहती है, यह दिखावा न करें। अर्थ और आधार पूछें।

जवाब हो: "ईश्वर ने स्वतंत्र इच्छा दी"

स्वतंत्र इच्छा कौन-सी हानि समझाती है? इंसान के चुनाव से अलग होने वाली हानि का क्या? क्या रचयिता सबसे बुरे नतीजों को सीमित करके भी चुनाव की आजादी बचा सकता था? उसने यही परिस्थितियाँ क्यों चुनीं?

जानना और पैदा करना एक नहीं। ज्ञान, रचना, अनुमति और नियंत्रण अलग पूछें।

जवाब हो: "नरक चुना जाता है"

नरक ठीक क्या है? उसके नतीजे किसने तय किए? क्या व्यक्ति प्रस्ताव को समझकर, अपनी मर्जी से उसे मना कर सकता है? इनकार का यही नतीजा क्यों हो? क्या उसके लिए सीखना या सुधरना अब भी संभव है?

पता करें कि निरंतर यातना, अलगाव या अंतिम विनाश का बचाव है। अलग आपत्तियाँ चाहिए।

जवाब हो: "उद्धार उपहार है"

असरदार मदद किसे मिल सकती है? उस तक पहुँच या उसे समझने का मौका सबको बराबर क्यों नहीं? ईमानदार संदेह करने वाले का क्या होगा? यह व्यवस्था जानबूझकर क्रूर होने और किसी दावे पर यकीन न कर पाने में कैसे फर्क करती है?

जवाब हो: "उत्पत्ति विज्ञान की किताब नहीं"

कौन-से अंश भौतिक इतिहास बता रहे हैं? प्रतीकात्मक अर्थ पहचानने का नियम क्या है? क्या हर जगह वही नियम लगता है? धार्मिक अर्थ को सच मानने का अतिरिक्त प्रमाण क्या है?

सामने वाला पुरानी पृथ्वी या विकासक्रम मानता है, तो उससे असहमति का विषय बदल जाता है। उस बदलाव को स्वीकारें।

जवाब हो: "विकासक्रम केवल सिद्धांत है"

विज्ञान में सिद्धांत का अर्थ क्या है? विरासत में बदलाव, साझा डीएनए, गुणसूत्र का जुड़ाव, जीवाश्म या उनकी उम्र, किस प्रमाण को नकार रहे हैं? दूसरा विकल्प इन सबको बेहतर कैसे समझाता है?

पहले जीवन की उत्पत्ति और बाद के वंश के प्रमाण अलग रखें। एक सवाल की कमी दूसरी खोज नहीं मिटाती।

जवाब हो: "आदम और हव्वा हमारे पूर्वज थे"

क्या वे पूरी मानवता के अकेले जैविक संस्थापक थे या बड़ी आबादी में दो लोग? हाल में थे या बहुत पहले? दावा सामान्य विरासत का है या अतिरिक्त चमत्कार का? हर दावे के सही होने पर क्या मिलना चाहिए? खास उन्हीं नाम वाले जोड़े का प्रमाण क्या है?

आदिपाप पर बात आए, तो पूछें कि दोष विरासत में है या दशा। जीव-विज्ञान अकेले नैतिक सवाल नहीं सुलझाता।

जवाब हो: "बाइबल सुरक्षित रही है"

क्या सुरक्षित रहा है: शब्द, मूल संदेश या हर बारीकी? पांडुलिपियाँ क्या दिखाती हैं? शब्दों की बिल्कुल सही नकल हुई भी हो, तो उनसे बताया विवरण सच कैसे साबित होगा?

प्रतियों में अंतर होने से पूरे संग्रह का पाठ अज्ञात नहीं हो जाता। ठीक क्या बदला, यह पहचानें।

जवाब हो: "पाँच सौ गवाह थे"

कौन-से रिकॉर्ड बचे हैं? क्या हम अलग-अलग बयान पढ़ रहे हैं या समूह को दिखाई देने का एक लेखक का विवरण? लेखक को कैसे पता था? पहले घटना होने का और फिर उसके बताए कारण का आधार क्या है?

पौलुस का विवरण मानें, चुपचाप पाँच सौ उपलब्ध साक्षात्कार न बनाएँ।

जवाब हो: "झूठ के लिए वे नहीं मरते"

किसकी मौत का पक्का प्रमाण है? वह खुद सीधे क्या जानता था? प्रमाण उसकी ईमानदारी दिखाता है, दावे की सच्चाई या दोनों? क्या दूसरे धर्म के ईमानदार शहीद होने से वह धर्म सच बन जाएगा?

प्रेरित की मौत का रिकॉर्ड न गढ़ें। सबके पास समान परिस्थिति में पीछे हटने का मौका था, न मानें।

जवाब हो: "यीशु ने भविष्यवाणी पूरी की"

ठीक कौन-सी घटना बताई गई थी? क्या उसका अर्थ पहले से साफ था? तारीख कैसे तय की गई? घटना का स्वतंत्र प्रमाण क्या है? क्या बाद की कहानी लिखने वाला पहले के अंश को जानता था?

मेल चुनने से पहले सफलता का नियम माँगें। प्रतीकात्मक रिश्ता सटीक पहले अनुमान से अलग है।

जवाब हो: "ईश्वर ने मेरी प्रार्थना सुनी"

नतीजे से पहले क्या माँगा गया था और उसका रिकॉर्ड है? फिर क्या हुआ? किस इलाज या दूसरे कारण की भूमिका हो सकती है? क्या असफल प्रार्थनाएँ भी गिनी गईं? दूसरे धर्म की ऐसी ही कहानी कैसे जाँचेंगे?

किसी के ठीक होने का कारण समझ में न आए, तो उसका अध्ययन होना चाहिए। कारण न समझ आना अपने आप किसी अलौकिक कारण की पहचान नहीं है।

जवाब हो: "तब सामान्य था"

सामान्य का अर्थ आम होना है या सही होना? नुकसान किसने झेला? क्या वे मना कर सकते थे? नियम नैतिक रूप से पूर्ण है, तो उसका बचाव केवल एक खास ऐतिहासिक परिस्थिति में क्यों करना पड़ता है?

दासता, बंदी विवाह और असमान सत्ता पर पूछें। तीनों का इतिहास समान न बताएँ।

जवाब हो: "स्त्री-पुरुष का मूल्य बराबर, भूमिका अलग"

शक्ति किसे मिलती है? कौन मना कर सकता है? असहमति होने पर क्या होता है? लोगों की योग्यता और परिस्थिति अलग है, तो अधिकार लिंग से क्यों तय हो? भूमिका को स्वैच्छिक कहते हैं, तो क्या उसे ठुकराने वाले के लिए भी चुनाव खुला है?

जवाब हो: "ईश्वर अच्छाई तय करता है"

ईश्वर की प्रकृति को अच्छा कैसे पहचाना? क्या उसके नाम से बताया गया आदेश नैतिक रूप से गलत हो सकता है? ईश्वर के नाम पर किए झूठे दावे को कैसे नकारें? जवाब केवल "यह उसका आदेश है" हो, तो तर्क गोल घूमने से कैसे बचा?

जवाब हो: "चर्च ईश्वर की ओर से बोलता है"

उस अधिकार का आधार और उसकी सीमाएँ क्या हैं? गलत काम की जाँच कौन करे, पीड़ित को कौन सुने और भूल कौन सुधारे? क्या प्रमाण सुनने से पहले ही नेता पर सवाल करना अपराध बना दिया जाता है?

जवाब हो: "स्वर्ग बिना जीवन बेकार है"

सीमित समय तक मिलने वाले लाभ का मूल्य क्यों न हो? क्या जीवन का उद्देश्य किसी और का सौंपा होना जरूरी है? वादे से मिलने वाले दिलासे से अलग, परलोक का प्रमाण क्या है?

शोक और अनिश्चितता की जगह छोड़ें। दिलासे की जरूरत व्यक्ति को मूर्ख नहीं बनाती और वादे को सिद्ध भी नहीं।

जवाब हो: "तुम बस पाप करना चाहते हो"

इससे किस तर्क का उत्तर मिला? मेरे इरादे का अंदाजा लगाने से पाठ या भौतिक प्रमाण बदल जाएँगे? क्या ऐसा कहने वाला अपने विश्वास को इसी तरह खारिज करना स्वीकार करेगा?

नास्तिक भी अपने तर्क के सवाल स्वीकारे। खुद को तर्कसंगत कहने से किसी विश्वदृष्टि को छूट नहीं।

शब्दशब्दों की छोटी मदद

आदम और हव्वा

उत्पत्ति की कथा का पहला मानव जोड़ा। मानव की पहली अवज्ञा के कई ईसाई विवरणों में केंद्रीय। धार्मिक भूमिका और अकेले जैविक पूर्वज होने का दावा अलग सवाल हैं।

मिसाल या उपमा

विचार का एक हिस्सा समझाने की तुलना। एक तरफ की हर बात दूसरी पर सच नहीं दिखाती।

प्रायश्चित और मेल-मिलाप

मसीह के द्वारा ईश्वर और मानवता का रिश्ता कैसे सुधरता है, उसका विवरण। ईसाई व्याख्याएँ अलग हैं।

नास्तिकता

ईश्वरों में विश्वास न होना। मजबूत अर्थ में किसी ईश्वर का अस्तित्व न होने का मत। तर्क अपना दावा बताए।

BCE और CE

सामान्य युग से पहले और सामान्य युग। ईसा पूर्व और ईस्वी जैसी संख्या-गणना। 1 ईसा पूर्व और 1 ईस्वी के बीच शून्य वर्ष नहीं।

कैनन

पवित्र पुस्तकों का स्वीकृत संग्रह। पुराने नियम के कुछ हिस्सों पर ईसाई परंपराएँ अलग हैं।

धर्मशिक्षा

धार्मिक शिक्षाओं का व्यवस्थित विवरण। कैथोलिक धर्मशिक्षा चर्च की शिक्षा का स्रोत है, हर दावे का स्वतंत्र प्रमाण नहीं।

गुणसूत्र

डीएनए का पैकेट। मनुष्य में सामान्यतः 23 जोड़ों में 46 गुणसूत्र हैं।

कंडिशनलिज़्म

वह ईसाई मत जिसमें उद्धार न पाने वाले अंत में जीवन खोते हैं, सदा चेतन यातना नहीं सहते। शर्त वाली अमरता या अंतिम विनाश का मत भी कहा जाता है।

सहमति

स्वतंत्र, जानकारी वाली हामी। बल या भारी निर्भरता में बोली हाँ पर्याप्त न हो सकती है।

ईश्वरीय निर्धारण

घटनाएँ ईश्वर के तय करने या इच्छा के अधीन हैं, यह विश्वास। इंसानी चुनाव से रिश्ता विवादित है।

डीएनए

विरासत की जैविक जानकारी ले जाने वाली सामग्री। ढाँचे वंश पढ़ने में मदद करते हैं।

आबादी का प्रभावी आकार

मॉडल में आबादी के आनुवंशिक इतिहास का माप। किसी समय सभी जीवित लोगों की सीधी गिनती नहीं।

उद्धार के लिए चयन

कुछ धार्मिक विवरणों में ईश्वर का लोगों को बचने के लिए चुनना। कृपा, स्वतंत्रता और पूर्वज्ञान से रिश्ते पर ईसाई असहमत हैं।

विकासक्रम

पीढ़ियों में विरासत के गुणों का बदलाव और साझा पूर्वजों से जीवन का व्यापक शाखाओं वाला इतिहास।

पहली अवज्ञा या पतन

मानव के पहले पाप और नतीजों का धार्मिक विवरण। कहानी और विरासत के असर के अर्थ अलग हैं।

पूर्वज्ञान

घटना से पहले उसका ज्ञान। जानना अकेले जबरन करवाना नहीं।

सुसमाचार

यहाँ यीशु के चार अधिकृत वृत्तांतों में एक: मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना। ईसाई प्रयोग में शब्द शुभ समाचार भी है।

कृपा

बिना कमाए उपहार की तरह समझी ईश्वरीय मदद या अनुग्रह। उद्धार में भूमिका चर्च अलग समझाते हैं।

देहधारण

ईश्वरीय पुत्र के मानव बनने की ईसाई शिक्षा। प्रमुख चर्च एक व्यक्ति में ईश्वरीय और मानव प्रकृतियाँ बताते हैं।

स्वतंत्र प्रमाण

जिसका उत्तर जाँचे दावे को केवल दोहराकर या मानकर न मिले। एक विवरण की प्रतियाँ अपने आप अलग अवलोकन नहीं।

मरियम का निष्कलंक गर्भधारण

अपने अस्तित्व की शुरुआत से मरियम आदिपाप से सुरक्षित थीं, यह कैथोलिक शिक्षा। यीशु के कुँवारी गर्भधारण से अलग है।

पांडुलिपि

हाथ से लिखा पाठ या प्रति। तुलना से शब्द और अंतर पहचानने में मदद मिलती है।

चमत्कार

असाधारण ईश्वरीय काम से जोड़ी घटना। व्याख्या न मिलने से अकेले ईश्वरीय कारण नहीं पहचाना जाता।

मॉडल

समझने या जाँचने की सरल बनाई रूपरेखा। वैज्ञानिक मॉडल में धारणाएँ, अनुमान और सीमाएँ हैं।

प्राकृतिक चयन

विरासत के फर्क जीने या प्रजनन पर असर डालते हैं। इससे आबादी में गुणों का अनुपात बदलता है।

नया नियम

सुसमाचार, प्रेरितों के काम, पत्र और प्रकाशितवाक्य वाला ईसाई संग्रह। कैथोलिक और मानक प्रोटेस्टेंट संग्रह में 27 पुस्तकें हैं।

पुराना नियम

नए नियम से पहले के धर्मग्रंथों के ईसाई संग्रह। कुछ पुस्तकों के नाम और संग्रह परंपराओं में अलग हैं।

सर्वशक्तिमान

सारी शक्ति वाला। गंभीर विवरण प्रायः तार्किक रूप से संभव कामों की क्षमता लेते हैं, विरोधाभास सच करने की नहीं।

सर्वज्ञ

सब जानने वाला। भविष्य का कौन तथ्य जाना जा सकता है और स्वतंत्रता से रिश्ता क्या, आगे समझाना होगा।

आदिपाप

पहले मानव पाप के विरासत में आए असर की ईसाई शिक्षा। विरासत का दोष और विरासत की दशा एक दावा नहीं।

पूर्वनिर्धारण

कुछ धार्मिक विवरणों में ईश्वर का अंतिम नतीजा, खासकर उद्धार, तय करना। केवल पूर्वज्ञान से चुपचाप बराबर न करें।

तर्क का आधार

शुरुआती दावा। आधार खुद गलत हो, तब भी निष्कर्ष उससे तर्कसंगत कदम में निकल सकता है।

भविष्यवाणी

धार्मिक संदेश, कभी आगे की घटना का दावा भी। सटीक अनुमान और बाद के प्रतीकात्मक इस्तेमाल की अलग जाँच चाहिए।

रेडियोमितीय उम्र-जाँच

उपयुक्त सामग्री के रेडियोधर्मी बदलाव से उम्र का अनुमान। परिस्थिति और धारणाएँ जाँचते हैं। पृथ्वी की उम्र का तरीका कार्बन डेटिंग नहीं।

पुनरुत्थान

मृत्यु से लौटना। प्रमुख ईसाई दावा यीशु का बदले शारीरिक जीवन में आना है, केवल बीमारी से ठीक होना नहीं।

ईश्वरीय संदेश और प्रकाशितवाक्य

ईश्वर से आया बताया संदेश। अंग्रेज़ी Revelation पुस्तक-नाम में यहाँ चर्चित नए नियम की अंतिम पुस्तक भी है: प्रकाशितवाक्य।

उद्धार

धर्म के बताए खतरे या दशा से बचना। ईसाई मत में पाप, ईश्वर से रिश्ता और मौत के बाद जीवन से जुड़ा।

वैज्ञानिक सिद्धांत

प्रमाणों पर टिकी और जाँच के लिए खुली व्यापक व्याख्या। साधारण अंदाजा नहीं।

त्रिएकता

तीन व्यक्तियों में एक ईश्वर की शिक्षा: पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा। तीन व्यक्ति ठीक उसी पहलू से एक व्यक्ति हैं, इतना सरल दावा नहीं।

प्रतीकात्मक पूर्वरूप

पहले व्यक्ति, घटना या पाठ को बाद में अधिक पूरा हुए ढाँचे के रूप में पढ़ना। अंग्रेज़ी में typology। धार्मिक अर्थ साफ पहले के अनुमान से अलग दावा है।

कुँवारी गर्भधारण

यीशु मानव पिता के बिना गर्भ में आए, यह दावा। मरियम की कैथोलिक निष्कलंक गर्भधारण शिक्षा से अलग।

लेखक की बातइस पुस्तक के बारे में

नास्तिक बनाम आस्तिक: ईसाई धर्म से मेरे सवाल लवप्रीत सिंह की अलग सवाल-आधारित धर्म-शृंखला का दूसरा खंड है। यह Atheist vs Believer: Questions Christianity Must Answer का पहला पूरा हिंदी संस्करण है। इस्लाम खंड अलग पुस्तक है। पूरी हुई The Sacred Mirage पुस्तकें और द्विभाषी वेबसाइट शृंखला भी अलग हैं।

यहाँ पक्ष नास्तिक है। बाइबल, चर्च की आधिकारिक शिक्षा, विज्ञान और ऐतिहासिक स्रोत-टिप्पणी से जाँचने योग्य दावों तक जाता है। वैज्ञानिक खोज, ऐतिहासिक फैसला और नैतिक सोच की सीमाएँ अलग हैं। पाठ उन्हें साफ रखता है।

रोजमर्रा के दृश्य गढ़ी मिसालें हैं, लेखक के जीवन की घटनाएँ नहीं। शोध, मसौदे, हिंदी रूपांतरण और संपादन में GPT उपकरणों की सहायता ली गई। पाठ लेखक की समीक्षा और सुधार के लिए उपलब्ध है। पुस्तक के लिए नए प्रयोग, साक्षात्कार या मूल पांडुलिपि की भौतिक जाँच नहीं हुई।

संदर्भ से उद्धृत लेखक, चर्च या संस्था का समर्थन नहीं निकलता। मूल धार्मिक स्रोत शिक्षा और विवरण दिखाते हैं। स्वतंत्र रूप से अलौकिक कारण नहीं। कुछ वैज्ञानिक शोध सारांश से पढ़े गए थे, जैसा स्रोत की टिप्पणी में है।

लवप्रीत सिंह का लेखन misterlove.in पर उपलब्ध है।

टिप्पणियाँ और स्रोत — पुस्तक 2

स्रोतटिप्पणियाँ और स्रोत

  1. Why I am an Atheist. Bhagat Singh, 1930; transcription from The People, 27 September 1931, Marxists Internet Archive.

    मूल निबंध। ईश्वरीय रचना, पीड़ा और सत्ता से सवाल करने की प्रेरणा। नया उद्धरण या लेखक का समर्थन नहीं गढ़ा गया।

  2. 2 Timothy 3:14-17. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    शास्त्र की ईश्वरीय प्रेरणा और उपयोगिता का कथन। बाद में बनी पूरी पुस्तक-सूची यहाँ नहीं दी गई है।

  3. 1 Thessalonians 5:19-22. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    दावों को परखने और अच्छी बात रखने का निर्देश।

  4. Overview of the Universe. NASA Science.

    फैलाव, आरंभिक गर्म ब्रह्मांड और लगभग 13.8 अरब वर्ष का इतिहास। पूर्ण शून्य से रचना का दावा नहीं।

  5. Catechism 232-267: Trinity. Catechism of the Catholic Church; official Vatican text, a statement of Catholic doctrine.

    एक ईश्वरीय सत्ता और तीन व्यक्तित्व। एक ही अर्थ में तीन व्यक्तियों को एक व्यक्ति कहने का दावा नहीं।

  6. Westminster Confession of Faith, chapters 1-3, 6, 8-10. Orthodox Presbyterian Church; official confessional text.

    पुस्तक-सूची, पूर्वनियति, विरासत के दोष और मसीह पर प्रतिनिधि रिफॉर्म्ड प्रोटेस्टेंट मत। सभी ईसाइयों का मत नहीं।

  7. Matthew 28:16-20. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    बपतिस्मा के निर्देश में पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा। अकेले यह बाद की पूरी दार्शनिक परिभाषा नहीं है।

  8. John 1:1-18. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    वचन और देहधारण। धार्मिक दावे को स्वतंत्र भौतिक प्रमाण से अलग रखा गया है।

  9. Catechism 456-483: true God and true man. Catechism of the Catholic Church; official Vatican text, a statement of Catholic doctrine.

    एक व्यक्तित्व में ईश्वरीय और मानवीय प्रकृतियाँ। कैथोलिक शिक्षा मानव और ईश्वरीय ज्ञान में अंतर करती है।

  10. Mark 13:24-37. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    मनुष्य के पुत्र का आना, यह पीढ़ी और पुत्र को दिन या घड़ी का पता न होना। दायरे और अलग अर्थों पर चर्चा है।

  11. 1 John 4:7-21. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    प्रेम को ईश्वर और नैतिक जीवन का केंद्रीय दावा बताना।

  12. Job 1-2. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    आरोप लगाने वाले, अनुमति और पीड़ा की कथा। यह स्वर्ग की बैठक को स्वतंत्र रूप से स्थापित करती रिपोर्ट नहीं।

  13. Catechism 385-421: the Fall. Catechism of the Catholic Church; official Vatican text, a statement of Catholic doctrine.

    आलंकारिक भाषा के साथ आरंभिक घटना। आदम के वंशजों में उनके निजी अपराध के बिना विरासत में मिली दशा (405)। शैतान को रचा गया और पतित स्वर्गदूत बताया गया है।

  14. Genesis 3. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    पेड़, साँप, आज्ञा तोड़ना और परिणाम। यह अध्याय जीव को साँप कहता है, शैतान का नाम नहीं देता।

  15. Revelation 12:7-12. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    बाद का ईसाई पाठ पुराने साँप को इब्लीस और शैतान से जोड़ता है।

  16. Romans 9:14-24. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    दया, मन कठोर करना और कुम्हार की उपमा। धार्मिक अर्थ विवादित है।

  17. Matthew 25:31-46. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    कथा में न्याय, कमजोर लोगों की देखभाल और अनंत दंड तथा जीवन।

  18. Catechism 1033-1037: hell. Catechism of the Catholic Church; official Vatican text, a statement of Catholic doctrine.

    अनंत अलगाव और स्वयं को बाहर रखना। ईसाइयों के नरक संबंधी सभी मत एक जैसे नहीं बताए गए।

  19. Our Statement on Evangelical Conditionalism. Rethinking Hell; Christian conditionalist organization.

    अनंत सचेत यातना की जगह अंतिम विनाश के पक्ष में आस्तिक का अपना तर्क। एक विकल्प बताता है, सभी चर्चों का सर्वेक्षण नहीं।

  20. John 14:1-7. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    अंश में यीशु को पिता तक पहुँचने का मार्ग बताया गया है।

  21. Ephesians 2:8-10. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    एक ही अंश में अनुग्रह, विश्वास और अच्छे काम।

  22. James 2:14-26. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    कामों के बिना विश्वास की आलोचना। पौलुस से इसके संबंध को परंपराएँ अलग तरह से समझती हैं।

  23. Catechism 846-848: salvation outside explicit membership. Catechism of the Catholic Church; official Vatican text, a statement of Catholic doctrine.

    अपना दोष न होने पर मसीह को न जानने वालों को बताई शर्तों के साथ शामिल करता है। चर्च से बाहर जन्मे हर व्यक्ति को दंड का फैसला नहीं।

  24. Genesis 1:1-2:3. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    रचना के क्रमबद्ध दिन, ज्योतियाँ और सातवाँ दिन। साहित्य की शैली और शाब्दिक भौतिक दावे अलग रखे गए हैं।

  25. Geologic Time: Age of the Earth. US Geological Survey.

    लगभग 4.54 अरब वर्ष की पृथ्वी के रेडियोमितीय प्रमाण। पुराने पृष्ठ का उपयोग पृथ्वी की उम्र के लिए है, उसमें दिए ब्रह्मांड की उम्र के पुराने अनुमान के लिए नहीं।

  26. Evolution Resources. US National Academies of Sciences, Engineering, and Medicine.

    वैज्ञानिक सिद्धांत, प्रमाण और विज्ञान तथा अलौकिक दावों का फर्क।

  27. Genetics. Smithsonian Institution, Human Origins Program.

    मानव और दूसरे कपियों के आनुवंशिक रिश्ते। गिने हिस्सों और अंतर के प्रकार से प्रतिशत बदलता है।

  28. Historical contingency and the evolution of a key innovation in an experimental population of Escherichia coli. Blount, Borland and Lenski, PNAS 105 (2008), 7899-7906. DOI 10.1073/pnas.0803151105.

    मूल प्रयोग में ई. कोलाई की एक आबादी ने ऑक्सीजन रहते साइट्रेट इस्तेमाल करना सीखा। अकेले यह मानव विकासक्रम का प्रदर्शन नहीं।

  29. Origin of human chromosome 2: an ancestral telomere-telomere fusion. IJdo et al., PNAS 88 (1991), 9051-9055. DOI 10.1073/pnas.88.20.9051.

    मूल शोध का सारांश। भीतर आमने-सामने के टीलोमियर दोहराव पुराने जुड़ाव का आधार हैं। सारांश और संस्थागत आनुवंशिकी की व्याख्याएँ देखी गईं।

  30. Human Evolution Evidence. Smithsonian Institution, Human Origins Program.

    मिलते जीवाश्म, पुरातात्त्विक और आनुवंशिक प्रमाण। तर्क एक अकेली जोड़ने वाली हड्डी पर नहीं टिका है।

  31. About Astrobiology. NASA Astrobiology.

    जीवन की उत्पत्ति और विकास वैज्ञानिक शोध के सवाल हैं। पूरी उत्पत्ति फिर से बना लेने का दावा नहीं।

  32. Romans 5:12-21. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    पौलुस आदम, पाप, मृत्यु और मसीह को जोड़ते हैं। विरासत का अर्थ परंपराओं में अलग है।

  33. Inference of human population history from individual whole-genome sequence. Li and Durbin, Nature 475 (2011), 493-496. DOI 10.1038/nature10231.

    मूल PSMC शोध। प्रभावी आबादी का आकार मॉडल पर निर्भर माप है, सीधी जनगणना नहीं। बहुत हालिया या थोड़े समय की संकरी आबादी पकड़ने की सीमा है।

  34. Ezekiel 18:1-20. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    व्यक्तिगत जिम्मेदारी और पीढ़ियों के बीच दोष भेजने का फर्क। धार्मिक मेल बैठाने के लिए भी तर्क चाहिए।

  35. Genesis 6-9. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    बाढ़, विनाश, जहाज और वाचा। हालिया विश्वव्यापी बाढ़, स्थानीय बाढ़ और प्रतीकात्मक कथा अलग दावे हैं।

  36. EPICA Dome C 801,000 Year Ice Core Ionic Chemistry Data. Wolff and colleagues; NOAA NCEI dataset and metadata, DOI 10.25921/611g-qd84.

    अंटार्कटिका के बर्फ-नमूने का संग्रहित रिकॉर्ड और उम्र का पैमाना। रिकॉर्ड का विवरण पढ़ा गया; पूरे आँकड़ों का नया विश्लेषण नहीं हुआ। हर परत अलग गिनने का दावा नहीं।

  37. John 14:12-14. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    यीशु के नाम से माँगने के वादे। मानने वाले इनके अर्थ और दायरे पर शर्तें बताते हैं।

  38. James 5:13-18. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    धार्मिक संदर्भ में बीमार के लिए प्रार्थना। यहाँ चिकित्सा छोड़ने का निर्देश नहीं दिया गया।

  39. Study of the Therapeutic Effects of Intercessory Prayer (STEP). Benson et al., American Heart Journal 151 (2006), 934-942. DOI 10.1016/j.ahj.2005.05.028.

    हृदय बाईपास के 1,802 रोगियों का यादृच्छिक समूहों वाला अध्ययन। इस तरीके से तय प्रार्थना का ठीक होने में लाभ नहीं मिला। हर प्रार्थना या ईश्वर की हर धारणा की जाँच नहीं।

  40. Introduction to the Gospels. US Conference of Catholic Bishops, New American Bible introductory notes.

    सुसमाचार के शीर्षकों के नाम पारंपरिक लेखक-नाम हैं। टिप्पणियों में रचना और परंपरा के चरणों पर चर्चा है।

  41. Catechism 101-141: scripture. Catechism of the Catholic Church; official Vatican text, a statement of Catholic doctrine.

    प्रेरणा, अर्थ, लेखकों का उद्देश्य और कैथोलिक मान्य पुस्तक-सूची। पुराने नियम की 46 और नए नियम की 27 पुस्तकें।

  42. Canon of Scripture. Orthodox Church in America; official questions and answers.

    ऑर्थोडॉक्स की पुराने नियम की अधिक लंबी मान्य पुस्तक-सूची। संग्रह पर ईसाई मतभेद का प्रमाण; अकेला मतभेद शास्त्र को झूठा सिद्ध नहीं करता।

  43. Mark 16: notes on the endings. USCCB, New American Bible textual notes.

    कैथोलिक लंबे अंत को मान्य धर्मग्रंथ लेते हैं, पर उसकी रचना मरकुस की रचना से अलग पहचानते हैं। पूरे पुनरुत्थान की कहानी यहीं बाद में जोड़ी गई, ऐसा दावा नहीं।

  44. Mark 16. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    खाली कब्र और अलग अंत। पाठ संबंधी टिप्पणियाँ अलग से उद्धृत हैं।

  45. John 7:53-8:11: textual notes. USCCB, New American Bible textual notes.

    व्यभिचार में पकड़ी स्त्री वाला अंश आरंभिक पांडुलिपियों में नहीं है। पाठ में उसकी जगह और उसका नैतिक आकर्षण अलग सवाल हैं।

  46. Introduction to Matthew. USCCB, New American Bible introductory notes.

    अज्ञात लेखक और मरकुस के उपयोग को बताता है। तारीख और स्रोतों का विश्लेषण ऐतिहासिक निर्णय हैं, आँखों-देखी रिकॉर्डिंग नहीं।

  47. Luke 1-2. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    लूका की भूमिका, घोषणा, जनगणना और बचपन की कथा। ऐतिहासिक टिप्पणियाँ अलग से उद्धृत हैं।

  48. 1 Corinthians 15:1-19. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    पौलुस दर्शन की परंपरा आगे बताते हैं, जिसमें पाँच सौ से अधिक को दिखाई देने का दावा है। एक लिखित विवरण पाँच सौ अलग बची गवाहियाँ नहीं।

  49. Catechism 638-658: resurrection. Catechism of the Catholic Church; official Vatican text, a statement of Catholic doctrine.

    खाली कब्र और दर्शन से चर्च का अपना बचाव। गवाही को स्वतंत्र समकालीन माप से अलग रखा गया है।

  50. John 20. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    मरियम मगदलीनी, दूसरे शिष्य, थोमा और कथाकार का बताया उद्देश्य। अनुभव के दावे और उसके कारण के निष्कर्ष अलग हैं।

  51. Matthew 1-2. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    कुँवारी से गर्भधारण, यूसुफ, हेरोदेस, ज्योतिषी, मिस्र और वापसी। क्रिसमस की कैलेंडर तारीख नहीं बताई गई।

  52. Catechism 484-511: Mary and virgin conception. Catechism of the Catholic Church; official Vatican text, a statement of Catholic doctrine.

    यीशु के कुँवारी से गर्भधारण और कैथोलिक निष्कलंक गर्भधारण में फर्क। दूसरा दावा मरियम के आदिपाप से मुक्त होने का है।

  53. Luke 2: historical notes on the census. USCCB, New American Bible notes.

    हेरोदेस के समय और क्विरिनियुस की जनगणना को जोड़ने की कालक्रम समस्या। नया जनगणना-रिकॉर्ड नहीं गढ़ा गया और हर मेल बैठाना तार्किक रूप से असंभव नहीं कहा गया।

  54. Isaiah 7:1-17. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    आहाज के समय का संकेत। मत्ती में बाद के ईसाई उपयोग को पहले संदर्भ से अलग रखा गया है।

  55. Isaiah 7: notes on the sign. USCCB, New American Bible notes.

    आहाज, संकेत का पहला संदर्भ और युवती या कुँवारी के अनुवाद का सवाल। बाद का ईसाई प्रतीकात्मक संबंध अलग तर्क है।

  56. 2 Peter 3:1-13. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    देर होने की अपेक्षा और ईश्वरीय समय की तुलना का जवाब। आज परखी जा सकने वाली वापसी की तारीख नहीं देता।

  57. Hebrews 9:11-28. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    मसीह का बलिदान और लहू की भाषा। पाप से मुक्ति की हर ईसाई व्याख्या एक जैसी प्रक्रिया नहीं बताती।

  58. Matthew 6:9-15. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    प्रार्थना और क्षमा। इससे बलिदान की अतिरिक्त प्रक्रिया जरूरी होने का सवाल उठता है।

  59. Catechism 599-623: Christ's redemptive death. Catechism of the Catholic Church; official Vatican text, a statement of Catholic doctrine.

    स्वेच्छा से आत्म-समर्पण, प्रेम और मुक्ति। ईसाई तीन असंबंधित देवताओं को पूजते हैं, यह शिक्षा नहीं है।

  60. Genesis 2:18-25. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    कथा में पुरुष से स्त्री की रचना। पसली या बगल के अनुवाद और नैतिक नतीजे अलग सवाल हैं।

  61. Ephesians 5:21-33. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    शुरू का आपसी अधीनता वाला कथन, पत्नी और मुखिया की भाषा तथा पति के कर्तव्य, सभी सुरक्षित हैं।

  62. 1 Timothy 2:8-15. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    अंश में स्त्री के सिखाने या अधिकार चलाने पर रोक और आदम तथा हव्वा का दिया तर्क। लागू दायरे पर मतभेद हैं।

  63. Galatians 3:26-29. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    मसीह में यहूदी और यूनानी, दास और स्वतंत्र, पुरुष और स्त्री की एकता। भूमिकाओं पर इसके नतीजे विवादित हैं।

  64. Leviticus 25:39-46. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    गरीब इस्राएलियों और विदेशी दासों के लिए अलग नियम, विरासत सहित। इसे आधुनिक नौकरी का अनुबंध भर नहीं बताया गया।

  65. Universal Declaration of Human Rights. United Nations, Articles 1, 4, 18 and 19.

    बराबरी, दासता का विरोध और विश्वास व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्पष्ट आधुनिक नैतिक मानक। वैज्ञानिक प्रमेय नहीं बताया गया।

  66. Ephesians 6:5-9. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    दासों और मालिकों के निर्देश। मालिकों पर कर्तव्य होने से स्वामित्व का सवाल खत्म नहीं होता।

  67. Philemon 1. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    पौलुस उनेसिमुस के लिए भाई की तरह व्यवहार की अपील करते हैं। सभी जगह दासता खत्म करने का स्पष्ट आदेश नहीं है।

  68. 1 Samuel 15:1-3. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    कथा में शमूएल से बच्चों सहित विनाश का आदेश कहलवाया गया है। नैतिक जाँच और घटना ठीक वैसी हुई होने का प्रमाण अलग हैं।

  69. Deuteronomy 21:10-14. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    बंदी स्त्री से विवाह के नियम में इंतजार और छोड़ने की शर्त हैं। बंदी होने और स्वतंत्र सहमति के सवाल अलग रहते हैं।

  70. Romans 1:18-32. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    मूर्तिपूजा और गलत आचरण की बड़ी धार्मिक व्याख्या में समलैंगिक आचरण। आज लागू करने पर मतभेद हैं।

  71. Leviticus 20:13. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    प्राचीन पाठ में पुरुष समलैंगिक आचरण पर रोक और शारीरिक दंड। हर चर्च आज प्राचीन इस्राएल के नागरिक दंड लागू करता है, ऐसा दावा नहीं।

  72. Hebrews 11:1-6. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    विश्वास और न दिखने वाली चीजें। इसका अर्थ यह नहीं कर दिया गया कि ईसाई कभी तर्क देते ही नहीं।

  73. John 20:24-31. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    थोमा, चिह्न और लिखने का बताया उद्देश्य। प्रमाण और विश्वास से सवाल में उपयोग।

  74. Matthew 16:13-20. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    पतरस, चर्च, चाबियाँ और बाँधना तथा खोलना। संस्थागत अधिकार के अर्थ अलग हैं।

  75. Royal Commission: Final Report. Australian Government, official Royal Commissions archive.

    अंतिम रिपोर्ट की तारीख 15 दिसंबर 2017 बताता है। पुरानी जाँच के निष्कर्ष और आज अनुपालन की स्थिति अलग हैं।

  76. Religious institutions: Final Report findings. Australian Royal Commission into Institutional Responses to Child Sexual Abuse; official report overview, 2017.

    संस्थागत विफलताएँ और बच्चों की सुरक्षा की सिफारिशें दर्ज करता है। हर नामित या अनाम पादरी की सजा या दुनिया के हर चर्च के बारे में दावा नहीं।

  77. Matthew 7:7-12. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    माँगने की बात और दूसरों से वैसा व्यवहार करने का नियम जैसा अपने लिए चाहते हैं।

  78. Luke 10:25-37. Bible, King James Version (public-domain text); passage paraphrased and compared with the contextual notes cited separately.

    भले सामरी की कथा और समूह की सीमा से बाहर देखभाल की ठोस मिसाल।

  79. Death and Resurrection, Fundamental Belief 26. Seventh-day Adventist Church; official belief statement.

    शर्त के साथ अमरता और मृत्यु की अचेतन अवस्था। परलोक पर ईसाई विविधता के प्रमाण में उपयोग।

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